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कोष, लेखा एवं अभिलेख व्यवस्था
(Funds, Accounts and Maintenance of Records)

- डॉ. के.एल.गुप्ता, राष्ट्रीय वित्त मंत्री 

किसी भी संगठन की कार्य सफलता जहाँ एक ओर उसकी विविध क्रिया कलापों से मापी जाती है वहीं दूसरी ओर कार्य सुगमता के लिए कोष एवं लेखा व्यवस्था का उचित एवं व्यवस्थित स्वरूप भी आवश्यक होता है। भारत विकास परिषद् जैसे सामाजिक संगठनों में पदाधिकारी तन-मन के साथ धन भी अर्जित करते हैं और कोष एवं लेखों के प्रयोग के सम्बन्ध में किसी व्यक्ति के मन में आशंका एवं सन्देह होने का प्रश्न नहीं उठता लेकिन समय-समय पर सदस्यों को कोष व्यवस्था की जानकारी एवं वर्ष भर के क्रिया कलापों के पश्चात् लेखों का उचित प्रस्तुतिकरण पदाधिकारियों की कार्य-व्यवस्था को और अधिक प्रभावशाली, विश्वसनीय और पारदर्शी बना देता है। इसी सन्दर्भ में सामान्य मार्ग निर्देश निम्न प्रकार हैं:-

बैंक खाता
परिषद् में सभी स्तरों पर कोष व्यवस्था के संचालन के लिए किसी बैंक में खाता खोलना आवश्यक ही नहीं वरन् अनिवार्य है। इस सन्दर्भ में परिषद् की नियमावली के नियम 8(i) के अनुसार ‘‘सभी स्तरों पर परिषद् का सारा पैसा बैंक में रखा जाना चाहिए। सभी स्तरों पर दो अलग-अलग खाते होने चाहिए। एक खाते में वह धन जो सदस्यों से शुल्क/अंशदान के रूप में लिया है, रखा जाए जिसे बैठकों/प्रशासनिक कार्यों और संगठनात्मक उद्देश्यों के लिए इस खाते में से व्यय किया जाए। दूसरे खाते में सभी प्रकार से इकट्ठा किया गया धन/दान इत्यादि जो सदस्यों/सम्बद्ध लोगों अथवा सहानुभूति रखने वाले लोगों से लिया गया हो, रखा जाए। इसे सभी प्रकार के प्रकल्पों पर व्यय किया जाए’’।

यद्यपि उक्त नियम के अनुसार प्रत्येक शाखा को दो खाते खोलने चाहिए लेकिन यदि कोई बड़ा स्थाई प्रकल्प न हो तो एक खाता भी उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है। यह महत्वपूर्ण है कि बैंक खाता परिषद् की संवैधानिक आवश्यकता की पूर्ति ही नहीं करता वरन् इससे विभिन्न स्रोतों एवं सदस्यों से चैक द्वारा भुगतान प्राप्त करने की सुविधा बढ़ती है, भुगतान स्वतः प्रमाणित हो जाते हैं तथा कोष व्यवस्था में पारदर्शता बनी रहती है।

बैंक खाता खोलते समय बैंक में शाखा या प्रान्तीय स्तर पर पारित उस प्रस्ताव की प्रति जमा करनी होती है जिसमें किसी विशिष्ट बैंक में खाता खोलने का निर्णय लिया गया हो। कुछ बैंक परिषद् के संविधान की प्रति भी जमा कराती है। शाखा स्तर पर परिषद् का बैंक खाता अध्यक्ष अथवा सचिव के साथ कोषाध्यक्ष के संयुक्त हस्ताक्षरों से संचालित होना चाहिए। प्रान्तीय स्तर पर अध्यक्ष एवं महासचिव के साथ कोषाध्यक्ष के संयुक्त हस्ताक्षरों से परिचालित होना चाहिए। जब भी पदाधिकारियों में परिवर्तन होता है विधिवत् सूचना प्रस्ताव के रूप में बैंक को देनी होती है।

बैंक खाता खोलने के पश्चात् भी दिन-प्रतिदिन के फुटकर व्ययों की व्यवस्था के लिए एक निश्चित एवं औचित्यपूर्ण धनराशि नकदी में रखने का अधिकार सचिव को देना व्यवहारिक एवं आवश्यक हैं। इस अधिकार की राशि शाखा के स्तर एवं कोषों के सन्दर्भ में शाखा की सामान्य सभा अथवा कार्यकारिणी द्वारा निर्धारित की जा सकती है।

