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                                                    Niti Editorials : 2017

January सम्पादकीय
February ...और इस तरह बीत गया 2016

March

भारतीय नववर्ष 2074 हमारा नववर्
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January, 2017
सम्पादकीय
पछले मास बहुत सी औपचारिकताऐं करने के बाद मीडिया के एक चैनल पर देश हित के विरूद्ध समाचार देने के कारण एक दिन का प्रतिबन्ध लगाने की घोषणा हुई। ज्ञात जानकारी के अनुसार कारगिल के युद्ध के समय चैनल की पत्रकारिता के रहते सेना को नुकसान उठाना पड़ा था। कश्मीर घाटी में पत्थरबाजों का समर्थन और जे.एन.यू. प्रकरण पर देश विरोधी गतिविधियों का महिमा मण्डन भी इसी चैनल के खाते में है। प्रखर श्रीवास्तव जो इस चैनल के साथ काम कर रहे हैं। बताते हैं कि किस प्रकार ताज होटल पर मुम्बई में हुए आतंकी हमले में ग्राउण्ड को कवर कर रहे संवाददाता ने सूचित किया कि सुरक्षा बलों ने एक आतंकी को सुरक्षित बाहर जाने का रास्ते दे दिया। इस खबर को चैनल पर जारी किया जाए। सुरक्षाबलों के मनोबल को तोड़नेवाली ऐसी खबरे इस चैनल की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाती है। चैनल पर लगे प्रतिबंध के खिलाफ अभिव्यक्ति की आजादी, प्रेस की स्वतंत्रता की आवाज उठी। लेकिन सच्चाई से वाकिफ कुछ पत्रकारों की टिप्पणियाँ देखिए। राहुल सिंगला कहते है कि चैनल को पूरी तरह बन्द कर देना चाहिए। आलोक ने फेसबुक पर लिखा ‘पत्रकारिता पर काले धब्बे जैसा है एनडीटीवी’ सोशल मीडिया पर हजारों पोस्ट आये जिन्होंने प्रतिबन्ध को उचित ठहराया। व्यवसायी जसप्रीत सिंह ने लिखा कि चैनल को एक दिन बन्द करने की मैं कड़ी निन्दा करता हूँ। इस चैनल को सदैव के लिए बन्द कर देना चाहिए। ऐसे चैनलों पर तकनीकी अथवा आपराधिक-देश विरोधी मुद्दों के कारण प्रतिबन्ध अस्थायी उपाय है। उपाय है जनता का अंकुश। जनता को ही देश हित और देश विरोध की परिभाषा को समझना होगा।

देश में विमुद्रीकरण की घोषणा कुछ ऐसे अंदाज में हुई कि लोगों ने कहा कि संभलने का समय ही नहीं मिला। टीवी के नियमित दर्शकों ने बताया कि अचानक प्रधानमंत्री के उद्बोधन की सूचना देखकर ऐसा लगा कि पाकिस्तान से युद्ध की घोषणा होने को है। देशव्यापी अर्थव्यवस्था के बारे में अंतिम व्यक्ति को प्रभावित करने वाली घोषणा इतनी अचानक हुई कि काले धन के खिलाड़ी सकते में आ गये। जिसे जो रास्ता मिला काले को सफेद करने मे जुट गया। सरकार रोज समीक्षा करती, जनता के लिए सुविधाएँ जुटाती, जुगाड़ करने वालों के लिए कड़े प्रतिबन्ध लगाये गये। देश में नक्सलवाद ठंडा पड़ गया। कश्मीर घाटी में आतंकी गतिविधियाँ लगभग गायब है। हवाला कारोबारी सदमें में हैं। जनता के बल्ले बल्ले है। लोकतंत्र में सरकार के किसी कदम से 98% जनता खुश नहीं होती। इस घोषणा से शतप्रतिशत जनता खुश है। विरोधी दलों को सड़क पर विरोध करने का साहस चुक गया। इसलिए संसद में हंगामा कर स्थगित करने का नाटक कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने 50 दिन मांगे। जनता 100 दिन देने को तैयार हो गई। स्वतंत्रता के बाद यह ऐतिहासिक घटना है। इस घोषणा से देश में अच्छे दिनों के आसार बढ़े हैं। वर्ष 2017 दस्तक दे रहा है। नया सबेरा भारत का भाग्य बदलने को आतुर है। कवियों, साहित्यकारों, फिल्मकारों, प्रबन्धन विशेषज्ञों और आर्थिक मामलो के विशेषज्ञों ने जिन शब्दों में इस घोषण की प्रशंसा की है वह देश के भविष्य की सोच की संभावनाओं का प्रतीक है। देश में महिला सहभागिता के सम्मेलनों में बढ़ती उपस्थिति से यह आभास होता है कि महिलाओं की नेतृत्व क्षमता के विकास में परिषद् की कार्यशैली अनुकूल भी है और प्रभावी भी।

