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                                                    Niti Editorials : 2015

January सम्पादकीय

February

नीति के लिए महामंत्री डॉ. के.एल.गुप्ता जी का अंतिम सम्पादकीय
March सम्पादकीय
April सम्पादकीय
May सम्पादकीय
June सम्पादकीय
July सम्पादकीय
August सम्पादकीय
September सम्पादकीय
October सम्पादकीय
November अहंकार का शमन करें
December सम्पादकीय

 

January, 2015
सम्पादकीय

जनवरी 2015 अर्थात् वर्ष 2014 से 2015 में परिवर्तन का प्रथम माह भारत के सन्दर्भ में इसके सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रीय पर्वों की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण माह है। परिषद् के लिये यह इस दृष्टि से अत्यन्त विशिष्ट है कि यह इसके आराध्य व्यक्तित्व स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस का माह है। स्वामी जी ने महिला सशक्तिकरण पर विशिष्ट बल दिया था। उन्होंने भारतीय महिलाओं के लिए मातृत्व को सर्वोच्च आदर्श माना था। उनके अनुसार माँ के रूप में नारी सर्वोंत्कृष्ट, निःस्वार्थ, कष्टों को सहन करने वाली एवं क्षमाशील बन जाती है। उन्होंने जोर दिया कि महिलाओं को उच्चतम शिक्षा दी जानी चाहिए, उनसे आदर पूर्ण तथा समानता का व्यवहार होना चाहिए एवं उन्हें प्रत्येक प्रकार की जिम्मेदारी सम्भालने के योग्य बनाया जाना चाहिए। इसी सन्दर्भ में 11 जनवरी को जालंधर (पंजाब) में परिषद् का राष्ट्र स्तरीय ‘महिला कार्यकर्ता’ कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। आग्रह है कि इसमें देश भर से महिला उत्तरदायित्वधारियों एवं सक्रिय महिला कार्यकर्त्तात्रों की प्रभावी भागीदारी हो जिससे मातृशक्ति की प्रतिभा को मान्यता मिल सके, उनके आत्मविश्वास में वृद्धि हो तथा उनकी योग्यता एवं क्षमता का लाभ परिषद् द्वारा समाज के लिये किये जाने वाले ‘सेवा’ एवं ‘संस्कार’ के कार्यक्रमों में मिल सके।

12 जनवरी स्वामी विवेकानन्द जी का जन्म दिवस है। स्वामी जी का नाम मस्तिष्क में आते ही एक ऐसे महान् यशस्वी और तपस्वी की तस्वीर मन-मस्तिष्क में उभर आती है, जिसने अपनी प्रतिभा, चिन्तन, दर्शन और सेवा से विश्व में विजय पताका फहरायी। वास्तव में विवेकानन्द बौद्धिक प्रतिभा के धनी थे। आध्यात्मिक चिन्तन में प्रखर थे, राष्ट्रवाद के प्रणेता थे, समानता के आधार पर अन्तर्राष्ट्रीयवाद में विश्वास करते थे, मानव के उत्थान के प्रति गहरे संवेदनशील थे और महान मानववादी थे। ये सभी पहलू आज भी सम-सामयिक हैं। स्वामी जी के जन्म दिवस को ‘युवा दिवस’ के रूप में आयोजित किया जाता है। परिषद् की शाखाओं को इस दिवस को युवाओं के लिये कार्यक्रमों से जोड़कर मनाना चाहिए। इस दृष्टि से ‘युवा शक्ति राष्ट्रशक्ति’, ‘देश के विकास में युवा शक्ति की भूमिका’, ‘भारतीय युवा शक्ति-अवसर एवं चुनौतियाँ’ इत्यादि विषयों पर निबन्ध या भाषण प्रतियोगिता अथवा सैमीनारों का आयोजन करना चाहिए। परिषद् की विभिन्न शाखाओं ने देश भर में बड़ी संख्या में स्वामी जी की प्रतिमा स्थापित की है, उन सभी स्थानों पर इस दिवस पर विशिष्ट कार्यक्रमों का आयोजन कर स्वामी जी के प्रेरणाप्रद विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास करना चाहिए। युवा शक्ति के सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि ‘संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष’ द्वारा नवम्बर, 2014 में निर्गमित रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व का सबसे बड़ा युवा देश है जहाँ 35.6 करोड़ युवा जनसंख्या है और 26.9 करोड़ युवाओं के साथ चीन दूसरे स्थान पर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘‘युवा जनसंख्या रचना धर्मिता, शोध, सृजनात्मकता से ओत प्रोत हैं और यह भावी नेता भी है। लेकिन ये भविष्य को परिवर्तित कर पाने में तभी सक्षम होंगे, जब इनके पास कौशल, स्वास्थ्य, निर्णय लेने की क्षमता और जीवन के बेहतर विकल्प उपलब्ध होंगे’’। इस दृष्टि से भी देश में अनुकूल वातावरण के सृजन एवं विकास में सक्रिय योगदान देने के विकल्पों पर विचार करना होगा।

13 जनवरी को जम्मू कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश एवं दिल्ली में अत्यन्त लोकप्रिय कृषि फसल से जुड़ा सांस्कृतिक उत्सव ‘लोहड़ी’ है। 14 जनवरी को प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और कृषि फसल से जुड़ा एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पर्व ‘मकर संक्रान्ति’ है। यह पर्व नई फसल के स्वागत तथा सामूहिक सम्पन्नता के लिये प्रार्थना का पर्व है, जिसे पूरे भारत और नेपाल में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। 15 जनवरी ‘पोगंल’ का त्यौहार है जो तमिलनाडु में व्यापक रूप से एक फसल पर्व के रूप में मनाया जाता है, जिसमें सूर्य देवता एवं फसल में सहयोगी पशु-सम्पदा के प्रति आभार प्रकट किया जाता है। जहाँ सम्भव हो सके परिषद् की शाखायें अपने-अपने राज्यों की संस्कृति के अनुरूप महिला सहभागिता कार्यक्रम के रूप में इन पर्वों का आयोजन कर भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन में सहयोग कर सकती है।

23 जनवरी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म दिन है, जिनकी स्मृतियाँ आज भी प्रेरणास्रोत है कि किस प्रकार अपनी योग्यता, शैक्षिक कुशलता एवं बुद्धिचातुर्य के साथ राष्ट्रभक्ति को संयोजित किया जा सकता है। 24 जनवरी बुद्धि, ज्ञान एवं कला की देवी सरस्वती की पूजा-अराधना का दिवस ‘बसन्त पंचमी’ है। इसी दिन से ऋतु सम्राट बसंत ऋतु का आगमन होता है। शान्त, ठण्ड, मन्दवायु कटु शीत का जन्म लेती है तथा सबको नवप्राण व उत्साह से स्पर्श करती है। भारत में बच्चों को स्कूल में पहली बार प्रवेश कराने की दृष्टि से इस दिवस को अत्यन्त पवित्र माना जाता है। इसके अनुरूप अपने घर-परिवार में नव-स्फूर्ति एवं चेतना का संचार करना बड़ा उपयोगी होगा। 26 जनवरी को हम देश के 66वें गणतंत्र दिवस को आयोजित करेंगे। इस वर्ष यह विशिष्ट होगा क्योंकि दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड में मुख्य अतिथि के रूप में विश्व के शक्तिशाली राष्ट्र संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा सुशोभित होंगे। यह उपस्थिति सामान्य नहीं है, वरन् इसमें निहित है ‘अतुलनीय भारत’ (Incredible India) की अवधारणा जो पूरे विश्व परिदृश्य में भारत की गौरवमयी अतीत और स्वर्णिम भविष्य को प्रतिष्ठित करेगी। परिषद् की सभी शाखाएं भी इस दिवस पर ‘सुन्दर भारत, स्वच्छ भारत और सुसंस्कारित भारत के लिये कार्यक्रमों को आयोजित करने का संकल्प लें। अन्त में परिषद् परिवार के सभी सदस्यों को लोहड़ी, मकर संक्रान्ति एवं गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओं सहित।

