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                                                    Niti Editorials : 2016

January सम्पादकीय

February

सम्पादकीय

March

सम्पादकीय

April

सम्पादकीय

May

सम्पादकीय

June

सम्पादकीय
July नमन् - डॉ॰ सूरज प्रकाश
August डॉ॰ सूरज प्रकाश जयन्ती (27 जून)
September सम्पादकीय
October सम्पादकीय
November सम्पादकीय
December सम्पादकीय

 

January, 2016
सम्पादकीय
राष्ट्रीय परिदृश्य में परिवर्तन कितनी तेजी से होता है इसका अनुमान लगाना हो तो गत मास के पत्रों की सुर्खियों का अध्ययन कर लें। विश्व के अनेक देशों में भारत का गौरव अपने शिखर पर पहुँच रहा है। यूरोपीय देशों सहित दक्षिण पश्चिम एशियाई देशों और अमेरिका के अप्रवासी भारतीयों ने शायद पहली बार भारतीय नेतृत्व के प्रति विश्वास व्यक्त किया। विश्वास और प्रमाणिकता का जो नजारा मोदी जी ने अनेक देशों के उद्बोधन में प्रकट किया वह वैश्विक निवेश के लिये हमारी आधारशिला बनी है। अफ्रीकी देशों के प्रति समन्वय और आत्मीयता का हाथ बढ़ाकर प्रधान मंत्री ने छोटे राष्ट्रों को भी भारत के साथ जोड़ने में सफलता प्राप्त की। मन्तव्य यही है कि भारत की आवाज को विश्व के देश तरजीह दें।

तस्वीर का दूसरा पक्ष देखिये- यू.पी., महाराष्ट्र और कर्नाटक की कुछ नृशंस घटनाओं पर छद्म धर्म निरपेक्षवादी असहिष्णुता को परिभाषित करने लगे। ऐसा लगा कि देश असहिष्णु हो गया हैं। पुरस्कार लौटाने का सिलसिला शुरू हुआ। राष्ट्रपति के दरवाजे पर दस्तक दी गई। फिल्म जगत की हस्तियों ने समयवद्ध तरीके से प्रतिक्रियाएं दी। लड़ाई बुद्धिजीवियों की थी इसलिए साहित्यकार, कलाकार, विचारक राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा के लिए मुखर हो उठे। यह समय इसलिए चुना गया कि बिहार राज्य के चुनाव को प्रभावित किया जा सके। बिहार प्रज्ञा की दृष्टि से मेधा का फलता फूलता क्षेत्र माना जाता है। लेकिन आम जनता आज भी प्रचलित रूढ़ियों से जकड़ी है और अपने स्थानीय संबंधों, जाति समीकरणों को तरजीह देती है। परिस्थिति ऐसी बन गई बिहार में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। यह संयोग ही है कि जिन विरोधाभासों, प्रतिक्रियाओं और क्रियान्वयन शैली पर आम जन स्पष्ट प्रतिक्रिया दे रहे थे, सत्ता पक्ष के केन्द्रीय नेतृत्व को उसका आभास तक नहीं हुआ। ऐसे में प्रशासन और संगठन का समन्वय एक विचारणीय विषय है।

यह समय देश की नियति को बदलने का समय है। यह समय राष्ट्रीय शक्तियों और धर्म परिपेक्ष ताकतों के संघर्ष का संक्रमण काल है। विरोधियों को अपने अस्तित्व का खतरा है लेकिन राष्ट्रवादी शक्तियों के लिए यह एक अवसर है देश का भविष्य निर्माण करने का। इन छोटी घटनाओं के दूरगामी परिणाम क्या होंगे यह समय के गर्भ में है। लेकिन अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिये एक अनिवार्य शर्त है-सुनियोजित प्रयास, आक्रामक प्रयास। हम एक विशाल शक्तिशाली विचार परिवार के अंग है। शान्त बैठकर परिस्थितियों का आकलन करने का समय नहीं है। समय है कुछ कर गुजरने का, देश के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने का, विरोधी ताकतों के छद्म रूप को उजागर करने का। सोशल मीडिया प्रिंट मीडिया, चौपालों पर वार्ताओं और वैचारिकी के माध्यम से राष्ट्रानुकूल वातावरण तैयार करना आज की आवश्यकता है। 

 -सम्पादक


February 2016
सम्पादकीय
संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त हुआ। जैसा कि आशा थी यह सत्र बहुत कम महत्व के कार्यों को सम्पादित कर सका। प्रतिदिन संसद की कार्यवाही और समाचारों ने आम जनता को यह सोचने पर विवश कर दिया कि एक बहुमत प्राप्त सरकार भी यदि संसद में राष्ट्रहित के काम करने में समर्थ नहीं है। ऐसी बहुमत वाली सरकार को यदि अल्पमत सांसद अपनी जोर-जबरदस्ती, दबाव एवं असंसदीय व्यवहार से बंधक बना सकते हैं तब देश का भविष्य क्या होगा। यदि सत्र का निष्कर्ष विचार किया जाए तो घटनाक्रम से उत्पन्न परिस्थिति में संविधान विशेषज्ञों, विश्लेषणकर्ताओं और राजनैतिक स्तम्भों को इसका वैकल्पिक मार्ग खोजने की आवश्यकता अनुभव करा दी। सत्र के दौरान कई ऐसी कपोल कल्पित घटनाओं का प्रचार कर केन्द्र सरकार धर्म निरपेक्षता, असहिष्णुता विषय जनता को दिगभ्रमित करने की कोशिश की गई। राजनैतिक टकराव का यह पूरा घटनाक्रम वर्तमान सरकार की उपलब्धियों के विरूद्ध विरोधी दलों की हताशा को प्रकट करता है।