वार्षिक लेखे एवं अंकेक्षण
परिषद् में प्रत्येक स्तर पर वार्षिक खाते तैयार करना एवं उनका अंकेक्षण कराना भी अनिवार्य है। इस सम्बन्ध में परिषद् की नियमावली के नियम 8 (iv) में यह व्यवस्था है कि ‘‘सभी स्तरों पर खातों का वर्ष के अन्त में अंकेक्षण होना चाहिए। शाखा स्तर पर, कार्यकारिणी किसी सक्षम व्यक्ति को (शाखा में से या शाखा से बाहर) ऑडीटर नियुक्त करेगी जो खाते की पुस्तकों का अंकेक्षण करेगा। परन्तु प्रान्त एवं केन्द्रीय स्तर पर खाते की पुस्तकों का अंकेक्षण चार्टर्ड एकाउंटेंट द्वारा होना चाहिए’’।

यह महत्वपूर्ण है कि अंकेक्षण व्यवस्था कोई खोजी जांच व्यवस्था नहीं है वरन् पदाधिकारियों को अपने कोषों एवं लेखा व्यवस्था को कुशलता के साथ संचालित करने की अभिप्रेरक व्यवस्था है।

नियम 8(v) में यह भी अपेक्षा की गई है कि सभी शाखायें अपनी अंकेक्षित वार्षिक लेखे की प्रति 30 अप्रैल तक प्रान्त को प्रेषित करेंगी और प्रत्येक प्रान्त अपने अंकेक्षित लेखों की प्रति 31 मई तक केन्द्रीय कार्यालय को प्रेषित करेगा। केन्द्रीय स्तर पर सभी खाते 30 जून तक अंकेक्षित हो जाने चाहिये।

रसीद व्यवस्था
कोष प्राप्ति व्यवस्था को मानक रखने के लिये प्रत्येक शाखा को रसीद छपवानी चाहिए। इसमें जहाँ एक ओर लेखा व्यवस्था में सुविधा रहती है, वहीं दूसरी ओर भुगतान करने वाले व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक संतुष्टि मिलती है। रसीद से लेखों का प्रमाणन भी सरल और सुविधाजनक हो जाता है।

भुगतान व्यवस्था
इस सन्दर्भ में परिषद् की नियमावली के नियम 8 (iii) में यह स्पष्ट व्यवस्था की गई है कि शाखा स्तर पर `3000/- से अधिक बिल का भुगतान चैक द्वारा किया जायेगा। इस प्रकार ` 3000/- से कम धनराशि के बिलों का भुगतान नकदी में किया जा सकता है लेकिन इस स्थिति में भी कोषाध्यक्ष यह देख लेंवे कि बिल पर अध्यक्ष या सचिव में से किसी एक के संस्तुति हस्ताक्षर अवश्य होंवे। प्रान्तीय स्तर पर यह सीमा कार्यकारिणी द्वारा निश्चित की जा सकती है।

सदस्यता अंशदान
प्रत्येक शाखा अपने सदस्य से वार्षिक सदस्यता शुल्क प्राप्त करेगी। जिसका निर्धारण शाखा अपनी परिस्थितियों और आवश्यकता के अनुसार करेगी। यदि सदस्य के प्रवेश के समय प्रवेश शुल्क लिया जाता है तो उसे शाखा के दिन प्रतिदिन के आवर्ती व्ययों में प्रयोग न किया जाए। इस धनराशि से शाखा का पूँजीगत कोष बनाना चाहिये और पूँजीगत कार्यों में ही इसका प्रयोग किया जाना चाहिए।

परिषद् की नियमावली के नियम 3 के अनुसार नये सदस्यों की दशा में अंशदान का संकलन निम्न प्रकार किया जाना चाहिए -

(क) 1 अप्रैल से 31 दिसम्बर - चालू वर्ष का 100 प्रतिशत शुल्क
(ख) 1 जनवरी से 31 मार्च - चालू वर्ष का 25 प्रतिशत शुल्क शाखा इसी के अनुसार प्रान्त एवं केन्द्र का शुल्क देगी।

नोट:- नये सदस्य से लिया जाने वाला प्रवेश शुल्क, शाखा द्वारा सावधि जमा खाते में रखा जायेगा।