- डॉ. के.एल.गुप्ता, राष्ट्रीय महामंत्री


February, 2015
नीति के लिए महामंत्री डॉ. के.एल.गुप्ता जी का अंतिम सम्पादकीय

‘नीति’ का यह अंक जब आपके कर कमलों में होगा तो सत्र 2014-15 के अन्तिम दो माह शेष होंगे। यह दो माह कार्य-क्रियान्वयन और कार्य-नियोजन दोनों दृष्टियों से अत्यन्त महत्वपूर्ण होते हैं। सत्र 2014-15 के पदाधिकारियों के लिये यह कार्य-क्रियान्वयन और कार्यपूर्णता की वैसी ही अवधि होती है, जैसी एक दिवसीय क्रिकेट मैच के अन्तिम ओवरों में जी-तोड़ प्रयास कर मैच को जीतने की। अनेक शाखाओं एवं प्रान्तों के अधिकारी यह सोचने लगते है कि अब तो सत्र पूर्ण हो रहा है, अब क्या करना। पदाधिकारियों के लिये सत्र पूरा हो सकता है, लेकिन परिषद् का नहीं। परिषद् के क्रिया कलाप एक सतत् प्रक्रिया है। अतः शाखाओं, प्रान्तों एवं क्षेत्रों के 2014-15 के पदाधिकारियों को अपने लिये संकल्पों एवं लक्ष्यों को पूरा करने के लिये जुट जाना चाहिए। वे किसी एक सत्र के लिये नहीं वरन् परिषद् के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों के लिये कार्य कर रहे हैं। 2015-16 के लिये शाखाओं एवं प्रान्तों के पदाधिकारियों के लिये यह अवधि कार्य-नियोजन की अवधि है, पिछले पदाधिकारियों से सतत् सम्पर्क कर उनकी योजनाओं को प्रभावी रूप से आगे ले जाने एवं नवीन संकल्पों की रचना कर अगले सत्र के लिये समय से पूर्व व्यवस्थित रूप रेखा तैयार करने की अवधि है और परिषद् के केन्द्रीय नेतृत्व को विश्वास है कि सभी पदाधिकारी सतत् सम्पर्क, सद्भाव एवं सहयोग के साथ इस प्रक्रिया को आगे बढ़ायेंगे।

यह अवधि प्रत्येक स्तर पर पदाधिकारियों के लिये आत्म विश्लेषण, आत्म चिन्तन और आत्म मंथन का समय भी है। गत सत्र में हमें क्या उत्तरदायित्व मिला? हमने कार्य के लिये क्या संकल्प किये? क्या हम परिषद् के लिये वांछनीय समय निकाल पाये? क्या हमने अपने बाद की अवधि में आने वाले पदाधिकारियों एवं कार्यकर्त्ताओं के उचित विकास में योगदान दिया? क्या हमने कार्यक्रमों में जाने के अतिरिक्त परिषद् विकास एवं सुदृढ़ता के लिये चिन्तन किया? हमसे कहाँ चूक रह गयी, क्या हम वर्ष भर निष्क्रिय रहते हैं और शाखाओं या प्रान्तों के चुनाव आते ही मठाधीश बन जाते है? ऐसे अनेक प्रश्न हैं, जिन पर बहुत गम्भीरता से विचार करना होगा और वास्तव में सक्रिय समर्पित एवं ‘व्यक्ति से बड़ा संगठन’ दृष्टिकोण रखने वाले कार्यकर्त्ताओं एवं पदाधिकारियों को अभिप्रेरित कर आगे लाना होगा और पूरे संगठन में श्रेष्ठ पदाधिकारी बन कर और श्रेष्ठ करने की ‘संकल्प शक्ति’ का सृजन करना होगा।

नवम्बर, 2014 से जनवरी 2015 तक परिषद् के राष्ट्र-स्तरीय आयोजनों की अवधि रही है। यह सभी आयोजन अत्यन्त गरिमामयी रहे। 15-16 नवम्बर, 2014 को मुम्बई में महाराष्ट्र-1 द्वारा दसवीं अखिल भारतीय ‘राष्ट्रीय संस्कृत समूहगान एवं लोकगीत प्रतियोगिता’ का आयोजन किया गया, जिसमें 46 टीमों ने भाग लिया जो अब तक की सर्वाधिक संख्या है। गत सत्र में इस आयोजन में 39 टीमों ने ही भाग लिया था। 29-30 नवम्बर, 2014 को उत्तराखण्ड पूर्व द्वारा रुद्रपुर-पंतनगर में 40वीं अखिल भारतीय ‘राष्ट्रीय समूहगान प्रतियोगिता’ का आयोजन किया गया, जिसमें 47 टीमों ने भाग लिया, यह भी एक रिकार्ड ही था, क्योंकि इससे पूर्व वर्ष 2006 में ही 47 टीमें आई थी। 27-28 दिसम्बर, 2014 को वाराणसी में 14वीं अखिल भारतीय ‘भारत को जानो प्रतियोगिता’ का आयोजन किया गया, जिसमें कनिष्ठ एवं वरिष्ठ वर्ग में 96 टीमों की भागीदारी की जो रिकार्ड कीर्तिमान स्थापित हुआ। इस सभी के लिये इन प्रकल्पों के राष्ट्रीय पदाधिकारी, आयोजक प्रान्त, प्रतिभागी प्रान्त एवं उनकी टीमें सभी बधाई के पात्र हैं।

21-22 दिसम्बर 2014 को हरिद्वार में राष्ट्रीय परिषद् की चौथी बैठक सम्पन्न हुई। आयोजकों की व्यवस्था प्रशंसनीय थीं, प्रतिभागियों की कुल समग्र संख्या को भी ऐसे भीषण कोहरे एवं ठण्ड में संतोषजनक माना जा सकता है, लेकिन भविष्य में इस वार्षिक नीति परक आयोजन में विभिन्न प्रान्तों को काफी सक्रिय होना होगा। पंजाब पूर्व प्रान्त बधाई का पात्र है, जहाँ से 139 प्रतिभागियों ने भाग लिया, लेकिन 13 प्रान्त ऐसे थे, जहाँ से प्रतिनिधियों की संख्या दहाई में भी नहीं थी।

फरवरी, 2015 में सोमनाथ (गुजरात) में राष्ट्रीय शासी मण्डल की बैठक सम्पन्न हो रही है। विश्वास और अनुरोध है कि इस शासी मण्डल के अधिकाधिक सदस्य इसमें प्रतिभागी बनकर समग्र चिन्तन को सार्थक बनाकर परिषद् की भावी कार्य योजनाओं, कार्य प्रकल्पों एवं कार्य पद्धति को प्रभावी बनाने में अपनी अनुभवपूर्ण, व्यावहारिक एवं महत्वपूर्ण योगदान देकर अपनी-अपनी भूमिका का सफल निर्वहन करेंगे और निश्चित रूप से कुछ अच्छा करने, कुछ नया करने और कुछ अधिक करने का दृढ़ संकल्प लेंगे।

- डॉ. के.एल.गुप्ता, राष्ट्रीय महामंत्री


March, 2015
सम्पादकीय

परिषद् की शासी मण्डल की बैठक का विवरण इस अंक में दिया गया है। मार्च का महीना शाखाओं और प्रान्तों की वार्षिक गतिविधियों का लेखा-जोखा करने का महीना होता है। केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा दिये गये अपने लक्ष्य का स्मरण करें। प्रान्त में शाखा की संख्या, सदस्य संख्या, केन्द्रीय अंशदान आदि में वृद्धि हुई, स्थितर रही अथवा न्यूनता आई। यह आत्म चिन्त का समय भी है। यह भौतिक लक्ष्य आपकी गतिशीलता और उत्साह का प्रमाण होते हैं। परिषद् का मूल कार्य क्या है और इस कार्य में सफलता का मूल्यांकन करने की विधि क्या है। इसका स्मरण करना सभी कार्यकर्ताओं के लिए अपेक्षित है। वर्ष भर चलने वाले कार्यक्रमों और प्रकल्पों के द्वारा सदस्यों की कार्यक्षमता में वृद्धि और अनुभवशीलता का निर्माण मूल कार्य है। समाज के प्रभावी लोगों को इन क्रिया कलापों के माध्यम से जोड़ना भी मूल कार्य है। अपने कार्य का मूल्यांकन करने के लिए कुछ प्रश्न, आत्म चिन्तन के लिए विचारणीय है। वर्ष भर में कितने नये कार्यकर्ताओं का निर्माण हुआ। नेतृत्व की दूसरी पंक्ति के विकास में हमारा क्या योगदान रहा। परिषद् के क्रिया कलापों से सामाजिक परिवर्तन करने में हम कितना सफल हुए। अपनी कार्य-प्रणाली अरैर कार्य-क्षमता को सुदृढ़ बनाने के लिए पाँच सकार मानो पाँच स्तम्भों के रूप में स्वीकृत किए थे - सम्पर्क, सहयोग, संस्कार, सेवा और समर्पण।