नीति के बदलते स्वरूप पर आपकी प्रतिक्रिया मिलने लगी है। अनेक बन्धुओं ने पूछा क्या वे अपनी मौलिक रचनाएँ, लेख आदि भेज सकते हैं। अवश्य! आपका स्वागत है। रचनाओं का आकार, गुणवन्ता और विषय राष्ट्रीय अवधारणाओं के अनुकूल हो यही अपेक्षा है। परिषद् के भावी आयामों में आपकी नवोन्मेषी दृष्टि हमारे लिए पाथेय होगी। भारत को जानो का मोबाइल एप्पस पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बन्धुओं ने तैयार किया है। जल संरक्षण और जल संचयन भविष्य के महत्वपूर्ण और विचारणीय प्रकल्प होंगे। फरवरी की शासी मण्डल की बैठक में संशोधित संविधान प्रस्तुत होगा। देशभर में-जालंधर, सफीदों, दिल्ली, साहिबाबाद-गाजियाबाद, अलवर, जोधपुर, उज्जैन, कोलकता, नागपुर और विजयवाड़ा आदि में क्षेत्रीय अधिवेशन उत्साहवर्धक वातावरण में सम्पन्न हुए।

-सम्पादक


March 2016
सम्पादकीय
फरवरी का अंक क्षेत्रीय अधिवेशनों की आख्या और समूहगान (ग्वालियर) भारत को जानो (आगरा) राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के आलेखों का अंक था। अधिकांश अधिवेशनों में भागीदारी होने के कारण ऐसे अधिवेशनों के बारे में शाखा प्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया जानने का अवसर प्राप्त हुआ। राजनीति में राष्ट्रहित के विचारों का क्रियान्वयन पूरे समाज में दिखाई पड़ता है। आर्थिक विकास, सूचना तकनीकी का सामान्य जीवन में प्रयोग, वैश्विक संबंधों में सांस्कृतिक वैशिष्टय के आधार पर भारत का गौरव प्रत्यक्ष रूप में दिखाई पड़ रहा है। परन्तु क्या दिखाई नहीं पड़ता? कुछ वानगी देखिए! प्रधान मंत्री के विदेश प्रवास का खर्चा केवल 10» रह गया। प्रतिनिधि मण्डल के नाम पर विदेशी सैर सपाटा करने वाली भीड़ दहाई में सिमट गयी। आज का काम आज ही पूरा होना है, यह कार्य संस्कृति अनेक राज्य सरकारों की तत्परता को रेखांकित करती है। मानो काम पूरा करने की होड़ लगी है। कभी-कभी फेसबुक और व्हाॅटस्एप पर जो जानकारी शेयर होती है उससे लगता है पिछले 68 सालों का काम शायद पाँच साल में पूरा कर लिया जाएगा। राज्य सरकारे अंतिम व्यक्ति के दरवाजे पर दस्तक दे रही है। पंचायती राज और ग्राम प्रधान बने हाईटेक युवा गाँव के समग्र विकास की आंधी चला रहे है। प्रसंगवश एक ऐसे ही ग्राम प्रधान ने फर्राटेदार अंग्रेजी में मंत्री के सामने समस्याएँ रखी तो मंत्री ने कहा बेटा धीरे चलो। समस्या बताओ समाधान होगा। शायद युवा शक्ति विकास की आंधी चलाने को उद्यत है।

अधिवेशनों में उपस्थित राजनेताओं ने परिषद् के विकास कार्यों की सराहना की, सरकारी सहयोग का आश्वासन दिया। महामहिम राज्यपाल, केन्द्रीय मंत्री, कुलपति और विचारकों ने अधिवेशनों की शोभा बढ़ाई। लेकिन समय बार-बार परीक्षा लेता है। हैदराबाद के राहुल का मुद्दा भी मीडिया ने असहिष्णुता का मुद्दा बना दिया। ‘‘उन्नयन’’ स्मारिका की सम्पादिका डाॅ. कुमकुम कपूर ने अपनी व्यथा इन शब्दों में प्रकट की। ‘‘आज की राजनीति सुशासन या कल्याण की नहीं मुद्दों की राजनीति बन गई है। घटना का सही परिप्रेक्ष्य न समझ कर राजनैतिक स्वार्थ के लिए वाग भ्रम के आधार पर जनमानस को भ्रमित करना राजनीति का उद्देश्य बन गया है। नैतिक मूल्यों के आधार पर मूल्यांकन न होने के कारण ही नीर क्षीर का विवेकी मानस मन कंुठित होने लगता है। अतः हमें पुनर्जागरण और मूल्यों की पुर्नस्थापना के प्रयास तेज करने होंगे।’’

27-28 फरवरी, 2016 को परिषद् की सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई शासी मंडल की बैठक फरीदाबाद (हरियाणा) में सम्पन्न हुई। संविधान में संशोधन, विकेन्द्रित संगठन व्यवस्था के साथ-साथ ऐसे कार्यों के राष्ट्रीय लक्ष्य भी निर्धारित किये जाएंगे। नई ऊर्जा, नया उत्साह, नई प्रेरणा और समर्पण कार्य हमें यश प्रदान करेगा इसमें किंचित संदेह नहीं है।

होली का पर्व हिन्दू समाज में सामाजिक समरसता, उदात्त भाव एवं भारत जैसे कृषि प्रधान देश में नई फसलों के आने का मंगलमय पर्व है। अपने कठोर परिश्रम से धरती माता से प्राप्त खाद्यान्नों को प्राप्त कर किसानों का मन मयूर उत्साह और उमंग से नाच उठता है। इसी उल्लासमयी अनुभूति को स्थायित्व प्रदान करने के लिए होली का त्यौहार मनाया जाता है। प्राचीन पौराणिक दन्त कथाओं के आधार पर भक्त प्रहलाद को बुआ होलिका का समर्पण भी जन मानस को स्मरण कराता है। सामाजिक जीवन में द्वैष, ईष्र्या और कटुता को भूलकर सामन्जस्य की नई परिभाषा गढ़ने का प्रयास भी होता है। आधुनिक परिवेश में साधन सम्पन्न लोगों को अपने वंचित वर्ग के प्रति सौहार्द का भाव निर्माण करने का प्रयास होली का अभिप्रेत है। कमोवेश सारा समाज इस पर्व में उत्साह से भागीदारी करता है। परिषद् परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।

महाशिवरात्रि हिन्दूओं का एक प्रमुख त्यौहार है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व हैं। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारम्भ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा से रूद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते है। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया है। कई स्थानों पर यह भी माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह हुआ था। तीनों भुवनों की अपार सुन्दरी तथा शीलवती गौरां को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों व पिचासों से घिरे रहते हैं उनका रूप बड़ा अजीब है। शरीर पर मसानों की भष्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं और श्री-संपत्ति प्रदान करते हैं।