केन्द्र का केन्द्रीय अंशदान का प्रेषण
प्रत्येक शाखा के लिये यह आवश्यक है कि अपने चालू सत्र का प्रान्तीय/केन्द्रीय अंशदान 30 जून तक केन्द्र और प्रान्त को भेज देवें और यदि कुछ शेष रह जाता है तो उसे 30 सितम्बर तक अवश्य प्रेषित कर देवें। नवीन गठित शाखायें यथा सम्भव अपने अधिष्ठापन पर प्रान्तीय/केन्द्रीय अंशदान देने की व्यवस्था करें और अधिक से अधिक अधिष्ठापन के एक माह के अन्दर उसे सदस्यों की सूची सहित प्रेषित कर देवें।

शाखाओं के पास केन्द्रीय अंशदान प्रेषण के तीन विकल्प हैं - (अ) प्रान्त को दिया जाये (ब) केन्द्र को सीधे ड्राफ्ट या चैक द्वारा भेजा जाये (स) केन्द्र के बैंक खाते में राशि सीधे जमा की जाये। यदि शाखा प्रान्त को राशि देती है तो उसका विवरण (सदस्यों की सूची, राशि एवं तिथि) केन्द्र को राष्ट्रीय वित्त मंत्री के नाम पत्र द्वारा या ई-मेल द्वारा प्रेषित करें और पत्र के साथ चैक/प्रान्तीय रसीद की फोटो प्रति संलग्न हो। इसी प्रकार यदि राशि केन्द्र को सीधे भेजी जाती है तो उस चैक/ड्राफ्ट/रोकड़ जमा की फोटो प्रति प्रान्त को प्रेषित की जाये। केन्द्र के बैंक खाते में राशि सीधे जमा करने के लिये खाता संख्या इस प्रकार है: (1) केन्द्रीय अंशदान के लिये ‘भारत विकास परिषद्’ खाता संख्या 90962160000020 (सिंडिकेट बैंक) (2) प्रकाशन के लिए ‘भारत विकास परिषद् प्रकाशन’ खाता संख्या 90962010080664 (सिंडिकेट बैंक) (3) विकास मित्र/विकास रत्न ‘भारत विकास परिषद्’ खाता संख्या 30061802477 (स्टेट बैंक ऑफ इंडिया)

यदि केन्द्र के बैंक खाते में राशि सीधे जमा की जाती है तो उसकी सूचना पत्र/ई-मेल/फोन के द्वारा केन्द्र को अवश्य दी जाये जिससे केन्द्र में उसका सही लेखा हो सके तथा उसमें रसीद शाखा/प्रान्त को प्रेषित की जा सके।

खाता व्यवस्था
परिषद् की नियमावली में उल्लिखित नियमों के अनुसार प्रत्येक शाखा दो पृथक-पृथक खाते तैयार करेगी। एक खता रोकड़ खाता या प्राप्ति एवं भुगतान के रूप में होगा, जिसमें सदस्यों से अंशदान (प्रवेश एवं वार्षिक सदस्यता) की प्राप्ति, केन्द्र एवं प्रान्तीय अंशदान के रूप में भेजी राशि का विवरण, शाखा के प्रशासनिक मदों, बैठकों के व्ययों इत्यादि का विवरण होगा। दूसरा खाता परियोजना खाता हो, जिसमें शाखा द्वारा चलाई जा रही या भविष्य में चलाई जाने वाली परियोजनाओं के सम्बन्ध में प्राप्त दान या एकत्रित राशि और परियोजानाओं पर किये गये व्यय का विवरण हो। यह भी महत्वपूर्ण है कि परियोजनाओं के लिये प्राप्त राशि का प्रयोग प्रशासनिक एवं सामान्य व्ययों के रूप में नहीं हो सकता।

खातों की अवधि
खातों की अवधि परिषद् के सत्रानुसार 1 अप्रैल से 31 मार्च होनी चाहिए तथा प्रत्येक आगामी वर्ष 15 अप्रैल तक नव निर्वाचित कोषाध्यक्ष को निवर्तमान कोषाध्यक्ष द्वारा रोकड़ शेष, बैंक शेष, बैंक खाते में पदाधिकारियों के नाम परिवर्तन का प्रस्ताव, खाते तथा अन्य वित्तीय प्रपत्र सौंप देना चाहिए। निवर्तमान अध्यक्ष का उत्तरदायित्व होगा की वह नियमावली के नियम 10 ;पद्ध की इस व्यवस्था का पालन सुनिश्चित करायें। विशिष्ट परिस्थितियों में यह अवधि अप्रैल के अन्त तक बढ़ाई जा सकती है।