दो जनों के पारस्परिक संवाद या मेल मिलाप का माध्यम ‘सम्पर्क’ ही है। सम्पर्क को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक सूचना और समझ के हस्तान्तरण की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। सम्पर्क स्थापित हो गया तो ‘सहयोग’ की बात सोची जा सकती है। ‘सह’ का अर्थ है साथ अथवा सहायता और योग का अर्थ है मेल। सृष्टि का हर पदार्थ-जड़ हो या चेतन-एक दूसरे का सहयोग कर रहा है अन्यथा विकास ही न होता। फिर बात आती है संस्कार की। ‘संस्कार’ ही मनुष्य को वास्तव मानव बनाते हैं संस्कार ही जीवन का नीव-पत्थर है। ‘संस्कारों नाम स भवति यस्मिन् जाते पदार्थो भवति योग्यः कस्यचिद्र्थस्य’ (मीमांसा सूत्र 2/1/3) अर्थात् संस्कार वह है जिसके होने से कोई पदार्थ या व्यक्ति किसी कार्य के योग्य हो जाता है। यहाँ तक भी कहा गया है कि ‘आचार हीनं न पुनन्ति वेदाः’ - सदाचार रहित व्यक्ति को वेद जैसे सद् ग्रन्थ भी पवित्र नहीं कर सकते। परिषद् अपने विभिन्न प्रकल्पों के माध्यम से युवकों को संस्कारित करने का भरसक प्रयास करती रहती है। इन प्रकल्पों की गुणवत्ता इस बात की परिचायक है कि संस्कारित व्यक्ति के हृदय में मानव जाति की ‘सेवा’ का भाव अनायास जागृत होता है। उसे कहने या स्मरण कराने की आवश्यकता नहीं होती। संस्कार के माध्यम से बच्चों में बचपन से ही सेवा भाव से काम करने और प्राणिम मात्र की सेवा करने का अभ्यास पड़ जाता है। पूर्ण रूपेण सेव भाव उत्पन्न होते ही ‘समर्पण’ तो जैसे स्वतः ही हो जाता है। समर्पण की भावना उदय होने पर मानव ‘स्व’ की सीमित परिधि से ऊपर उठकर ‘पर’ के विषय में भी सोचता है और जन-जन के कल्याण की ओर अग्रसर होता है। जब किसी संस्था के कार्यकर्ता समर्पित भाव से संस्था से जुड़ जाते हैं तो संस्था का प्रगति निश्चित होती है। परिषद् की अर्द्धशती इस का सजीव प्रमाण है।

फाल्गुन मास की पूर्णिमा को पूरे देश में होली का रंगारंग उत्सव रंगों की फुहार, होली मिलन के सामूहिक आयोजन विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और सामुदायिक संस्थाओं के आकर्षण का केन्द्र रहते हैं इस पर्व पर भारतीय कृषक समुदाय का उल्लास नई सफसलों का लहलहाना, ग्रामीण क्षेत्रों में मानो जीवन का हर्षोल्लास मन को, तन को चिन्तन को महकाने वाला होता है। इस आयोजन में कुछ सामाजिक द्वेष, कुरीतियों तथा परम्परास होली की पवित्रता, खुशहाली पर एक प्रश्न चिन्ह है। परिषद् ने सात्विक, श्रेष्ठ परम्पराओं से युक्त सामाजिक समरसता का निर्माण करने वाले बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों का आयोजन करना अपेक्षित है।

यह मास चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (21 मार्च, 2015) भारतीय नववर्ष का प्रथम दिन भी है। माँ दुर्गा की स्तुति, कलश स्थापना, नव रात्रि पर नौ दिन का उपवास, कन्या भोज, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का जन्मोत्सव आदि नवरात्रि में चलने वाले प्रमुख धार्मिक आयोजन होते है। संवत 2072 का प्रारम्भ एवं प्रथम दिन हमारे पंचांग के अनुसार ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि का निर्माण का प्रथम दिन, भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक का दिन आदि अनेक प्रसंगों के स्मरण का यह दिन है। नये साल के नये संकल्पों का यह दिन परिषद् परिवार के सदस्यों के लिए शुभ हो। परिषद् के केन्द्रीय पदाधिकारियों की ओर से समस्त परिवार को भारतीय नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ।             -

- प्रभार, प्रकाशन विभाग


April, 2015
सम्पादकीय
भारत सरकार का वार्षिक बजट प्रस्तुत हुआ। राजनैतिक चिन्तकों और अर्थशास्त्रियों ने अपने ढंग से इसका विश्लेषन किया। किसी विचार के दो पहलू होते हैं सकारात्मक और नकारात्मक। कुछ समय से देश ऊँची उड़ान भरने को मानों आतुर है। इस उड़ान के पंख मिल गये हैं एक दूरदर्शी राजनेता के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसके विचारों की श्रेष्ठता से नहीं होता। वरन् अवसर प्राप्त होने पर उनके क्रियान्वयन के आधार पर होता है। स्वच्छता और शिक्षा आज सड़क पर चर्चा का विषय बन गये है। स्वास्थ्य के बारे में सरकार के दृढ़संकल्प के सामने संक्रामक रोगों की चुनौतियाँ भी कम नहीं है। बजट का प्रभाव आम आदमी पर कैसा होता है। सरकार की यह एक कसौटी होती है। वाइब्रेन्ट गुजरात में प्रधानमंत्री जी ने भारत विकास परिषद् की ‘भारत को जानो‘ योजना को ऑन लाइन लागू करने के बारे में आह्वान किया। यह परिषद् के दूरदर्शी नेतृत्व की प्रासंगिकता और दूरदृष्टि को रेखांकित करता है। अप्रवासी भारतीयों को भारत की अस्मिता के विषय में जानकारी होना आपेक्षित है। इसी वर्ष भारतीय छात्र-छात्राओं के लिए तत्कालीन विषयों जैसे खेल विज्ञान आविष्कार कला और संस्कृति के क्षेत्र में भारतीय मूल के विशेषज्ञों द्वारा बनाए गये वैश्विक रिकॉर्ड की जानकारी भारत को जानो में सम्मिलित करने की संस्तुति हुई है।

भारत विकास परिषद् सार्वजनिक महत्व के विषयों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें। कार्य-विस्तार के परिप्रेक्ष्य में विकेन्द्रीकृत व्यवस्था अपनाने का विचार हुआ है। शाखा और प्रांतों की नई टीम अप्रैल माह से अपना कार्य प्रारम्भ करेंगी। पूर्ववर्ती टीम के द्वारा दायित्व स्थानान्तरण, बैंक खाते तथा परिषद् के संसाधनों का लेन-देन यथाशीघ्र कर लेना उचित होगा। इस माह में परिषद् के उत्तर-दक्षिण पूर्व औ पश्चिम क्षेत्रों में दो दिन की कार्यशाला का प्रस्ताव है। अधिक भागीदारी के उद्देश्य से आयोजित कार्यशालाएँ सफल हो। व्यक्तिगत परिचय, सहयोग, चिन्तन और एक रूप दिशा निर्देशन कार्यशाला की विषय वस्तु होगी। परिषद् के सदस्यों में शाखा और प्र्रांत की गतिविधियों के साथ राष्ट्रीय सोच का विकास भी आवश्यक है। इसलिए राष्ट्रीय वैशिष्टय के आयोजनों और घटनाओं के प्रति सजगता का विकास होना आपेक्षित है।

बढ़ती हुई तकनीकी के युग में केन्द्रीय कार्यशाला में डिजिटलाइजेशन की प्रक्रिया इस वर्ष कार्य योजना में सम्मिलित है। अपेक्षा है कि सभी प्रांतों की वेबसाइट पूर्ण सूचनाओं के समृद्ध होकर पूरी की जाए और उन्हें केन्द्रीय वेबसाइट के साथ लिंक किया जाए। इसके लिए तकनीकी स्थायी सेल प्रांतों को गठित करना होगा।