 

April 2016
सम्पादकीय
पिछले एक वर्ष में राष्ट्रवादी सरकार के आने के बाद परिस्थितियाँ बहुत तेजी से बदल रही है। आर्थिक विकास, वैश्विक प्रभाव, रक्षा संबंधी प्राथमिकताएं, अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों में जो उच्च सूचकांक परिलक्षित हुए वे उत्साह वर्धक हैं। राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों को अपने अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह और अनुवर्ती गतिविधियों पर विचार करना भी अपेक्षित है। दादरी, हैदराबाद, पूणे, कर्नाटक, केरल और मालदा की घटनाओं का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट है कि अल्पसंख्यकों अथवां दलितों पर घटित घटनाओं को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में मीडिया ने पूरी ताकत झोंक दी। साथ ही बहुसंख्यक समाज पर हुई हिंसक घटनाओं पर मीडिया चुप रहा। ऐसी घटनाओं पर मीडिया बहस को सुनकर समस्याओं से निरपेक्ष पक्ष और युवा वर्ग को यह संभ्रम होता है कि बहुसंख्यक समाज की ही जिम्मेदारी है इन घटनाओं को रोकना। बात यहाँ तक बढ़ जाती है जब राज्य की घटनाओं पर केन्द्र सरकार को और प्रधानमंत्री मोदी जी को जिम्मेदार बताया जाता है।

राष्ट्र विरोध के इस घटनाक्रम में देश के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरु विश्व विद्यालय में पाकिस्तान व आतंकवादियों का पक्ष लेकर देश को अपमानित करने, सैनिकों का मजाक उड़ाने और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देशद्रोही गतिविधियों ने देश के सामने अस्तित्व का प्रश्न खड़ा कर दिया है। आरक्षण आन्दोलन के मुद्दे पर बहुसंख्यक समाज को विभाजित करने की साजिश को भी इसी दृष्टि से देखना होगा।

मीडिया बहस के समय सैनिकों की शहादत, अभिव्यक्ति की आजादी, आतंकवादियों के महिमा मण्डल पर व्यथित फौजी अफसर गगनदीप बक्शी के देश की सोच पर अपने सैनिकों के स्वाभिमान पर लगी चोट सहन नहीं हुई। ‘मैं अकेला रह गया’ कहकर बक्सी रो पड़े। यह परिणति है करोड़ों राष्ट्र भक्तों को मौन रहने की। इतिहास साक्षी है कि राष्ट्र भक्ति की मशाल तभी तेज होती है जब देश बार बार इस संकल्प को दोहराता है। समाज के द्वारा राष्ट्रभक्ति का प्रकटीकरण ही उसकी शक्ति का धोतक है। आइये! हम सब देशभक्त नागरिक सजग होकर राष्ट्र विरोधी ताकतों के खिलाफ सक्रिय भूमिका से खड़े हों अन्यथा हम भी इतिहास के पन्नों में सिमट जायेंगे।


May 2016
सम्पादकीय
देश का राष्ट्रीय परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। कुछ समय पूर्व तक आजादी की माँग, अभिव्यक्ति की आजादी पर भावात्मक जुबानी पैतरेवाजी धीरे-धीरे शान्त हो गई है। मीडिया भी आखिर कब तक वही घिसी पिटी कहानियाँ दिखाकर कन्हैया के भाषणों पर परिचर्चा करके, कब तक टी.आर.पी. बटोरता। जे.एन.यू. से शुरू हुई क्रान्ति की मशाल का रंग भी धीमा पड़ गया। मीडिया के कुछ चैनलों को जब अपनी प्रासंगिकता और विश्वसनीयता खतरे में दिखाई पड़ी तो धीरे से ही क्यों न हो पाला बदलने की कवायद शुरू हो गई। ओवैसी के बयान पर जाबेद अख्तर ने वो छक्का जड़ा कि आखिर में ओबैसी जय हिन्द बोल ही गये। जिस देश में सत्ता पक्ष पर इतने गंभीर आरोप लग रहे हो, विरोधियों के द्वारा सरकार की उपलब्ध्यिों पर गंभीर टिप्पणियाँ हो रही हो, मीडिया और वामपंथ सत्ता के विरोध में पूरी ताकत झोक रहा हो, वहाँ सरकार अविचल विश्वास, पूरे संकल्प के साथ देश की विकासशील योजनाओं को आगे बढ़ाने में लगी है। यही आत्म विश्वास है मोदी सरकार का।

क्रान्तिकारी भगत सिंह के बारे में दुराग्रहपूर्ण टिप्पणी हो या वीर सावरकर के प्रति अपमान जनक टिप्पणी का मामला हो। देश के बुद्धिजीवी एवं राष्ट्रवादी विचारकों ने मुहतोड़ जबाव देकर स्वनाम, वैचारिक दरिद्रों को हाशिये पर पहुँचा दिया। देश के कुछ राज्यों में चुनावों का डंका बज गया है। सीमावर्ती राज्य असम, संवेदनशील राज्य है जो अनेक वर्षों से बांग्लादेशी घुसपैठ से उत्पन्न जनाकिकीय असंतुलन का परिणाम भुगत ही रहा है। हिंसक आन्दोलनों के कारण राज्य का विकास अवरूद्ध हो गया। समस्याओं से जूझता पूर्वोत्तर क्षेत्र चीन की गीदड़ भभकी नक्सलवाद, बोडो आन्दोलन और ईशाई मिशनरियों की कुटिल चालों से जूझती सरकार सामाजिक, आर्थिक और वैश्विक कूटनीति पर सफलता से आगे बढ़ रही है।

जनता देख रही है, समझ रही है। भारत को बाह्य कुचक्रों में फंसाकर पथ भ्रमित किये जाने के प्रयास चरम पर है। परिषद् के सदस्य के रूप में ऐसी राष्ट्रद्रोही घटनाओं पर सटीक प्रतिक्रिया अपेक्षित है। देश की सम्पूर्ण राष्ट्रवादी सोच को एकरूप संगठित सामथ्र्य प्रदर्शित करने का यह अनुकूल अवसर है। जे.एन.यू. के प्रकरण पर आई त्वरित प्रतिक्रिया इसका उदाहरण है। यह विचारधाराओं का संघर्ष भी है। प्रतिस्पर्धा और समन्वय का संघर्ष भी है। इतिहास में आये अनुकूलता के अवसर को अपने राष्ट्रहित की सम्भावनाओं में परिवर्तित कर लें। यही अपेक्षा है।

