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                                                    Niti Editorials : 2014

January समय की मांग
February सत्यमेव जयते
March ज़रा याद करो कुर्बानी
April स्वागत हे नववर्ष तुम्हारा
May नमन् उन्हें मेरा शत बार
June हमारे वन्दनीय
July संगच्छध्वं सं वदध्वं ........
August अदीनाः स्याम....
September सम्पादकीय
October सम्पादकीय
November समग्र ग्राम विकास की परिकल्पना
December सम्पादकीय

 

January, 2014
समय की मांग

जनवरी 2014-परिषद् परिवार के सभी पदाधिकारियों, सदस्यों एवं अन्य पाठक वर्ग को सम्पादक मण्डल की ओर से
agrarian  नव-वर्ष की अनेकानेक मंगल कामनाएँ।

विवेच्य मास के दो महत्वपूर्ण संदर्भ हैं-राष्ट्र गणतंत्र बना और युवा - उद्घोष के प्रणेता, स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती-एक ऐसा परिव्राजक जिसने कहा था ‘मुझे निष्ठावान एक सौ युवकों की आवश्यकता है, उन्हीं के सहयोग से मैं भारत की तस्वीर, तकदीर और तदबीर बदल दूंगा।’ राष्ट्र गौरव की भावना और भारत की उदात्त वैदिक संस्कृति जैसे उनकी रगों में रक्त-प्रवाह के रूप में विद्यमान थी। भ्रष्टाचार, बलात्कार, स्वार्थपरता, वंशवाद और सत्ता-लोलुपता की स्थिति को देखकर, यदि आज वह महामानव (विवेकानन्द) जीवित होता, तो कितना तिलमिला उठता, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। जो सन्त भारत को विश्व का सिरमौर देखना चाहता हो, वर्तमान की स्थिति को देखकर वह उद्विन्ग हुए बिना नहीं रह सकता था।

गणतन्त्र की तो परिभाषा ही है 'Govt. of the people, by the people and for the people'। परन्तु खेद है कि उसका अर्थ कुछ यूँ बदल सा गया Govt. off the people, far (from) the people and (to) buy the people  जी हाँ पैसे बांटो, वोट लो।

बाबा साहब डॉ॰ भीम राव अम्बेडकर ने क्या कभी सोचा होगा कि जिस सँविधान को लिपिबद्ध कर वह राष्ट्र को समर्पित कर रहे हैं, जिसमें सहिष्णुता, भ्रातृभाव, समरसता और राष्ट्र की अखण्डता की भावनाओं को पिरोया गया है, आने वाले समय में उस संविधान का क्या हशर होगा? उसकी विभिन्न धाराओं को निजी स्वार्थ के लिए परिभाषित किया जाएगा?

                                                                                      सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः
                                                                                     सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग भवेत्।

यह है भारतीय संस्कृति का मूल मन्त्र। परन्तु आज बात-बात पर आक्रोश। क्या राजनीति, क्या सामाजिक व्यवस्था, क्या शिक्षा नीति, क्या व्यापारनीति और क्या उदारीकरण - सभी ओर त्राहि-त्राहि मची है। इसीलिए उद्घोष दिया जाता है - ‘उत्तिष्ठत, जाग्रत’ -उठो, जागो' और अपने देश को श्रीकृष्ण बन उसके सुदर्शन-चक्र के प्रयोग से बचाओ। सरीखी बेटी द्रौपदी की लाज की रक्षा अब तुम्हारे ही हाथ में है। परिषद् की शाखाएँ भी ‘बेटी बचाओ आन्दोलन’ में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

परिषद् का एक स्तम्भ है सेवा (Service) - ‘देश हमें देता है सबकुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें।’ कुछ देर शान्त मन से, एकान्त में बैठ इस मन्त्र पर विचार करें और अपने से पूछें कि देश की इस अव्यवस्था को सुधारने में आपका क्या योगदान हो सकता है! अपने लिए तो सब जीते हैं, क्या हमने किसी जरूरतमन्द का भला किया। गोसाईं जी ने ठीक ही कहा था-

                                         परहित सरिस धरम नहिं भाई।            पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।