जैन धर्म प्रवर्तक में भगवान महावीर की जयन्ती का शुभ प्रसंग भी इस मास में प्रस्तुत है। भगवान महावीर ने अहिंसा का जो मंत्रा समाज को प्रदान किया वही धरोहर लेकर पूज्य बापू ने देश को स्वतंत्रता दिलाई। संगठन के लिए महत्वपूर्ण जैन धर्म का स्यातवाद सिद्धान्त अर्थात मैं सही हूँ लेकिन आप भी सही हो सकते हैं। यह विचार अर्थात् समन्वय, कुशल संगठन की पूँजी है। व्यक्तिगत अहं, विचारों की कटुरता और केवल ‘‘मै’’ जैसे विचारों को छोड़ते चले। समन्वय को अपनाते चले।

संविधान निर्माता डा. भीमराव अम्बेडकर का जन्म दिन 14 अप्रैल भारतीय जनजीवन में समरसता का यशस्वी दिन है। विषम परिस्थितियों में अपनी मेघा और संकल्प के बल पर उन्होंने स्वतन्त्र भारत को नया संविधान दिया। संविधान में अनेक संशोधन हुए उनकी आवश्यकता और प्रसंगिकता पर बहस प्रारम्भ हुई है। धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे संशोधनों पर जारी बहस भारतीय जनमानस की प्रगतिशील सोच की द्योतक है। निष्कर्ष रूप में राष्ट्रीय पुर्ननिर्माण के लिए जीवित जागरूक समाज एक महती आवश्यकता है। जन जीवन में भविष्य के भारत की स्वपनिल झाँकी स्पष्ट देखी जा सकती है।

परिषद् का संकल्प- शाखा विस्तार-यशस्वी करें यही प्रार्थना                              

-प्रकाशन विभाग


May, 2015
सम्पादकीय

ध्येय के प्रति निष्ठा - परिषद् का कार्य करते समय सामान्यतः सदस्यगण क्रियाकलापों एवं प्रकल्पों को ही परिषद् के ध्येय मान लेते हैं। इस कारण परिषद् के वाह्य स्वरूप को परिषद् का उद्देश्य समझ बैठते हैं। वास्तव में परिषद् का मूर्त स्वरूप जिन कार्यक्रमों के द्वारा प्रकट होता है वे संस्कार और सेवा, सामाजिक समरसता तथा सांस्कृतिक पुर्नजागरण के कार्यक्रम हैं। कार्यक्रम स्वतः उद्देश्य नही होता वरन इनसे प्रतिफलित प्रभाव ही उद्देश्य होता है। गरीब बच्चों के वेश, पुस्तक तथा पाठ्य सामग्री देना एक प्रकल्प है। कार्यक्रम का प्रतिफलित उद्देश्य है समाज के प्रति संवेदनशीलता का निर्माण। सामूहिक सरल विवाह से हम समाज के निम्न, धनहीन, साधन हीन, लोगों में सामाजिक समरसता का भाव निर्माण करते हैं स्वाभावतः ध्येय के प्रति यह निष्ठा कार्यक्रम करते ही आने लगती है। अनेक बार कार्य का वास्तविक स्वरूप न समझने के कारण अनेक सदस्य कार्यक्रम की पेंचीदगियों में पड़कर दूरगामी उद्देश्य को विस्मृत कर देते हैं केन्द्रीय नेतृत्व का यह सुनिश्चित दायित्व है कि कार्यकर्ताओं के मन में कार्य का उद्देश्य बार-बार स्मरण कराया जाए। इसी उद्देश्य से क्षेत्रीय कार्यशलाओं के द्वारा परिषद् की कार्य प(ति, नियम, परम्पराओं और आचार संहिता का स्मरण कराना आवश्यक है। अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को लगता है कि हमने सम्पर्क, सहयोग, संस्कार, सेवा और समर्पण पाँच सूत्रों को आत्मसात कर लिया है, हमें सभी प्रकल्पों के बारे में महती जानकारी है। परिषद् के दर्शन और सिद्धान्त विषय पर मेरा पूर्ण नियंत्रण है। अतः अब मुझे कुछ सुनने की क्या आवश्यकता। परन्तु परिषद् का मार्ग बहुत कठिन है, इस पर चलने के लिए अत्यन्त अनुशासन, संयम और त्याग की आवश्यकता है। अपने व्यक्तित्व, व्यवहार और आचार को ऐसा बनाना होगा कि हम हर प्रकार की संकीर्णता से ऊपर उठ कर सामाजिक विकास के साथ-साथ राष्ट्र की एकता, अखण्डता एवं स्वतंत्रता के लिए संकल्पित हों, हमारे कार्यों में नैतिकता, विशालता, उदारता की झलक दिखाई दे। इसमें हम तभी कामयाब हो सकते हैं जब परिषद् के सिद्धान्तों को सामने रख कर चलें।

कहते है कि एक बार भगवान शिव ने तांडव न करने और डमरू न बजाने का निश्चय कर लिया। डमरू नहीं बजा तो मेघ नहीं आये बारिश नहीं हुई। संसार में चारों ओर त्राहि त्राहि मच गया। शिवजी ने माँ पार्वती से कहा चलो मृत्युलोक में चलकर देखते हैं। क्या हाल है। आकाश मार्ग से जाते हुए भगवना शिव ने दूर सुखे पड़े खेतों की ओर देखा। सुदूर एक सूखे खेत में एक किसान परिश्रम पूर्वक हल चला रहा था। भगवान शिव को बड़ा आश्चर्य हुआ। सूखे खेत में जब बारिस की कोई सम्भावना नहीं तब यह किसान क्यों हल चला रहा है। भगवान मृत्युलोक में आये, किसान से पूछा कि अकाल और सूखे से त्रस्त होकर भी तुम हल क्यों चला रहे हो। किसान ने भगवान को प्रणाम किया और कहा कि अभी बारिस नहीं है लेकिन जब कभी बारिस होगी तक तक मैं हल चलाने का अभ्यास कर रहा हूँ। भोले को स्मरण हो आया कि यदि मैंने डमरू और ताडव का अभ्यास न किया तो मैं भी विस्मृत हो सकता हूँ। डमरू बजा, बारिश हुई, धरती अन्न रूपी गहनों से झूम उठी।

हम अपने कार्य का बार-बार स्मरण करते रहें, ध्येय के प्रति निष्ठा की आग को जलाएं रखे, ध्येय के प्रति अटूट निष्ठा ही हमारा संबल है।

विगत वर्षों में लक्ष्य आधारित कार्य विस्तार और लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रशस्ति प्रदान करने की परम्परा भारत विकास परिषद् में आम बात हो गई है। प्रशस्ति की इच्छा होना मानव का स्वभाविक गुण है। परन्तु प्रशस्ति के लिए लक्ष्य प्राप्त करने के लिए सम्यक मार्ग को आधार बनाना अपेक्षित है। वर्तमान समय में परिषद् की लोकप्रियता के कारण समाज के अनेक बन्धु परिषद् के साथ कार्य करने के इच्छुक होते हैं। संगठन में जुड़ने के इच्छुक लोगों के अनेक साध्य हो सकते हैं। यथा पद्प्राप्त करना, सामाजिक लोक प्रियता अर्जित करना। अपने व्यवसायिक अथवा कैरियर में उच्चीकरण।

शाखा एवं प्रान्तों में कार्य विस्तार और लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपने पूर्व निर्धारित परम्पराओं की उपेक्षा करने तथा शार्टकट के द्वारा लक्ष्य प्राप्त करने के अनेक उदाहरण शाखाओं में चर्चा का विषय बने हैं। सदस्यता के बारे में निर्धारित मापदण्ड, प्रबुद्ध सम्पन्न एवं सामाजिक यश प्राप्त लोगों को परिषद् में सम्मिलित करने का प्रयास हमारी पूर्वनिर्धारित परम्परा रही है। यह कहते संकोच होता है कि कुछ स्थानों पर लक्ष्य प्राप्ति की दौड़ में ऐसे मार्गों का अनुसरण किया जा रहा है जिसके कारण परिषद् का टारगेट ग्रुप अपेक्षित हो रहा है।