- सम्पादक


June 2016
सम्पादकीय
भारतीय संस्कृति ने सदैव शाश्वत सत्य के आधार पर मानव जीवन के व्यवहार और नियमों के सूत्र प्रस्थापित किये। प्राचीन मनीषियों ने सनातन धर्म की मान्यताओं में समाज में महिलाओं के स्थान के बारे में जिन मूल्यों का प्रतिपादन किया होगा वे उस युग के अनुकूल एवं मान्यताओं के अनुरूप होगी। बदलते परिवेश में समाज के विभिन्न स्रोतों में सांस्कृतिक मान्यताओं के काल वाह्य होने के कारण उनकी मान्यता समाप्त हो गई। इन स्थानों पर नई युगानुकूल व्यवस्थाएँ हर क्षेत्र में धीरे-धीरे स्थापित हो रही है। नारी शक्ति के बारे में प्रचलित रुढ़ मान्यताएँ न केवल चरमरा रही है वरन उनके नये संस्करण भी निर्माण हो रहे हैं। नारी शिक्षा के साथ आज समाज के उन सभी क्षेत्रों में महिलाओं का प्रवेश हो गया है जो पूर्व काल में पुरुषों के लिए आरक्षित रही। शिक्षा, बैंकिंग, व्यापार, तकनीकी, स्वास्थ्य, अनुसंधान, अंतरिक्ष, सेना आदि क्षेत्रों में महिलाओं ने अपनी स्वीकार्यता स्थापित कर ली है।

कुछ समय पूर्व केरल के सबरीमाला एवं महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं का प्रवेश चर्चा का विषय रहा। कुछ संघर्ष भी हुआ। अच्छा हुआ मंदिर की समिति ने ही नारी समाज के लिए गर्भगृह के द्वार खोल दिये। चर्चा अब दक्षिण के अन्य मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश की है। न्यायालयों ने इस संबंध में अनुकूल रवैया अपना लिया है। यह नारी के मानवाधिकारों का भी एक विचारणीय विषय है। देर सबेर समाज इसकी स्वीकार्यता कर देगा।

रोहित वेमुला की माँ और भाई ने मुम्बई में बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। बाबा साहब अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म की रीतियों से क्षुब्ध हो कर जब धर्म परिवर्तन का मन बनाया तो समकालीन नेताओं के सुझाव पर ही उन्होंने भारतीय मूल के बौद्ध धर्म को अपनाया। देश का बहुसंख्य हिन्दू समाज भगवान बुद्ध को अवतार एवं बुद्ध के उपदेशों को दैविक मान्यताओं के रूप में मानता है। बौद्ध धर्म अपनाने से राष्ट्र निष्ठा को आंच नहीं आती। असहिष्णुता, वैचारिक द्वेष, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर चला संघर्ष भविष्य में भी राष्ट्र निष्ठा से जुड़ा रहेगा। यह बाबा साहब का भारत को अमूल्य योगदान है।

वैश्विक जगत में इस्लामी आतंकवाद से त्रस्त यूरोपीय तथा मध्य पूर्व के देश अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। भारत में अल्प संख्यक समुदाय की महिलाओं ने न केवल शैक्षिक ऊँचाईयाँ प्राप्त की है वरन लेखन राजनीति, प्रबन्धन और विशेषज्ञता के नये आयाम स्थापित कर लिये हैं शरिया के नाम पर लगभग 30 साल पहले इतिहास ने करवट ली थी। शाहवानों के प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को संविधान ने उलट दिया था। इतिहास अपने को दोहराता है। फिर एक बार शायरा बानो ने मानवाधिकार की रक्षा के लिए न्यायालय में दस्तक दी हैं समय बदल चुका है। उस समय शाहबानो अकेली पड़ गई थी और अल्पसंख्यकों के सामने घुटने टेक,े कांग्रेस की सरकार थी। आज शायरा बानो के पक्ष में शाइस्ता झंवर, डाॅ. नाहिद जाफर, मुमताज जहाँ और अस्माखान जैसी नेतृत्व देने वाली महिलाएं हैं। यह मुस्लिम महिलाओं के मानवाधिकारों का प्रश्न है, उनके सम्मान का प्रश्न है। शरिया के नुमाइन्दों को बदलती हवा के रूख को पहचानना चाहिए। देर सबेर यह संघर्ष भी जीत की भट्टी से तप कर निकलेगा।

इसलिए साक्षरता नहीं शिक्षा, केवल व्यवसायिक शिक्षा नहीं वरन संस्कार युक्त शिक्षा देश की प्रगति का आधार बनेगी। पविर्तन की यह गति जितनी तेज होगी, भारत एक सर्वशक्ति सम्पन्न राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा।