लोक सभा और राज्य सभा में परस्पर छींटा-कशी से राष्ट्र का भला होने वाला नहीं। भाविप के संस्थापक महामंत्री डॉ॰ सूरज प्रकाश जी के कुछ शब्द अनायास स्मरण हो आते हैं- x x x x (यह संस्था उन लोगों की है) जिन्होंने स्वयं को निर्धनों, असहाय एवं निरक्षर लोगों की सेवा में समर्पित किया है ताकि उनमें उत्तरदायित्व एवं आत्म विश्वास का भाव जगा सके’। हम इस परिभाषा पर कितने खरे उतरते हैं, इसका आकलन स्वयं को करना होगा।

परिषद् की परिकल्पना रही है ‘सुन्दर, समर्थ और सुसंस्कारित भारत की’। अपनी स्वर्ण-जयन्ती के अवसर पर परिषद् के प्रत्येक घटक को सोचना होगा कि इस दिशा में हमारी क्या उपलब्धि रही है। यह सच है कि ‘जो है समर्थ जो शक्तिवान, जीने का है अधिकार उसे’ तो क्यों न हम आगामी अर्द्धशती में अपने संगठन को इतना शक्तिशाली बना लें कि राष्ट्र के भावी-कर्णधार परिषद् से पूछें ‘बता तेरी रज़ा क्या है।’

यह सच है कि ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’ परन्तु देश की सीमाएँ भी कभी-कभी असुरक्षित लगने लगती हैं। समय आ गया है कि प्रत्येक युवक इतना बलशाली बने कि उसे भी गुरु गोविन्द सिंह जी की वाणी दोहरानी पड़े-‘सवा लाख से एक लड़ाऊँ। तब गोविन्द सिंह नाम कहाऊँ’

परिषद् की अनेक योजनाओं में एक प्रकल्प और जोड़ देना चाहिए ‘सामयिक विषयों पर परिचर्चा और उनका यथोचित समाधान’। युवा पीढ़ी को इसमें जोड़ना नितान्त आवश्यक है। स्कूलों के अतिरिक्त महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी परिषद् की पैठ आवश्यक है। जिससे परिवर्तनशील संसार में अपनी ठोस पहचान बनाई जा सके। आशा है परिषद् के कर्णधार इस ओर ध्यान अवश्य देंगे। सेवा के सर्वोत्तम भाव से सेवा प्रसंग की इति करना चाहूँगाः-

                                                                                          न त्वहं कामये राज्यें, न स्वर्ग, न पुनर्भवम्।
                                                                                          दुःखतप्तानाम् प्राणिनाम् आर्त नाशनम्।।


February, 2014
सत्यमेव जयते

भारत सरकार के दफ़्तरों और भारतीय न्यायालयों में न्यायाधीश के आसन (पीठ) के पीछे भित्ति पर सरकारी लोगो (Logo) -तीन शेर-के नीचे लिखा रहता है ‘सत्यमेव जयते‘ अर्थात् सत्यम् एव जयते (सदा सत्य की ही जीत होती है)। संस्कृत में यह पूरा सन्देश इस प्रकार है- सत्यमेव जयते नाऽनृतम्-सत्य की ही जीत होती है, झूठ की नहीं।

प्रश्न सत्य, असत्य का नहीं, न्यायाधीश की सोच और मानसिक सन्तुलन पर भी इसका निर्णय निर्भर करता है या फिर कोई वादी या प्रतिवादी पक्ष कितनी हथेली गरम कर सकता है। मैं उपनिषद् के अधोलिखित श्लोक को इस सम्बन्ध में उद्घृत करने का लोभ संवरण नहीं कर सकता-

हिरणमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्वं पूषन्नपावृणु सत्य धर्माय द्रष्टये।।

एक चमकीले पात्र से सत्य का मुख ढका हुआ है, हे पूषन् (सूर्य) आप उस चमक को (मेरे सामने से) कृपया हटा दीजिए ताकि मैं सत्यधर्म का दर्शन कर सकूं।