परिषद् के संस्थापकों ने प्रबुद्ध और सम्पन्न समाजसेवी बन्धुओं को भारतीय संस्कृति के प्रति उन्मुख करने के उद्देश्य से कार्य प्रारम्भ किया था। वर्तमान में लक्ष्य प्राप्ति की अन्धी दौड़ में हम संगठन के गणित को गुणवत्ता आधारित न बनाकर संख्या आधारित बनाने की दौड़ में लगे हैं इसीलिए अल्पकाल में शाखाओं की संख्या में वृद्धि और शाखाओं के बन्द होने की संख्या लगभग समान है। पिछले कुछ वर्षों के आकड़ों का विश्लेषण करने से यह निष्कर्ष प्राप्त हुआ है। अतः शाखा विस्तार स्थायी एवं गुणात्मक हो। शाखा बंद होने की प्रक्रिया को विराम दिया जाए। हमारी प्राथमिकता शाखाओं का स्थायित्व हो। संगठन करने का रास्ता लम्बा है। अल्प समय में लक्ष्य प्राप्ति का यश मोहक परन्तु भविष्य के लिए चिन्ता जनक होता है। संस्कार हमारा सबसे महत्वपूर्ण मानक है। यह दायित्वधारियों के जीवन में परिषद् के प्रति उनके व्यवहार में, अपने सहयोगी दायित्वधारियों के साथ संबन्धों में प्रकट होना अपेक्षित है।

                 - राष्ट्रीय संगठन मंत्री


June, 2015
सम्पादकीय
‘नीति’ के विषय सूची में परिवर्तन की दिशा में अपनी मासिक पत्रिका ‘नीति’ के कलेवर में समय काल के अनुरूप परिवर्तन होते रहते है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है इससे रोचकता और उत्कृष्ठता बढ़ती है। प्रारम्भ में यह एक वैचारिक तथा राष्ट्रीय महत्व के विषयों के प्रकाशन पत्रिका रही। शाखा विस्तार प्रकल्पों और कार्यक्रमों के साथ समाचारों का समावेश होते वर्तमान से एक समाचार पत्रिका के रूप में इसका प्रकाशन हो रहा है। पिछले कुछ महीनों में प्रवास के दौरान सदस्यों से नीति को विषय वस्तु के बारे में विस्तृत चर्चा हुई है। फलस्वरूप समाचार को संक्षिप्त बनायें रखते हुए नीति में कुछ परिवर्तन किये जा रहे है। सामूहिक सरल विवाह और रक्तदान शिविरों के बारे में शाखा, प्रान्त के नाम सहित सूचना प्रकाशित की जायेगी। महिलाओं के कार्यक्रमों को एक अलग पृष्ठ प्रदान किया जायेगा। 21 जून के अन्तराष्ट्रीय योगा दिवस पर सभी शाखाओं ने योग सप्ताह या योग पऽवारा आयोजित करना चाहिए। राष्ट्रीय अध्यक्ष जी ने शाखा के सदस्यों की भागीदारी के लिए ग्राम बस्ती के अभीकरण द्वारा क्षेत्र में स्वास्थ्य शिक्षा और पर्यावरण पर बल देने का आग्रह किया है। ग्रीष्म अवकाशों में बच्चों के व्यक्तित्व विकास शिविर, ललित कलाओं अथवा अभिरूचियों का प्रशिक्षण वर्ग चलाने से समाज में परिषद् की स्वीकार्यता बढ़ सकती है। इस दृष्टि से सदस्य महिलाओं द्वारा ब्यूटिशियन, केश सज्जा, मेंहन्दी, साड़ी पैकिंग, कलश सजाना, पूजा थाल सजाना, नृत्य, वादन, गायन, सिलाई, कढ़ाई आदि का प्रशिक्षण वर्ग लगभग उपयुक्त रहेगा।

संस्थापक महामंत्री डॉ. सूरज प्रकाश के जयन्ती (27 जून) का प्रसंग को अपने सब सदस्यों को उनके जीवन की प्रेरक घटनाओं को स्मरण करना चाहिए। अपना सब कुछ समाज के लिए, आत्मनुशासन, समय पालन, नितव्यमिता, व्यक्तित्व निर्माण, परिवार भाव, असीम स्नेह और स्पष्टवादिता उनके जीवन के महत्वपूर्ण पहलू रहे। इनका स्मरण करें। 5 जून पर्यावरण दिवस के रूप में आयोजित होता है। पर्यावरण संरक्षण एवं जागरूकता पर अग्रणी भूमिका निभाये। अनेक प्रकल्पों के बारे में दिशा निर्देशें की संक्षिप्ता तथा राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर सदस्यों के प्रबोधन हेतु विशेषज्ञों द्वारा आलेख भी सम्मिलित करने का विचार है। बाल जगत के अन्तर्गत बाल रचनाएँ, लघु कथायें, प्रेरक प्रसंग के लिए सामग्री की उपलब्धता के आधार पर एक पृष्ठ निर्धारित होगा।

परिषद् की बढ़ती गतिविधियों एवं कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए प्रतिवर्ष केन्द्रीय कार्यशाला का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष राष्ट्रीय शासी मंडल ने केन्द्रीय कार्यशालाओं का विकेन्द्रीकरण करते हुए देश के चार प्रमुख स्थानों पर कार्यशालाओं के आयोजन करने का निर्णय लिया गया।

इन कार्यशालाओं में देश के सभी प्रान्तीय दायित्वधारियों तथा क्षेत्रीय एवं केन्द्र के समस्त दायित्वधारियों को दो दिवसीय कार्यशाला में उपस्थित रहने की अपेक्षा की गई है। क्षेत्रीय विभाजन के अनुसार क्षेत्र संख्या 1 से 5 तक अम्बाला (25-26 अप्रैल, 2015), क्षेत्र संख्या 6-9 तक पटना (2-3 मई, 2015), क्षेत्र संख्या 10-14 तक उदयपुर (2-3 मई, 2015) तथा क्षेत्र संख्या 15-17 तक हैदराबाद (18-19 अप्रैल, 2015) में कार्यशाला सम्पन्न हुई। शीर्ष नेतृत्व के मार्गदर्शन में सभी कार्यशालाओं के लिए द्विपक्षीय चर्चा एवं मुक्त चिन्तन के आधार बनाकर एजेंडा निर्धारित किया गया। कार्यशाला में प्रान्तीय, क्षेत्रीय और केन्द्रीय दायित्वधारियों के समूह में प्रवास, समन्वय, विस्तार एवं प्रोटोकॉल इत्यादि विषयों पर चर्चा हुई। क्षेत्रीय समन्वय समितियों की प्रथम बैठक भी कार्यशालाओं में सम्पन्न हुई तथा वार्षिक लक्ष्यों का निर्धारण किया गया। संस्कार, सेवा, सम्पर्क एवं प्रचार विषयों पर चर्चा आधारित गोष्ठियाँ सम्पन्न हुई और संबंधित विषयों पर दृश्य श्रव्य साधनों का प्रयोग किया गया। कार्यकर्ताओं को उनके दायित्व एवं उनसे अपेक्षाएँ, शाखा के वृद्धिकरण प्रयासों के विविध आयाम, सी.एस.आर.के अन्तर्गत सहायता प्राप्त करना, प्रोटोकॉल, युवा सहभागिता के प्रयोग, कार्य से कार्यकर्ता निर्माण इत्यादि विषयों पर गहन चर्चा एवं जिज्ञासा समाधान के जीवन्त सत्रों ने दायित्वधारियों के संकल्प को दृढ़ किया। वित्त व्यवस्था एवं वित्तीय अनुशासन को नियमित करने के उपायों पर बल दिया गया। पूर्व कार्यशालाओं की तुलना में दूरी कम होने के कारण इस वर्ष 365 दायित्वधारी (हैदराबाद में 66, पटना में 68, उदयपुर में 102 एवं अम्बाला में 129) कार्यशालाओं में उपस्थित हुए। उपस्थित प्रतिनिधियों ने कार्यशाला के विषयों एवं परिचर्चा और जिज्ञासा सामाधान सत्रों को उपयोगी बताया एवं केन्द्र के द्वारा किये गये इस प्रयोग की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

सभी कार्यशालाओं में सामान्यतः सुविधाजनक आवास, पूर्ण व्यवस्था सम्पन्न सभागार एवं विविधतापूर्ण भोजन, जलपान की उतम व्यवस्था रही। विशेष रूप से अम्बाला की कार्यशाला में लगभग 70 प्रतिनिधियों को सदस्य परिवारों के घरों पर आवास व्यवस्था का प्रयोग सराहनीय रहा। सभी विषय विशेषज्ञों ने अपने-अपने विषय को पूर्णता के साथ रखा।