राष्ट्रीय अधिवेशन अजमेर, भारत को जानो की राष्ट्रीय प्रतियोगिता श्री गंगानगर में सम्पन्न हो गई। राष्ट्रीय युवा दिवस (12 जनवरी) लोहड़ी, मकर संक्रान्ति, पोंगल, खिचड़ी आदि पावन पर्व (14 जनवरी), सामाजिक समरसता का प्रतीक है। मतदाता दिवस (24 जनवरी), गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) शायद इस वर्ष राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का आगाज लेकर आयेगी। यह समय अति सक्रियता का समय है। देश के निर्माण में अपनी शक्ति भर सहयोग और समर्थन का समय है। देश के परिवर्तन के साक्षी बनने का हमें सौभाग्य मिला। इसका भरपूर उपयोग करें।
                                                                                                                                             - डॉ. सुरेश चन्द्र गुप्ता


February, 2017
...और इस तरह बीत गया 2016
परिषद् के नये संविधान के आधार पर रीजनल प्रारूप की स्वीकृति वर्ष 2016 में परिषद् की प्रगति का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगा। विशाल भौगालिक क्षेत्र, क्षेत्रीय विभिन्नताएँ, कार्यपद्धति में भिन्नता होते हुए भी रीजनल कार्यकर्ताओं की टीम का निर्माण हुआ। कुछ प्रारंभिक कठिनाईयों के साथ परिषद् का कारवा आगे बढ़ चला। क्षेत्रीय कार्यशालाओं में अभूतपूर्व उत्साह रीजनल बैठकों में लक्ष्य निर्धारण और प्रवास के कारण कार्य में उत्साह रहा। परिणाम भी प्रकट हुए। महिला कार्यशालाओं में महिला भागीदारी की उत्साहपूर्ण उपस्थिति इस का प्रमाण है। इस बढ़ते कारवां के चारचांद लगे नवम्बर में पूना के राष्ट्रीय समूहगान के आयोजन में। नवम्बर में केन्द्रीय कार्यालय में मीडिया सेल की स्थापना हुई। प्रान्तीय स्तर तक सम्पर्क के अभाव से राष्ट्रीय अधिवेशन 2016 की नवम्बर तक के पंजीकरण 1800 पर रूक गये। नोट बंदी को एक कारण बताया गया। सघन प्रयास शुरू किये गये। रीजन और प्रान्त की टीमों से सीधे वार्ता हुई। मीडिया सेल ने पूरी ताकत झोक दी। अजमेर की टीम का लक्ष्य 2500 पूरा करने का था। इतने ईमेल, फेसबुक, वीडियो कॉल, आखिर प्रत्यक्ष सम्पर्क का असर दिखाई पड़ा। कुल पंजीकरण 3816 हो गये। अजमेर की टीम को शाबाशी। व्यवस्था की दृष्टि से लगभग 20-25 कार्यकर्ता अजमेर के बाहर से आकर भी काम में जुटे। परिषद् की यात्रा में यह परिवर्तन मील का पत्थर साबित होगा।

राजनैतिक परिदृश्य पर नवम्बर की नोट बंदी की घोषणा एक बड़ी घटना थी। पिछले दो वर्षों का सरकारी काम काज और प्रधानमंत्री जी की स्वीकार्यता को आम जनता ने हाथो हाथ लिया। नेता विरोध करने पर तुले रहे। जनता समर्थन देने पर तुली रहा। मीडिया कभी समर्थन और विरोध को दिखाकर अपनी गति से चलता रहा। निश्चय ही सरकार का यह कदम भारत के आर्थिक विकास की नई इवारत तो लिखेगा ही। अच्छे कार्यों के लिए सामान्य जन की सहनशीलता, असुविधाओं के प्रति उपेक्षा और सरकारी समर्थन की इवारत भी लिखेगा। लोकतंत्र का एक प्रमुख स्तम्भ है सशक्त विरोध पक्ष। मुद्दों का अभाव विरोध पक्ष को बेमानी कर गया। इसलिए सर्वोच्चन्यायालय को संसद के लगातार गतिरोध पर टिप्पणी करनी पड़ी। 2016 के समापन ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत जाग रहा है, खड़ा हो रहा है और संसार का नेतृत्व करने की क्षमता से सुसज्जित हो रहा है।