वाह! खनखनाती हुई तिजौरी ही तो चमकदार आकर्षण है जिससे आँख रहते हुए भी न्यायाधीश उस चकाचौंध से लालायित हो उठता है। फिर सत्य-असत्य का उसे आभास नहीं रहता। परिणाम - सद् - न्याय न हो सकना। उपनिषद्कार ने तो शायद इसका आध्यात्मिक दृष्टि से उल्लेख किया हो परन्तु हम सांसारिक उसके गहन अर्थ से सर्वथा अनभिज्ञ रहना चाहते हैं।

महात्मा बुद्ध ने तो कहा था ‘‘सूर्य, चन्द्र तथा सत्य लम्बे समय तक ओट में नहीं रह सकते’’। एक प्रसिद्ध कहावत है ‘सच्चाई का बोल बाला, झूठ का मुँह काला’। भारतीय संविधान भी शायद सत्य का ही पक्षधर है परन्तु राजनीति इतनी विषैली हो गई है कि प्रायः प्रत्येक निर्वाचित प्रतिनिधि सोचता है ‘- तुझ को पराई क्या पड़ी, अपनी निबेड़ तू’। बस अपने प्रतिनिधियों के प्रति यहीं से विद्रोह और आक्रोश की भावना जागृत होने लगती है और हाल में हुए चुनाओं में आम आदमी (जिसकी शायद कदर नहीं होती)  ने डंके की चोट से सिद्ध कर दिया कि समय आ गया है कि उसकी आवाज़ भी सुनी जाएगी।

मानव सच्चाई का सामना करने से क्यों घबराता है? शायद उसको किसी भय की आशंका रहती हो परन्तु उसे याद रखना होगा कि सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से। कि खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज़ के फूलों से।।

और आर्य समाज के संस्थापक महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने तो आर्य समाज के दस नियमों की सूची बनाते समय पहले, तीसरे, चौथे और पाँचवें नियमों में सच्चाई को ही सर्वप्रथम स्थान दिया थाः ‘सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सदा उद्यत रहना चाहिए’ (चौथा नियम)। स्वामीजी को न जाने कितने प्रलोभन दिए गए परन्तु सत्य की डगर पर चलने से वह विचलित नहीं हुए। आध्यात्मिक और समाजोद्धार की दृष्टि से उन्होंने जिस प्रथम ग्रन्थ का प्रणयन किया उसका नाम ही था ‘सत्यार्थप्रकाश’ - सत्य का प्रकाश। अपने परवर्ती समय में जो सामाजिक कुरीतियाँ प्रचलित थीं उनसे देशवासियों को अवगत करा उनसे छुटकारा दिलाने हेतु उन्हें 18 बार विषपान भी करना पड़ा परन्तु वाह रे परिव्राजक! तुम ने अपने मनोबल से सब कुछ झेल लिया। यह है सत्य के मार्ग पर अडिग रहने और तपस्या करने का परिणाम। स्वामी विवेकानन्द भी अपने जीवन में इस राह के राहगीर रहे।

दीक्षान्त समारोह (Convocation) के अवसर पर भी प्रबुद्ध मनीषी स्नातकों को उपदेश देते हैं तो यहीं से आरम्भ किया जाता है ‘सत्यं वद, धर्मं चर, स्वाध्यायान्मा प्रमदः ......’ उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त हे स्नातक! तुम अपना नया जीवन आरम्भ करने जा रहे हो अतः सर्वप्रथम तुम्हें सत्य बोलना पड़ेगा, धर्म की डगर पर चलना पडे़गा जिससे प्राणी मात्र का भला हो सके, निरन्तर स्वाध्याय करना पड़ेगा जिससे तुम्हारा ज्ञान वर्धन होता रहे आदि आदि। यहाँ भी ‘सच्चाई’ को ही प्राथमिकता दी गई है।

अंग्रेजी में भी कहा जाता है 'Truth always Prevails'। भगवान के घर में देर भले ही हो अन्धेर नहीं। हमारे साधु सन्तों, महापुरुषों संन्यासियों ने सदा सच्चाई की डगर पर ही चलने की शिक्षा दी है।