अन्त में एक निवेदन ‘आपके पत्र’ के अन्तर्गत नीति में क्या अच्छा लगा, क्या अपेक्षा है, क्या परिवर्तन के सुझाव है। अवश्य लिखकर सूचित करें। आपके पत्र हमारा संबल होगा।                 

- अजय दत्ता, राष्ट्रीय महामंत्री


July, 2015
सम्पादकीय
प्रिय पाठकगण।
जब तक ‘नीति’ का यह अंक आपको प्राप्त होगा तक तक सभी शाखाओं ने परिषद् के स्थापना दिवस (10 जुलाई) के कार्यक्रमों की रूप रेखा तैयार कर ली होंगी। 10 जुलाई 1963 को विधिवत भारत विकास परिषद् का पंजीकरण सम्पन्न हुआ। मूल संविधान में परिषद् का केन्द्रीय कार्यालय शंकर रोड दिल्ली, काटेज 27 वेस्ट पटेल नगर (डॉ. सूरज प्रकाश निवास) 6/3 वेस्ट पटेल नगर (श्री प्यारा लाल राही का निवास) और वर्तमान में बी.डी ब्लॉक, पीतमपुरा, दिल्ली-34 अपने भवन में कार्यरत है। जिन बन्धुओं को डॉ. सूरज प्रकाश एवं पी.एल.राही जी के साथ परिषद् में कार्य करने का अवसर मिला है, वे उनके स्वभाव, समर्पण और प्रखर राष्ट्रीय विचारों के कायल रहे। वास्तव में उनका जीवन और परिषद् की कार्य पद्धति एकाकार हो गई थी। परिषद् के बारे में उत्सुक्ताम्बों का स्वभाविक उत्तर डॉ. जी के व्यवहार से प्राप्त हो जाता था। इसलिए स्थापना दिवस के आयोजन पर डॉ. सूरज प्रकाश जी का स्मरण हमें प्रेरणा प्रदान करता है। संस्कार और सेवा के इतने आयाम विकसित हो गये हैं कि स्थापना दिवस के आयोजन की औपचारिकता को गोष्ठियाँ या परिचर्चा तक सीमित नहीं करना चाहिए। सेवा या संस्कार का आयोजन, वृक्षारोपण, रक्तदान, स्वच्छता अभियान सम्पन्न करना स्थापना दिवस का माध्यम हो सकता है।

वनवासी सहायता योजना- राष्ट्रीय एकात्म भाव को निर्माण करने के लिए अपने देश के सुदूर पूर्वोत्तर तथा वनवासी बहुल राज्यों में वनवासी कल्याण आश्रम एवं सहयोगी संगठनों के द्वारा शिक्षा, धर्म तथा राष्ट्रीयता से जोड़ने के प्रयास निरन्तर चल रहे हैं। ईसाई मतान्तरण की विभीषिका के कारण इन कार्यों को अधिक सहयोग की आवश्यकता है। भारत विकास परिषद् ने प्रारम्भ काल से ही वनवासी सहायता तथा सेवा कार्यों में निरन्तर अपनी भागीदारी बनाए रखी है।

वर्तमान समय में देश के अनेक भागों में पूर्वोत्तर के छात्र-छात्राओं की शिक्षा के लिए छात्रावास चलाये जा रहे हैं। इन छात्रावासों में प्रारंभिक शिक्षा से उच्च स्तरीय तकनीकी शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की गई है। स्वाभाविक ही इन छात्रावासों का संचालन स्थानीय लोगों के सहयोग से होता है। अन्तोगत्वा ये छात्र शिक्षा और संस्कार प्राप्त कर अपने गृह राज्य में वापस जाकर राष्ट्र भाव के जागरण का काम करते हैं। परिषद् द्वारा सभी शाखाओ से यह अपेक्षा की जाती है कि अपने वनवासी बन्धुओं के कल्याणार्थ सहयोग प्रदान करें। यह सहयोग केन्द्रीय स्तर पर वनवासी सहायता के लिए सहयोग राशि भेज कर किया जाता है। स्थानीय सहयोग-देश के अनेक नगरों में वनवासी छात्रावासों का संचालन भी किया जा रहा है। परिषद् की शाखाओं के द्वारा इन छात्रावासों से सम्पर्क कर आवश्यकताओं एवं साधनों को उपलब्ध कराना अपेक्षित हैं इस प्रकार वनवासी सहायता के लिए केन्द्रीय अथवा स्थानीय स्तर पर सहयोग करना हम सभी का दायित्व हैं सभी प्रान्तों को वनवासी सहायता प्रमुखों के द्वारा सहायता का लक्ष्य निर्धारण कर छात्रावासों में अथवा केन्द्रीय स्तर पर सहायता भेजनी चाहिए।

वेबसाइट - परिषद् के कार्यों और विचारों को तीव्र गति से जन-जन तक पहुँचाने के प्रयास प्रचार माध्यमों के द्वारा किये जाते रहे हैं। प्रकाशन विभाग के प्रयत्नों तथा निर्देशों के साथ स्थानीय आधार पर बड़ी संख्या में व्हाटस्एप समूह, फेसबुक, वेबसाइट के माध्यमों से परिषद् को शेयर करने वाले लोगों की संख्या में प्रगति हो रही है। इस संबंध में कुछ सुझावों पर ध्यान देना अपेक्षित है।
1. शाखा या प्रान्त की वेबसाइट में शाखा या प्रान्त का नाम अवश्य रखा जाए।
2. सभी वेबसाइट परिषद् की केन्द्रीय वेबसाईट से लिंक की जाए।
3. वेबसाइट में क्षेत्र, शखा, प्रान्त के नाम, पते, कार्यक्षेत्र, गतिविधियाँ, प्रकल्प, नवीन कार्यक्रमों की सूचना, फोटो तथा वीडियो अपलोड करनी चाहिए।
4. व्हाटस्एप के समूहों का प्रयोग यथा सम्भव राष्ट्रीय एवं समाजिक विचारों, कार्यों एवं परिषद् की सूचनाओं के लिए करना चाहिए।
5. सभी स्तर के लेटर पैड पर वेबसाइट, ई-मेल, फेसबुक इत्यादि अंकित करना चाहिए। निमंत्रण पत्रों पर भी ई-मेल अंकित करना चाहिए।
6. जिन प्रान्तों की ई-मेल और वेबसाइट नहीं बनी है वे यथा शीघ्र केन्द्रीय कार्यालय से यूजर नेम, पासवर्ड प्राप्त करें साथ ही वेबसाइट तैयार कर केन्द्रीय वेबसाइट से लिंक करे दें।    

- राष्ट्रीय संगठन मंत्री


August, 2015
सम्पादकीय
जुलाई मास के अंक में डॉ. सूरज प्रकाश जयन्ती, स्थापना दिवस और अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर सूचना एवं निर्देशन प्रेषित किये गये थे। फलस्वरूप शाखा स्तर पर कार्यक्रमों की इतनी सूचनाएँ तथा समाचार प्राप्त हुई कि सभी का समावेश कठिन है। पर्यावरण संरक्षण के नये आयाम विकसित हुए हैं जैसे वर्षा जल का सरंक्षण, कचरे का निष्पादन, सौर ऊर्जा का प्रयोग, प्लास्टिक वस्तुओं का वहिष्कार। इन कार्यक्रमों से जागरूकता और फलस्वरूप सामाजिक परिवर्तन की दिशा में परिषद् की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। एक शाखा ने सरकार के ताल मेल से गाँव में सौर ऊर्जा से प्रकाश की व्यवस्था कराई, यह अनुकरणीय है। पर्यावरण संरक्षण के स्थायी बैनर स्कूलों में सार्वजनिक स्थल पर लगाने में राजस्थान राज्य अग्रणी रहा है। इस अंक में बैनर का प्रारूप दिया जा रहा है। न्यूनतम 5 स्कूलों में यह बैनर प्रत्येक शाखा स्थापित करें यह अपेक्षा है।