July 2016
नमन् - डॉ॰ सूरज प्रकाश
परिषद् की कार्य प्रगति पर है। जो कार्यकर्त्ता आज परिषद् के प्रति समर्पित भाव से कार्य में लगे हैं उनमें से बहुत कम लोगों को डॉ॰ सूरज प्रकाश के व्यक्तित्व और कृतित्व का साक्षी बनने का अवसर मिला। मन में एक भाव उभरा आज के कार्यकर्ताओं को अपने संस्थापक महामंत्री के बारे में उस समय के यशस्वी महानुभावों ने उद्गार प्रकट किये उनकी वानगी देने का प्रयत्न किया जाए।
जून, 1991 की नीति का अंक उनको समर्पित था। नीति के सम्पादक एस.पी जैन (मेरठ) ने उन्हें
Dedication personified कहा। न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना (तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष) - Dr. Suraj Prakash was the heart & soul of the organization. It was under his stewardship that BVP has now came to occupy a unique position as a socio cultural organization.  श्री पी.एल.राही (तत्कालीन राष्ट्रीय महामंत्री) के शब्दों में A disciplined person a sticker of punctuality. न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा (उपाध्यक्षद्ध कहते हैं Dr. Suraj Prakash wa a man of towering personality and indomitable. determination. ठाकुर राम सिंह जी लम्बे समय परिषद् के केन्द्रीय मार्गदर्शक रहे उनके अनुसार His bigger contribution to the regeneration of the nation was Bharat Vikas Parishad. डॉ॰ महावीर, वीरेन्द्र मोहन त्रेहान, प्रकाश चन्द्र जी, पी.एन.सेठ, विजय राज तातेड़ (मुम्बई) गोविन्द नारायण, डॉ॰ एल.एम.सिंघवी, बलराज मधोक, रामेश्वर प्रसाद गोयल (प्रयाग), जे.पी. श्रीवास्तव (पटना) वी. सुब्बा राव (हैदराबाद) डॉ॰ शान्ति स्वरूप चढ्ढ़ा (जयपुर) आदि अनेक सहयोगी कार्यकर्ताओं ने उनके जीवन से प्रेरणा ली और परिषद् कार्य के लिए अपने को समर्पित किया। उस समय पंजाब प्रान्त की अध्यक्षा श्रीमती प्रेम एन. कुमार ने अपने नमन् वक्तव्य में कुछ घटनाओं का उल्लेख किया, इन्हें अन्यत्र प्रकाशित किया जा रहा है। आज हम छोटी बातो पर मतभिन्नता की प्रतिक्रिया कर देते हैं। डॉ॰ साहब का विश्वास था समग्रता का विचार करेंगे तो छोटी बातों के लिए स्थान नहीं है। आखिर हम महान् लक्ष्य लेकर चलें हैं।

अभी देश के कुछ प्रदेशों में चुनाव सम्पन्न हुए। केरल में वामपंथी दल विजयी रहे। जीत के नशे मे 70-80 भाजपा कार्यकर्ताओं को मार-मार कर अस्पताल पहुँचा दिया। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी जीती। भाजपा की महिला कार्यकर्ताओं को पीटा। प्रत्याशी रूपा गांगुली जब बचाने गई तो उन्हें मार-मार कर अस्पताल पहुँचा दिया। चुनाव तो असम में भी हुए। भाजपा ने ऐतिहसिक जीत हासिल की। लेकिन वहाँ एक तिनका भी नहीं हिला। यही है Party with a difference.

हम एक विचार समूह के अनुयायी हैं। हमें अपनी मानवीय परम्पराओं और जीवन मूल्यों पर आस्था है। संगठन कोई छोटा बड़ा नहीं होता सभी का अपना कार्यक्षेत्र होता है। सभी की अपनी कार्य पद्धति होती है। परन्तु राष्ट्रीय अस्मिता की सोच के कारण सभी का व्यवहार एक सा होता है। परिषद् की समस्त शाखाएँ एक विशाल भारतीय जीवन दर्शन के बट वृक्ष की ही शाख्साएँ हैं। अन्ततः राष्ट्रहति का सोच, सम्पूर्ण समाज के कल्याण की सोच, विकास की सोच, देश को आगे बढ़ाने की सोच यही हमारी तपस्या है यही पाथेय है।

स्थापना दिवस पर आयोजन करते समय इन्हीं आदर्शों का विचार करें। दिवस की प्रासंगिकता के लिए एक सेवा कार्य का आयोजन सम्मिलित करें। केवल उपदेश, केवल भाषण हमें रोचकता तो दे सकते है।, लेकिन सेवा का एक कार्य हमें मन की शान्ति प्रदान करता है। -scguptafbd141@gmail.com
 

August 2016
डॉ॰ सूरज प्रकाश जयन्ती (27 जून)
पर्यावरण दिवस (5 जून), विश्व योग दिवस (21 जून) और अब शेष रहे प्रान्तों की कार्यशालाएँ परिषद् की शाखाओं ने पिछले कई सालों के रिकार्ड तोड़ दिये। पर्यावरण दिवस पर गोष्ठी, रैली, जागरूकता अभियान और वृक्षारोपण की जैसे झड़ी लग गई है। फिर आया विश्व योग दिवस। शाखाओं मे योग का एक मास का शिविर, कही योग सप्ताह में सात दिन का शिविर, 21 जून को तो सभी शाखाओं ने भागीदारी की। प्रभावी शाखाओं ने तो अगुवाई की। नगर की सभी संस्थाओं को सामूहिक योग शिविर में बुलाया। आर्ट ऑफ लिविंग, पतंजलि योग पीठ, विवेकानन्द केन्द्र, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विद्या भारती का समन्वय स्थापित होकर योग किया गया। एक शाखा ने तो सामूहिक योग शिविर साधकों के लिए 10000 साधकों को जल सेवा की। विश्व के सौ से अधिक देशों में बड़े योगाभ्यास हुए। संयुक्त राष्ट्र यदा कदा किसी महत्वपूर्ण विषय पर अन्तर्राष्ट्रीय दिवस की घोषणा करता है। महिला दिवस, बाल दिवस, मातृ दिवस, पितृ दिवस, महिला उत्पीड़न, नशा मुक्ति, कैंसर, कुष्ठ, डायबिटीज आदि अनेक दिवस विश्व के सदस्य देशों में प्रचलित है। इतना प्रचलन होने पर भी इनका वैश्विक प्रभाव नहीं हो पाता है। जबकि दूसरे वर्ष के योग शिविर पर अमेरिका, यूरोप से लेकर चीन, जापान और मध्य एशिया के देशों ने योग के प्रति उत्साह दिखाया। कारण क्या है। शाश्वत कारण तो यही है कि योग शरीर, मन, बुद्धि को संयमित करने का सिद्ध एवं वैज्ञानिक माध्यम है। लेकिन योग के साधक एवं अध्येता पहले से जानते थे कि यह वैज्ञानिक पद्धति है। ध्यान आता है कि पाकिस्तान आक्रमण के समय (1965) परिस्थिति की गम्भीरता को देखते हुए जब जननायक प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश की जनता से सप्ताह में एक दिन सोमवार का भोजन न करने की अपील की थी। देश के घरों और होटलों में खाना बन्द हो गया था। आज वर्ष 2015 में जब जननायक योग सिद्ध प्रधनमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने देश और पूरे विश्व में योग की महता बताई तो सारा संसार योग का मुरीद हो गया। अमेरिका सहित अनेक देशों में सामूहिक योग के चित्र समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए। बालीवुड की नेत्रियों ने भी शाकाहार और योग को अपनी सुन्दरता का राज बताया।