परिषद् भी अपने संस्कार प्रधान प्रकल्पों के माध्यम से अपनी युवापीढ़ी को इसी सात्विक विचारधारा को परिपुष्ट करने की शिक्षा देने में अग्रसर है। ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्,’ ‘असतो मॉ सद्गमय,’ निष्ठाधृति सत्यम्,’ ‘यत्र सत्यस्य परमं निधानम्’ आदि ध्येय वाक्य भी सत्य की महिमा का ही वर्णन करते हैं। संस्कृत में एक और उक्ति भी हैः सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, मा ब्रूयात सत्यं अप्रियम्।।

अर्थात् सत्य बोलो परन्तु प्रिय बोलो, अप्रिय सत्य मत बोलो। परन्तु क्या सत्य कभी मीठा होता है? सच्चाई हमेशा कड़वी लगती है। फिर भी जीवन में ‘सत्यमेव जयते’ ही फलदायी है

                                                                                                                                                                                                                                                                  - ध॰व॰स॰


March, 2014
ज़रा याद करो कुर्बानी

गणतन्त्र दिवस (26 जनवरी 2014) को बैठे हुए मैंने कुछ विचार यहाँ उकेरे (लिपिबद्ध किए) हैं। आप सोचते होंगे कि ‘नीति’ के मार्च अंक के लिए जनवरी में क्यों लिखा जा रहा है। तो सुनिए! आप की पत्रिका एक महीने पहले ही प्रेषित कर दी जाती है अर्थात् 28 जनवरी को ‘नीति’ का फरवरी अंक डाक द्वारा भेज दिया जाएगा। अस्तु! अब जो तैयारी हो रही है वह मार्च अंक की है। समझ में आई बात।

हाँ! तो गणतन्त्र दिवस पर विभिन्न क्षेत्रों में बहुत से सम्मानों की घोषणा की जाती है- कुछ जीवित व्यक्तियों के लिए और कुछ मरणोपरान्त। कभी-कभी तो घोषणा मात्र रह जाती है, वह सम्मान गन्तव्य तक पहुँचता ही नहीं। खैर! इस समय तो हमें कोकिला कण्ठ भारत रत्न लता मंगेशकर द्वारा गाए गीत की वे पंक्तियां गुनगुनाने की इच्छा हो रही हैः

        ‘ए मेरे वतन के लोगो, ज़रा आंख में भर लो पानी।
        जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी’।।

गीत लम्बा है परन्तु बिना जाति, भाषा, राज्य, धर्म विशेष के भेद भाव से मात्र ‘हिन्दुस्तानी’ बनकर जिन्होंने देश की अस्मिता बचाए रखने के लिए अपने जीवन की आहुति दे दी उनके लिए आँखों में पानी भर आना स्वाभाविक है। कुछ वीरों ने यवनों से टक्कर लेते हुए ‘हिन्द दी चादर गुरु तेग बहादुर’ के अनुरूप अपना और अपने परिवार का बलिदान दिया और दूसरी ओर सुखदेव, राजगुरु, भगत सिंह सरीखे अनेक साहसिक वीरों ने अंग्रेज़ी राज-सत्ता से लोहा लेते हुए अपने देश के लिए कुर्बानी दे दी। फांसी के एक दिन पूर्व अपने मित्र को पत्रोत्तर में जानते हो (भाग्यवान) भगत सिंह ने क्या लिखा था! ‘‘....... लेकिन मेरे दिलेराना ढंग से हंसते-हंसते फांसी पाने की सूरत में हिन्दुस्तानी माताएँ अपने बच्चों को भगत सिंह बनाने की आरज़ू किया करेंगी ....’’ वाह रे वीर! तुझे सलाम।

वस्तुतः कुर्बानी का यह जज़्बा आता कहाँ से है? जीजा बाई जैसी माँ जब अपने वीर पुत्र शिवाजी को और जयन्ती बाई जैसी माँ जब अपने पुत्र राणा प्रताप को लाड लड़ाते हुए भी वीरत्व की शिक्षा देती हैं तो ही गुरुजी की वाणी से यह निस्सृत होता है। ‘सवा लाख से एक लड़ाऊँ तब गोबिन्द सिंह नाम कहाऊँ’। इतिहास के पन्ने ऐसे वीरों/वीरांगनाओं की शौर्य गाथाओं से भरे पड़े हैं। प्रयास यह होना चाहिए कि हम अपनी सन्तानों को ऐसी वीरता पूर्ण कहानियों को पढ़ने की प्रेरणा दें। परन्तु खेद इस बात का है कि आज की युवा-पीढ़ी छैल-छबीली बनकर अपना नाम कमाना चाहती है।