स्थापना दिवस 10 जुलाई और डॉ. सूरज प्रकाश जयन्ती 27 जून पर शाखाओं ने परिषद् की पृष्ठ भूमि में चीनी आक्रमण (1962) और स्वामी विवेकानन्द की जन्मशताब्दी (1863-1963) का भरपूर स्मरण किया गया। डॉ. सूरज प्रकाश जी के जीवन की संघर्ष यात्रा, समर्पण और उदयपुर के राष्ट्रीय अधिवेशन के पर्व उनके महाप्रमाण को भी आदर भाव से स्मरण किया गया। ऐतिहासिक परिवेश में इन घटनाओं का स्मरण क्यों आवश्यक है? यह विचार करना चाहिए। स्वामी जी के शब्दों में जो राष्ट्र अपने भूतकाल के संघर्ष को स्मरण कर वर्तमान का गहन विचार कर भविष्य की योजना बनाता है उसकी सफलता में कोई सन्देह नहीं है। इतिहास का स्मरण करें लेकिन वर्तमान परिवेश को मजबूत आधार प्रदान करें। तभी हम भविष्य के निर्माता बनने में सफल होंगे।

भारत विकास परिषद् को यदि भविष्य में सामाजिक परिवर्तन को प्रभावी योगदान करना है तो अपनी सीमाओं का विस्तार करना होगा। संगठन के विभिन्न स्तरों पर वर्चस्व की प्रवृति हमारे विकास की गति को अवरूद्ध न कर सके। इसका विशेष ध्यान रखना होगा। सामाजिक परिवर्तन का मानक और परिणाम शाखा स्तर पर कैसे प्राप्त हो यह चिन्तन का विषय है। राष्ट्रीय सोच, भारतीय संस्कृति द्वारा रोपित समाज व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक कुरीतियों को रोकने में आंशिक सफलता हमारे प्रयासों का परिणाम है। नगर के प्रतिष्ठित समाज सेवी, व्यवसायी, शिक्षा विद्, चिकित्सक, कानूनविद् सभी क्षेत्रों में परिषद् के विचारों का प्रवेश हो। इस हेतु केन्द्रीय योजना से सभी शाखाओं में 10-20 नगर के स्वनाम धन्य बन्धुओं को परिषद् से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में जोड़ने का प्रयास हमें इस वर्ष करना है।

समूहगान और गुरु वन्दन छात्र अभिनन्दन प्रमुख कार्यक्रम हैं। इस अंक में प्रकल्पों से संबंधित निर्देश दिये जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से नये लोगों को परिषद् से जोड़ने का प्रयास लगातार जारी रखें। आपके समर्पण और त्याग का मजबूत आधार लेकर परिषद् का चक्र तेजी से घूम रहा है। कभी न सोचें कि मेरे प्रयास से क्या होगा। सोचें कि मेरे प्रयास से क्या नहीं हो सकता। धन्यवाद।               - राष्ट्रीय संगठन मंत्री


September, 2015
सम्पादकीय

यह अंक जब तक आपको प्राप्त होगा तब तक आपने संस्कृति सप्ताह के रंगारंग कार्यक्रमों की रचना सुनिश्चित कर ली होगी। प्रतिवर्ष इस कार्यक्रम को सितम्बर मास में मनाने की परम्परा है। युवा वर्ग में चित्रकला, पोस्टर, भजन, गीत, मोनो एक्टिंग, लेख, भाषण, कहानी तथा छात्राओं की अभिरूचि के अनुसार मेंहदी, रंगोली, केश सज्जा, भारतीय परिधान रूप सज्जा के अतिरिक्त पर्यावरण जागरूकता, पृथ्वी बचाओ, भ्रूण हत्या, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसे तत्कालिक महत्व के विषयों को सम्मिलित करना उपयुक्त होगा। एक शाखा ने ‘‘मुझे कुछ कहना है’’ विषय पर कार्यक्रम आयोजित किया। विषय वस्तु राष्ट्रीय अथवा सामाजिक सरोकार हो सकते हैं। आयोजक शाखा ने परिवार की मुख्य पोषक महिला के बारे में 2-3 मिनट में विचार रखने की प्रतियोगिता की। राष्ट्रीय परिवेश में दृश्य-श्रव्य कार्यक्रमों के आयाम तेजी से बदल रहे हैं। रियलिटी शो, एडवेन्चर से व्यक्तिगत श्रेष्ठता का चुनाव एक आम बात हो गई है। तैलगाना प्रान्त की महिला प्रमुख बी. सुजान प्रभा ने महिला उत्पीड़न के खिलाफ परिषद् के बैनर तले ‘अभय भारती’ योजना शुरू की जिसका संक्षिप्त उल्लेख इस अंक में किया गया है। क्या हम ऐसे नवीन प्रयोगों को संस्कृति सप्ताह का हिस्सा बना सकते हैं?

महिलाओं के द्वारा संस्कृति सप्ताह से उपलब्ध नेतृत्व अब शाखाओं का नेतृत्व करने में सक्षम हो रहा है। इसे प्रोत्साहन देने के लिए ‘आधा पन्ना’ स्तम्भ शुरू किया जा रहा है।

परिषद् के केन्द्रीय, क्षेत्रीय टीम के माननीय सदस्य मूलतः किसी शाखा के सदस्य होते हैं। सभी सदस्यों की प्राथमिकता अपनी मूल शाखा के प्रति होती है। कभी-कभी जिज्ञासा समाधान कार्यक्रम में यह प्रश्न यक्ष प्रश्न बन कर सामने आता है कि बड़े दायित्वधारियों की शाखा के प्रति क्या जबावदेही है। शाखा की उपेक्षा कर हम परिषद् के किसी काम में समाधान कारक सहयोग नहीं कर सकेंगे। अतः अन्य व्यस्तता न होने पर शाखा की मीटिंग या कार्यक्रम में पूर्ण सहयोग प्रदान करना अपेक्षित है।

इस मास गुरु वन्दन छात्र अभिनन्दन का कार्यक्रम विद्यालयों में जाकर समारोह पूर्वक मनाना है। प्रकल्प के बारे में श्री वीरेन्द्र यागनिक द्वारा गुरु और शिक्षा विषय पर एक आलेख प्रकाशित किया जा रहा है। योगेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म इस मास का प्रमुख पर्व है। बीकानेर की सहायक शोध अधिकारी डॉ. बसंती हर्ष ने श्रीकृष्ण के जीवन के अनेक पक्षों को सोदाहरण आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया है। राष्ट्रीय मंत्री प्रचार श्री कासी वी. राव ने शाखाओं का पालन करने योग्य कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिये हैं। इनके अनुपालन से हमारी सेवा की अवधारणा को बल मिलेगा।

केन्द्रीय प्रोत्साहन राशि - जो प्रान्त गत वर्ष जमा किये गये कुल केन्द्रीय शुल्क की राशि के बराबर इस वर्ष 30 सितम्बर, 2015 तक केन्द्रीय अंश की राशि जमा करेंगे, उन प्रान्तों को 5% की प्रोत्साहन राशि किसी प्रकल्प के लिए प्रदान की जायेगी। अक्टूबर मास में विजय दशमी की नवरात्रि के पूर्व श्राद्ध पक्ष पर अपने पूवजों के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए दान की विशेष परम्परा है। दान की इस परम्परा में परिषद् के सदस्य परिवार राष्ट्रहित में एल.पी.जी.गैस की सब्सिडी छोड़ने का संकल्प लें। 30 अक्टूबर तक छोड़े गये सदस्यों की संख्या प्रान्तशः मेल पर प्रेषित करें, इसे नवम्बर अंक में प्रकाशित किया जायेगा।                                                        - राष्ट्रीय संगठन मंत्री


 
October, 2015
सम्पादकीय
राष्ट्रीय दायित्वधारियों की बैठक राँची में सम्पन्न हुई। 55 सदस्यों ने दो दिवसीय बैठक में संगठन, प्रकल्प, संविधन, नियम, वित्त और नीति के बारे में गहन चिन्तन किया गया। बैठक का विस्तृत ब्यौरा इस अंक में दिया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों से परिषद् के संविधान और नियमावली पर न्यायमूर्ति श्री विष्णु सदाशिव कोकजे की अध्यक्षता वाली समिति ने गम्भीर चिन्तन कर नया प्रारूप प्रस्तावित किया। विभिन्न विषयों पर आम सहमति तथा विवादित बिन्दुओं पर आये सुझावों को समायोजित करते हुए 15वें प्रस्तावित प्रारूप पर चर्चा हुई। यह प्रारूप कुछ संशोधनों के साथ फरीदाबाद में आयोजित शासी मण्डल की बैठक में प्रस्तुत किया जायेगा। आशा की जाती है कि वर्ष 2016-17 में नये संविधान के अनुसार देश के 5-6 संभागों की रचना के अनुसार कार्य प्रारम्भ किया जाएगा। संगठन के विस्तार को देखते हुए एक केन्द्र के द्वारा संचालन सुलभ नहीं होने के कारण व्यवस्था का विकेन्द्रीकरण किया जा रहा है। परिवर्तन का प्रभाव संगठन एवं संचालन की गुणवत्ता पर न पड़े यह ध्यान रखना होगा। 