राजनीति की कुंठाएँ इतनी गहरी होती है कि कुछ राजनैतिक बिदूषक योग का मजाक उड़ाने से नहीं चूके। देश के स्वच्छ भारत अभियान को जब जनता ने सर आँखों पर उठा लिया। केन्द्रीय शिक्षण, औद्योगिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संस्थानों ने जब स्वच्छ भारत की ओर सार्थक कदम बढ़ाया तो एक बार फिर असहमति की राजनीति ने रास्ता रोकने की असफल कोशिश की। दुनिया के सभी देशों में राष्ट्र हित की बात सभी राजनैतिक करते हैं। चाहे वे सत्ताधारी हो या विपक्षी दल। भारत दुनिया का एक मात्र देश है कि हमारी अपनी बनाई हुई नीति को यदि दूसरे दल की सरकार लागू करती है तो हमारा काम विरोध करना है। क्या यह असहमति के अधिकार का दुरूपयोग नही है। विचार करें।
 -scguptafbd141@gmail.com


September 2016
सम्पादकीय
सितम्बर मास में संस्कृति सप्ताह, पौधारोपण और गुरु वन्दन छात्र अभिनन्दन के कार्यक्रमों की भरमार रहेगी। विघ्नहर्त्ता गणेश का जन्म याने गणेश चतुर्थी हमारे पर्वों में अभूतपूर्व स्थान रखता है। वे ज्ञान और सम्पत्ति के भगवान हैं। बच्चों में वे संकट मोचन गनेशा के नाम से विख्यात हैं। मूलतः महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की परम्परा सामाजिक प्रेरणा का स्रोत बनी है। गणेश चतुर्थी के दिन गणपति को अपने घर में स्थापित कर उनकी पूजा का प्रावधान है। 10 दिन घर पर रखने के बाद अनन्त चतुर्दशी के दिन गणपति विसर्जन किया जाता है।

यह मास पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन के जन्म दिन (5 सितम्बर) पर उन्हें स्मरण करने का भी दिन है। श्रेष्ठ दार्शनिक, चिन्तक, विचारक और दर्शन शास्त्र के उद्भट विद्वान और आदर्श शिक्षक होने के कारण राष्ट्र उनके जन्म दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है। गुरु और शिष्य के संबंधों की भारतीय दृष्टि से जो महत्ता है उसे परिषद् की शाखाओं में गुरु वन्दन छात्र अभिनन्दन के रूप में प्रतिभा सम्मान, शिक्षक सम्मान के रूप में मनाते हैं। भारत के भविष्य को प्रेरक और गौरवशाली बनाने में युवा पीढ़ी का अमूल्य योगदान असंदिग्ध है। सन्त विनोबा भावे के शब्दों में ‘‘देश का आने वाला कल इस बात पर निर्भर करता है कि कल को दिशा देने वाले कौन हैं’’ इन शब्दों से भविष्य के निर्माता शिक्षकों की भूमिका का महत्व और भी बढ़ जाता है। आज भी हमारे शिक्षार्थी अपने शिक्षकों के ज्ञान के साथ जीवन शैली, अनुभवशीलता, सद्व्यवहार, शिक्षा के प्रति उनके समर्पण और विद्यार्थियों के प्रति उनकी सदाशयता से प्रभावित होते हैं। जब कि पाश्चात्य संस्कृति में सूचनाओं का भंडार, शिक्षा में गुणवत्ता, शिक्षा पद्धति को सैद्धान्तिक विषय मानकर शिक्षकों के चरित्र व्यवहार सदाशयता का कोई महत्व नहीं है। शिक्षक का व्यतिगत जीवन और सामाजिक या शैक्षिक जीवन अलग-अलग परिभाषित है। हमारी संस्कृति का यह वैशिष्ट्य है कि यहाँ शिक्षक का अन्तर्वाह्य जीवन एक रूप होता है। इस अंक में गुरु के बारे में महान विचारकों, संतों के विचार संकलित किये गये हैं (पृष्ठ संख्या 31)। वर्तमान तकनीकी युग में वैज्ञानिक अनुसंधान, सूचना प्राद्यौगिकी, कम्प्यूटर शिक्षा और वैश्विक बाजार की चुनौतियों से युवाओं ने अपने कैरियर को ही जीवन का लक्ष्य मान लिया है। लेकिन आज सारा विश्व इन भौतिक उपलब्धियों को अंतिम लक्ष्य मानने से गुरेज करने लगा है। कारण भौतिक उपलब्धियाँ सदैव प्रतिस्पर्धा, संघर्ष और ईर्ष्या को जन्म देती है। एक बार फिर भारत जाग रहा है। भारत की ज्ञान की अजस्रधारा विश्व को आबद्ध करने को मचल रही है। खुशखबरी यह है कि भारत का युवा अपने सांस्कृतिक जीवन मूल्यों से जुड़कर संसार को शाश्वत ज्ञान देने में सक्षम हो रहा है। युवा अनुशासनहीनता, पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव, नैतिक जीवन मूल्यों का ह्रास बीते समय की बाते हो गई है। शिक्षक दिवस पर समस्त पाठकों को बधाई।  -scguptafbd141@gmail.com


 

October, 2016
सम्पादकीय
अक्टूबर मास का प्रारम्भ! 2 अक्टूबर देश के दो महान् नेताओं का जन्म दिवस है। पूज्य बापू ने अपने सरल, सादे और निश्छल व्यवहार से भारत के जन-जन में अपना स्थान बनाया। अहिंसा और सत्याग्रह के बारे में उनकी अविचल आस्था के प्रमाण उनके जीवन प्रसंगों से मिलते है। देश की स्वतंत्रता में उनके योगदान के कारण देश उन्हें राष्ट्रपिता के रूप में स्मरण करता है। संयोग ही है कि इसी दिन देश के दूसरे प्रधानमंत्री गुदरी के लाल लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्म दिन है। अत्यन्त साधारण परिवार, शिक्षा के प्रति उनकी लगन, बनारस के कण-कण में रमा शास्त्री जी का सादगी पूर्ण निष्कपट जीवन उसका उदाहरण है। वर्षों से इन महापुरुषों का स्मरण भारतीय जन मानस नव चेतना के रूप में करता रहा है।