बजट व्यवस्था
कोष एवं खाता व्यवस्था की सुदृढ़ आधारिशिला के रूप में यह उचित रहेगा कि प्रत्येक शाखा में कोषाध्यक्ष प्रतिवर्ष नवीन सत्र प्रारम्भ होने के पश्चात् आगामी वर्ष के लिए बजट की प्रस्तुति करे। इससे पदाधिकारियों एवं सदस्यों को वर्ष भर के क्रियाकलापों पर वित्तीय पहलू की दृष्टि से विचार विमर्श का अवसर मिलता है तथा अध्यक्ष, सचिव एवं कोषाध्यक्ष को वर्ष भर के व्ययों एवं कोष व्यवस्था के लिये सदस्यों की सामान्य स्वीकृति प्राप्त हो जाती है। बजट में प्राप्ति एवं भुगतान प्रत्येक पक्ष में राशि के तीन-तीन काॅलम होने चाहिये - गत वर्ष की बजट राशि, गत वर्ष की वास्तविक राशि एवं चालू वर्ष की प्रस्तावित बजट राशि।

अभिलेख व्यवस्था (Maintenance of Record)

शाखा स्तर
शाखा को सुचारू रूप से संचालन तथा प्रान्तीय स्तर पर निरीक्षण की दृष्टि से निम्न रिकार्ड व्यवस्थित रूप में रखा जाना वांछनीय है:-

1. सदस्यता रजिस्टर :- इनमें सभी सदस्यों के दम्पत्ति के रूप में नाम, पूर्ण पता, दूरभाष नं. इत्यादि हो। यदि नवीन सदस्य है तो सदस्यता ग्रहण की तिथि का उल्लेख रहना चाहिए। यदि कोई सदस्य अपनी सदस्यता जारी नहीं रखना चाहता है तो उससे लिखित में आवेदन पत्र लेना चाहिए और कार्यकारिणी में उसे प्रस्तुत कर निर्णय लिया जाना चाहिए।

2. सूक्ष्म रजिस्टर :- प्रत्येक शाखा को कार्यकारिणी सभा एवं सदस्यों की सामान्य सभा के सूक्ष्म का रजिस्टर अनिवार्य रूप में रखना चाहिए। इससे निर्णयों को लिखित रूप में रखने की व्यवस्था बनती है और शाखा के संचालन को उन निर्णयों के सन्दर्भ में नियमबद्ध बनाये रखा जा सकता है। सूक्ष्म रजिस्टर में सभा में उपस्थित सदस्यों के हस्ताक्षर अवश्य होने चाहिए तथा प्रत्येक सभा के सूक्ष्म की सम्पुष्टि अगली सभा में अवश्य कराई जानी चाहिए। सार्वजनिक कार्यक्रमों की कार्यवाही को सूक्ष्म रजिस्टर में नहीं लिखा जाता।

3. कार्य संचालन अभिलेख :- इस रजिस्टर में शाखा का कार्य संचालन माहवार एवं तिथिवार लिपिबद्ध किया जाना चाहिये। जिनमें शाखा द्वारा किया गया प्रत्येक आयोजन, लिये गये प्रत्येक निर्णय एवं चलाई गई प्रत्येक परियोजना का उल्लेख होना चाहिये। इसे वर्ष के अन्त में 'Branch at a Glance' कहा जा सकता है।

4. स्टॉक रजिस्टर :- प्रत्येक शाखा को एक स्टॉक रजिस्टर रखना चाहिए जिसमें सभी स्थाई सम्पत्तियों (भवन, फर्नीचर, साज-सामान) एवं कार्य संचालन में निरंतर कार्य आनेवाली गैर उपभोग्य वस्तुओं (चार्टर, लाउड स्पीकर, मूर्ति, बैनर, दीपक, क्राकरी, स्मृति चिन्ह इत्यादि) का स्टॉक रहना चाहिये। यह रजिस्टर प्रत्येक वर्ष नवीन पदाधिकारियों को कार्यभार सौंपते समय हस्तान्तरणीय रहेगा।

5. सदस्यता फार्मों की फाइल

6. पत्र व्यवहार की फाइल

7. केन्द्र, क्षेत्र एवं प्रान्त से प्राप्त परिपत्रों की फाइल

8. रोकड़ पुस्तक, बैंक की चैक बुक, तथा पास बुक (यह तीनों रिकार्ड कोषाध्यक्ष  के पास रहने चाहिये)

9. विभिन्न परियोजनाओं की फाइलें


 

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