आइये 2016 को विदा करते समय 2017 की नई आशाओं, विश्वास के साथ जागृत नागरिक की भूमिका निभाने में जुट जाए।
                                                                                                                                                           - S.C. Gupta


March, 2017
भारतीय नववर्ष 2074 हमारा नववर्ष

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 28 मार्च, 2017 पिछले एक महीने में नव संवत्सर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर इतने लेख पढ़ने को मिले। ऐसा लगा मानो सारा देश नववर्ष के वैश्विक उपाख्यानों में भारतीय कैलेण्डर की ऐतिहासिकता और विश्वसनीयता का कायल हो गया। संसार में पारसी, यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्मों के नववर्ष प्रचलित है परन्तु इनकी काल गणना का आधार धार्मिक उपादान, ऐतिहासिक स्मरण अथवा सांस्कृतिक परिवेश की कुछ घटनाओं के कारण वे तर्क संगत नहीं है। जबकि कलि संवत, सृष्टि संवत, विक्रम संवत तथा भारत में नववर्ष पर मनाए जाने वाले पर्वों की एक सटीक और विश्वसनीय परम्परा है। अनेक पत्रिकाओं ने विश्व में नववर्ष की श्रृख्ला उनका आधार और पर्व के मनाने का विशेष उल्लेख किया। यह भारतीय मनीषा का वैशिष्टय है कि अपना नववर्ष तर्क संगत और मानवीय संस्कारों का उल्लासपूर्ण आयोजन माना जाता है। परन्तु एक प्रश्न कभी-कभी मन को द्रवित कर जाता है। हम श्रेष्ठ संस्कृति के प्रवर्तक, तर्क संगत आयोजनों के निर्माता, क्या हम अपनी विशेषताओं का जश्न उसी तरह मनाते है, उतना ही उत्साह प्रकट करते हैं जितना अपेक्षित है। कभी-कभी किसी त्यौहार को मनाते समय एक सर्द टिप्पणी आह बनकर निकलती है। अब अपने पर्वों में वह उत्साह, उमंग, सामूहिकता और आनन्द नहीं रहा। क्या हो गया। हम भी वहीं हैं, समाज भी वहीं है, तीज त्यौहार भी वहीं हैं आखिर उत्साह कहाँ चला गया। यह हमारे अन्दर है। उत्साह अन्तर्मन का विषय है। नव वर्ष के आयोजन से अन्तर्मन के इस उत्साह को सामूहिकता के साथ प्रकट करें तो हमारे पर्वों में जीवंतता आ जाएगी। इस अंक में नववर्ष मनाने की विधि तथा प्रसंग प्रकाशित किये गये हैं। नववर्ष मनाते समय यदि सुझावों का अनुपालन करेंगे तो नव संवत सार्थक होगा।

प्रौढ़ साधना शिविर के आयोजन फरवरी मार्च में क्षेत्रीय स्तर पर सम्पन्न हो रहे हैं। शिविर में भाग लेने वाले सदस्यों ने वर्ष भर परिषद् के सेवा कार्यों में क्या सहभागिता की इसका लेखा जोखा भी करना चाहिए। अगले वर्ष अपनी समीक्षा करने और नये प्रौढों को कार्य से जोड़ने का लक्ष्य रखें तभी हम सेवा निवृत्त बन्धुओं को सामाजिक कार्यों में लगा सकेंगे। यह प्रौढ़ साधना शिविर सामूहिक जीवन के अभ्यासों का एक मंच तो है ही, सामाजिक कार्यों में अपनी सक्रियता के संकल्प का समय भी है।

देश के कुछ राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। ये चुनाव 2019 के चुनावों की दिशा को निर्धारित करेंगे। दल बदलने की आंधी सभी राजनैतिक दलों में चल रही है। कभी उपेक्षा के कारण, कभी जातीय समीकरण के कारण कभी संसाधनों के अभाव के कारण जिसे चुनावी दंगल में जोर आजमाइश का मौका नहीं मिला तो दल बदल लेना आम बात हो गई है। शराब, पैसों का खेल, नोट बन्दी के बाद सवालों के घेरे में कितनी शराब, कितने करोड़ रुपये चुनाव के इस मौसम में जब्त होंगे। यह देखना भी मजेदार होगा। लोकतंत्र में सीटों की संख्या अथवा गठबन्धन के कारण सरकार तो बनती है पर वह क्या प्रदेश की जनता के मन की सरकार होती है, यह नहीं कहा जा सकता। इस बीच एक अच्छी खबर यह है जनता और संस्थाओं ने अधिकतम मतदान करने के प्रति विश्वास प्रकट किया है। लोकतंत्र की सफलता का यह एक मापदंड है।


 
 
 

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