पिछले वर्ष जब 2 अक्टूबर को राष्ट्रीय स्वच्छता दिवस घोषित हुआ तो, इस तिथि को अधिक महात्म्य प्राप्त हुआ है। चैतन्य शील नेतृत्व ने सर्व दूर स्वच्छता को एक आन्दोलन बना दिया। पिछले मास राष्ट्रीय महत्व की दो बड़ी घटनाएँ हुई। जम्मू कश्मीर की सरकार केन्द्र सरकार और नागरिक संगठनों के संयुक्त प्रयास से कश्मीर के हिंसक वातावरण को दुरस्त करने के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल ने राज्य का दौरा किया। कुछ स्वनामधन्य नेताओं ने अलगाववादियों से बातचीत की असफल कोशिश की। कश्मीर में अलगाववादियों को अलग-थलग कर आम कश्मीरी नौजवानों की प्रगति से समस्या का समाधान होने के सबूत मिल रहे हैं।

संगति ठीक न हो तो विचारों में कैसा भ्रम निर्माण हो जाता है। इसका एक उदाहरण चर्चा का विषय रहा। एक निष्पक्ष और सटीक पत्रकार श्री आशुतोष अपनी पार्टी के नेताओं को बचाने में गाँधी, लोहिया, नेहरु जैसे महान् राजनेताओं पर कीचड़ उछाल बैठे। सफाई देंगे। बात आई गई हो जाएगी। लेकिन निश्चित ही आशुतोष को इसका पाश्चाताप होगा।

परिषद् के लिए अक्टूबर मास संस्कार प्रकल्पों-समूहगान और भारत को जानो के शाखा एवं प्रान्त स्तरीय प्रतियोगिताओं को पूरा करने का मास है। शारदेय नवरात्रि और विजय दशमी का पर्व हमारे लिए माँ दुर्गा के स्तवन, पूजन और कन्याओं के अर्चन का समय होता है और समाज की विजिगीषु वृत्ति को आन्दोलित कर भगवान राम के विजय पर्व के स्मरण का दिन भी है। देश में बेटियों के मान सम्मान उनकी शिक्षा दीक्षा और सामाजिक सुरक्षा के लिए राजकीय और सामाजिक स्तर पर जो प्रयास किये जा रहे है। उनसे सामाजिक सोच में परिवर्तन आ रहा है। तभी तो परिवारों में बेटियों के लिए अक्सर बेटे का सम्बोधन आम हो गया। साक्षी और सिन्धु की विजय पताका ने तो मानों बेटियों के लिए किये जा रहे प्रयासों को प्रमाणित कर दिया। बेटी बचाओ के प्रकल्प ने परिषद् में महिला एवं बाल विकास प्रकल्प में एक लहर उत्पन्न की है। शाखा तथा जिला स्तर पर महिला सम्मेलन के उत्साहवर्धक समाचार इसके प्रमाण है। प्रान्तीय स्तर पर सम्मेलन और रीजनल स्तर पर प्रशिक्षण कार्यशालाएँ आयोजित होनी है। दिसम्बर में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन अजमेर में परिषद् का समवेत स्वरूप देखने को मिलेगा। आने की तैयारी करें।

देश जाग रहा है। सामान्य जन राष्ट्रीय सरोकार में अपनी भागीदारी अनुभव करने लगे हैं। विश्व के परिदृश्य में भारत एक बार अंगड़ाई लेकर खड़ा हो रहा है। हमें साथ सोचने, साथ चलने, साथ रहने की आदत डालनी होगी।
 -डॉ. सुरेश चन्द्र गुप्ता


November, 2016
सम्पादकीय
देश में पर्यावरण अनुकूल पर्वों के मनाने का समय दस्तक दे रहा है। हम पर्यावरण का संरक्षण तो चाहते हैं लेकिन पारम्परिक शैली को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। ईको फ्रेंडली दीवाली, गणेश पूजा, छठ और होली मनाने के समाचार मिलने से पर्यावरण के प्रति जागरूकता के संकेत मिलते हैं। मुम्बई और पूरे महाराष्ट्र में ईको फ्रेण्डली गणेश पूजा का प्रचलन तेजी से बढ़ा है। नारियल, सुपारी, प्राकृतिक रंग, मिट्टी तथा गोंद से मूर्ति बनायी गयी। मुम्बई के मूर्तिकार दत्तात्रये ने ट्री गणेशा के नाम से गमले में स्थित मिट्टी के गणेश की 4000 आकर्षक प्रतिमाओं में फल, फूलों के बीज भरकर तैयार किया। रोज जलाभिषेक करने से फूलों के पौधे गमले में निकल आये। स्प्राउट गणेशा के निर्माण में गेहूँ, मक्का के आटे का प्रयोग कर विसर्जन में मछलियों को भोजन प्रदान किया। जब गणेश की ईको फ्रेंडली प्रतिमाएँ बिक सकती है तो दीपावली पर प्रतिमाएँ और पटाखे ईको फ्रेंडली क्यो नहीं हो सकते। वक्त गुजरने के साथ ईको फ्रेंडली पटाखों की मांग बाजार में बढ़ी है। ईको फ्रेंडली पर्वों के क्रम में खुशखबरी यह है कि लखनऊ में बकरीद के आयोजन पर मुस्लिम समाज ने बकरे की आकृति का केक काटकर बकरीद मनाई। सोशल मीडिया पर मासूम बकरे की मार्मिक व्यथा की फोटो शेयर हुए। बांगला देश में खून से रंगी सड़को पर बकरीद के विभत्स दृश्य देखकर हृदय कांप उठता है। यह शुभ संकेत है। पर्यावरण की सकारात्मक सोच तभी आकर ले सकेगी जब धर्म प्राण समाज इसके महत्व को स्वीकार करेगा। आइये अपने पर्वों को ईको फ्रेंडली बनाकर देश की प्रगति में भागीदारी निभाएँ।