संस्कृति सप्ताह के आयोजन और रिपोर्ट इस अंक की मुख्य विषय वस्तु है। परम्परागत लोक कलाओं तथा अभिरूचियों की प्रतियोगिताएँ,  गीत, नाटक, भजन आदि के कार्यक्रम बड़े उत्साह के साथ सम्पन्न होते हैं। यह आयोजन महिला सदस्यों के नेतृत्व में सम्पन्न करने का आग्रह है। महिला सदस्याओं की नेतृत्व क्षमता का प्रयोग शाखा संचालन एवं प्रवास के लिए सम्भव होना चाहिए। इसीलिए विकसित महिला नेतृत्व की राष्ट्रीय कार्यशाला 29 नवम्बर, 2015 को मुरादाबाद (उ.प्र.) में आयोजित किया गया है। दक्षिण भारत को छोड़कर राष्ट्रीय कार्यशाला में 14 क्षेत्रों के सभी प्रान्तों का प्रतिनिधित्व होना अपेक्षित है।

यह वर्ष क्षेत्रीय सम्मेलनों का वर्ष है। सभी क्षेत्रों ने तिथि और स्थान निर्धारित कर केन्द्रीय कार्यालय को सूचित करें। स्मरण रहे कि 20-21 दिसम्बर, 2015 को ग्वालियर में समूहगान की तथा 2-3 जनवरी, 2016 को आगरा में भारत को जानो की राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ आयोजित हैं। क्षेत्रीय सम्मेलनों में प्रस्तावित विषयों की सूची यथा शीघ्र प्रेषित की जायेगी।

राँची की बैठक में अपेक्षित संख्या 78 थी। केन्द्र के कई बार स्मरण कराने पर भी कुछ सदस्य बिना सूचना दिये बैठक में अनुउपस्थित हुए परन्तु कुछ सदस्य सूचना देने के पश्चात भी अनुपस्थित रहे। यह स्थिति आयोजकों के लिए भ्रम उत्पन्न करती है तथा राष्ट्रीय दायित्वधारियों की मनः स्थिति को प्रकट करती है। आखिर हम अनुशासनप्रिय महान् उद्देश्य के लिए काम करने वाले सेवा भावी संगठन है। हमारी गुणवता संगठन के अन्दर तथा समाज स्तर पर प्रकट होना आवश्यक है।

मासिक मुख पत्रक ‘नीति’ के लिए कोर कमेटी ने मुझे सम्पादक का दायित्व दिया है। आभारं इस अंक में नीति के बारे में कुछ सुझाव दिये जा रहे हैं। इच्छा है कि नीति के माध्यम से केन्द्र और शाखाओं का संवाद स्थापित किया जाए। आपके सुझाव की प्रतीक्षा रहेगी।                              - सुरेश चन्द्र गुप्ता


November, 2015
अहंकार का शमन करें
परिषद् का कार्य मूलतः दायित्व आधारित है अर्थात् कार्यकारिणी के दायित्वधारियों को कार्य की सफलता का यश प्राप्त होता है। समाचार पत्रों में नाम, फोटो के साथ प्रशस्ति भी मिलती है। इस कारण अनेक सदस्यों के मन में पद प्राप्ति की आकंक्षा आना स्वाभाविक है। अपना कार्य टीम वर्क के आधार पर सफल होता है। विकलांग शिविर का उदाहरण लें तो शिविर की योजना बनाना, संसाधन जुटाना, स्थान निश्चय करना, प्रचार करना मुख्य कार्य है। कृत्रिम अंग वितरण के लिए टीम का चयन आदि होता है। बड़ी टीम का गठन होता है। सभी का कमोवेश सहयोग आयोजन के लिये प्राप्त होता है। तब कहीं प्रकल्प सफल होता है। दायित्वधारियों को यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सफलता का श्रेय सदैव पूरी टीम को दिया जाए। सफलता के अनेक पायदान प्राप्त करने अथवा समाज के द्वारा यश प्राप्त होते हमारे मन में समाज सेवा का अंहकार आने लगता है। फिर मेरे विचार, मेरी योजना, मेरी सफलता यह भाव मन में दृढ़ होने लगता है। सेवा के क्षेत्र में ऐसे अंहकार भाव का किंचित भी स्थान नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति सेवा कार्य के लिए आवश्यक तो है पर अपरिहार्य नहीं। मैं श्रेष्ठ हूँ कार्य में सक्षम हूँ यह आत्म विश्वास है। परन्तु मैं ही श्रेष्ठ हूँ यह अहंकार है। सेवा कार्य के लिए कार्य करते समय सहयोगी कार्यकर्त्ताओं का प्रशिक्षण भी हमारा दायित्व है। ऐसी क्षमतावान टोली का निर्माण हमारा दायित्व है। कार्यकर्त्ता निर्माण एक सतत् प्रक्रिया है। जिन शाखाओं में यह कार्य नहीं होता है वे शाखाएँ विकास की प्रक्रिया से अवरूद्ध हो जाती है। अतः शाखाओं के सतत् विकास की प्रक्रिया का आधार है कार्यकर्त्ता निर्माण। अहंकार का शमन, मैं नहीं तू सफलता का श्रेय टीम को, न्यूतताओं की जिम्मेवारी स्वंय की। ऐसे भावों का स्मरण करें, ग्रहण करें। ऐसे विचारों से अपने जीवन को प्रकाशित करें। व्यक्ति के अहंकारी भाव के रूप में रावण के अहंकार का शमन हुआ। विजय दशमी हमें यह स्मरण कराती है। समरसता के भाव का आत्मसात कर स्नेह और आत्मीयता का प्रकाश बांटते चले - यही है विजय दशमी व दीपावली का सन्देश।


December, 2015
सम्पादकीय
सर्दी के मौसम का आगाज हो गया। अपने प्रमुख धार्मिक पर्व विजय दशमी और दीपावली की व्यस्तता के बीच शाखाओं ने समूहगान, भारत को जानो, गुरु वन्दन छात्र अभिनन्दन तथा संस्कृति सप्ताह के इतने कार्यक्रम सम्पन्न किये कि नीति में उनके स्थान दे पाने में कठिनाई हुई। दिसम्बर मास में राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ एवं क्षेत्रीय अधिवेशनों की तैयारियाँ अपने चरम पर है। इन कार्यक्रमों का सफल आयोजन ही हमारा उद्देश्य है या कुछ  इसके आगे भी है। इन आयोजनों का उद्देश्य है समाज में सकारात्मक सोच का निर्माण करना तथा सामूहिक शक्ति से समस्याओं का समाधान करने की संकल्प शक्ति। परिषद् के द्वारा इन कार्यक्रमों का प्रभाव बढ़ता चले। इसके लिए कार्यकर्त्ता निर्माण-चिन्तनशील प्रभावी नेतृत्व के गुणों से युक्त साधन सम्पन्न लोगों को जोड़ना हमारा उद्देश्य है। राष्ट्रीय कार्यशालाओं में परिषद् के नेतृत्व ने समस्त शाखाओं द्वारा समाज के यशस्वी लोगों को जोड़ने की कार्य योजना प्रस्तावित की थी। इस परिपेक्ष्य में गैर सदस्यों की बैठकों की श्रृंख्ला चालू की गई। दिल्ली, चण्डीगढ़, कोटा, बनारस जैसे अनेक स्थानों पर चिन्तनशील बन्धुओं को परिषद् की कार्य योजना से अवगत कराया गया। इसके सुखद परिणाम भी प्राप्त हो रहे हैं। सभी पूर्व पदाधिकारी अपनी क्षमताओं का उपयोग कर परिषद् के सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम में अपना योगदान देने के लिए आमंत्रित हैं।                                                               -सम्पादक


 

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