उड़ी के सेना मुख्यालय पर सोते सैनिकों पर अचानक हमला कर हत्या करने का कायराना अंदाज कोई कर सकता है तो वह पाकिस्तान ही है। लेकिन राष्ट्रीय नेतृत्व की इच्छा शक्ति और दृढ़ता का परिचय देकर राष्ट्र ने कुछ भरपाई तो कर ही ली। देश के नौजवानों का खून खौल उठा। रैलियाँ निकली, कैंडिल मार्च निकले। शहीद सैनिकों के गाँवों में मेला लगा रहा। मानो यह हमला कश्मीर पर नहीं राष्ट्र की अस्मिता पर था। तिलमिलाया पाकिस्तान, पड़ोसी देशों की सहानुभूति भी नहीं जुटा पाया। सदस्य देशों ने दक्षेस सम्मेलन का वहिष्कार कर पाकिस्तान को उसकी औकात बता दी। पाकिस्तान के अन्दर सैनिक अत्याचारों से जूझती जनता भी पाकिस्तान से मुक्ति का उद्घोष कर रही है। राजनैतिक दलों, विचारकों, सैन्य विशेषज्ञों, सांसदों ने एक स्वर से सैनिक कार्यवाही की सराहना की। यह नेतृत्व के लिए गौरव की बात है।

राष्ट्रीय अधिवेशन अजमेर (राजस्थान) की आयोजन समिति आपके स्वागत के लिए अनुकूल व्यवस्था, सुस्वाद भोजन, आरामदायक आवास की तैयारी में जुटी है। अधिवेशन में प्रान्तों की सक्रिय भागीदारी अपेक्षित है। विचारों और अनुभवों को साझा करने का अवसर हमेशा नहीं मिलता। प्रदर्शनी, डिजिटल डिस्प्ले प्रकल्पों की सचित्र गाथाएँ और श्रेष्ठ मनीषियों का उद्बोधन अधिवेशन के कुछ आकर्षण होंगे। पंजीकरण और यात्रा टिकट का आरंक्षण मैंने करा लिया है। आपने कराया क्या?      -डॉ. सुरेश चन्द्र गुप्ता


December, 2016
सम्पादकीय
18 सितम्बर के कश्मीर के सीमा क्षेत्र पर उड़ी के सेना मुख्यालय पर बरबर पाकिस्तानी आतंकियों ने सोते हुए जवानों पर हमला करने की घटना ने देश को झकझोर दिया। समाज आक्रोशित हो उठा। बदला लेने की आवाजे सब ओर से सुनाई पड़ने लगी। सरकार क्या कर रही है, कहाँ गया 56’’ का सीना! सरकार सकते में थी। शर्मनाक स्थिति थी। तभी 28 सितम्बर को खबर आई पाकिस्तान की सीमा में घुसकर आतंकी शिविरों को नष्ट किया। 8 लॉचिंग पैड तोड़ दिये। बड़ी संख्या में आतंकी और सैनिक मारे गये। 5 घण्टे चले इस ऑपरेशन को पूरा कर सेना के कमाण्डों सुरक्षित वापस लौट आये देश का जोश, सेना की शान बढ़ी। समाज ने सेना की कार्यवाही का खुलकर समर्थन किया और फिर शुरू हुआ सियासत का बदरंग खेल। सर्जिकल स्ट्राइक हुई ही नहीं। मुठभेड़ फर्जी थी। स्ट्राइक का श्रेय सेना को दें। आगामी चुनाव में सर्जिकल स्ट्राइक के खिलाफ प्रचार अभियान। पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक हुई थी। कुछ लोग तो सबूत मांगने लगे। देश का माहौल किस दिशा में जा रहा है। ऐसा भाप कर मीडिया के एक वर्ग ने पाक अधिकृत सैनिक ऑफीसर का सर्जिकल स्ट्राइक का साक्षात्कार प्रकाशित कर दिया। स्ट्राइक के चश्मदीदों के बयान हमले की पुष्टि करने लगे तब जाकर बहस रूकी। सिने कलाकारों का पाक प्रेम अचानक उमड़ पड़ा। कारण-पाक कलाकारों की फिल्मों में लगी करोड़ों की रकम डूबने का खतरा। एमएनएस की धमकी से ऐसे दुराग्राही लोग की बुद्धि ठिकाने लगी। इतना ही नहीं विश्व के प्रमुख देशों को जानकारी देकर भारत ने अपना पक्ष रखा और वैश्विक जनमत को साध लिया।

वर्ष 2017 में कुछ प्रमुख राज्यों के चुनाव होने है। सभी दलों का ध्यान उत्तर प्रदेश पर है। ऐसे में समाजवाद की परिभाषा को विकास के साथ जोड़ने का संकल्प लिया। उ॰प्र॰ का प्रशासन पारिवारिक कलह की भेंट चढ़ गया। समझौते के आसार कम ही है। तात्कालिक समझौता हो भी गया तो गाँठ तो पड़ ही गई। सबसे पुराने राजनैतिक दल कांग्रेस की स्थिति दयनीय हो गई है। लगता है कि उ॰प्र॰ चुनाव के बाद कांग्रेस अपने अस्तित्व को बचाने में असफल हो जाएगी।

केरल में राष्ट्रवादी शक्तियों के उभार से उतेजित कम्यूनिस्ट हिंसा पर उतर आये हैं। शरिया कानून के क्रियान्वयन पर मुस्लिम महिलाओं का बढ़ता विरोध, तीन तलाक पर सरकार का हलफनामा ऐसी अनेक समस्याओं के बीच केन्द्र सरकार विकास के रथ को आगे बढ़ा रही है। यह प्रशंसनीय है। वन्दनीय है।

राष्ट्रीय अधिवेशन की तैयारियाँ चरम पर है। राष्ट्रीय अधिवेशन में पंजीकरण और यात्रा ब्यौरा व्यक्तिगत रूप से करना अपेक्षित है। सभी दायित्वधारी अपने क्षेत्र के प्रतिनिधियों में तभी प्रेरणा दे सकते हैं। जब वे अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर चुके हैं। जब तक ‘नीति’ का यह अंक आपको मिलेगा तब तक पंजीकरण की तिथि समाप्त हो चुकी होगी। अति व्यस्तता के कारण पंजीकरण नहीं हुआ। ऐसा कहने का अवसर न आवे। अब तो बिलम्ब शुल्क देकर ही पंजीकरण होगा। यह आयोजन अनेक दृष्टि से महत्वपूर्ण आयाम स्थापित करेगा। परिवर्तन की घड़ी में आप साक्षी रहे यही निवेदन है।

 

 
 

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