परन्तु आशा की एक किरण अवश्य दिखाई देती है। भारत विकास परिषद् अपने प्रकल्प ‘भारत को जानो’ के माध्यम से अवश्य ही युवकों/युवतियों को इतिहास की उन जाज्वल्यमान घटनाओं से अवगत कराने का प्रयास करती है। यही नहीं पूरक के रूप में देश प्रेम/देश भक्ति की भावना को जगाए रखने के लिए ऐसे गीतों की प्रतियोगिता भी करवाती है।

ऊपर माँ के रूप में महिला की चर्चा हुई है। वस्तुतः प्रत्येक महिला में ममत्व की भावना छिपी रहती है। मेरी प्रार्थना है कि महिला दिवस मनाते हुए मात्र महिला के अधिकारों तक ही अपने आप को सीमित न रखा जाए अपितु भविष्य के संग्राम से जूझने के लिए वह अपनी सन्तति को कैसे तैयार करेंगी, इस पर भी विचार करना होगा। मुझे कवि का एक दोहा याद हो आता है -

        जननी जने तो भक्त जन, या दाता या शूर।
        नाहीं तो तू बांझ रह क्यों व्यर्थ गंवावे नूर।।

वर्तमान परिस्थितियों में नाना प्रकार के आतंकवाद से जूझने की आवश्यकता है। इसलिए शूर वीर युवकों को इस चुनौती को स्वीकार करना होगा। युवा पीढ़ी को उपरोक्त युवा-साथियों से ही प्रेरणा लेनी होगी, यही समय की मांग है।

अस्तु मेरे प्यारे वीरो! देश की आज़ादी के लिए - सम्पूर्ण स्वराज के लिए-कुर्बान होने वाले वीरों की करुणामयी परन्तु प्रेरणादायी गाथा ज़रूर पढ़ो। कहीं ऐसा न हो कि समय आने पर आपको शर्मिन्दा होना पड़े। 

देश की अस्मिता की सुरक्षा के लिए समर्पित इन साहसी वीरों का एक ही नारा था - सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं

 - धर्मवीर सेठी


April, 2014
स्वागत हे नववर्ष तुम्हारा

स्वागत, अभिनन्दन, ‘जी आयाँ नूं’ - ये शब्द भारतीय संस्कृति की उदात्तता को दर्शाते हैं। आप के घर में कोई व्यक्ति आए अथवा आपके कार्यालय-कक्ष में कोई मिलने आए तो आप खड़े होकर उस आगन्तुक का स्वागत करेंगे। क्या यह सत्य नहीं है? ‘आगत का स्वागत’ मात्र व्यावहारिकता नहीं अपितुः मानव-गुण का परिचायक है। इसी से तो आत्मीयता का भाव परिलक्षित होता है।

यह तो रही व्यक्ति की बात। क्या हम नए साल का, नए वर्ष का, नए-सम्वत् के आगमन अर्थात् आरम्भ पर उसका अभिनन्दन नहीं करेगें? ज़रा सोचिए! एक जनवरी की पूर्व सन्ध्या पर अलग-अलग होटलों में जाकर पश्चिमी सभ्यता/संस्कृति के दीवाने क्या-क्या गुलछर्रे नहीं उड़ाते। परन्तु समाज में अब भी ऐसे तत्व मौजूद हैं जो अपनी भारतीय संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखते हुए विक्रमी नव-सम्वत् का स्वागत वैदिक ऋचाओं के सस्वर पाठ से यज्ञ में आहुतियाँ देकर करते हैं। यही समय की मांग है। अपनी अस्मिता को कम मत आंकों। ध्यान रहे विक्रमी संवत् अंग्रेज़ी सन् से 57 वर्ष पहले शुरू हुआ था। आज अंग्रेज़ी सन् 2014 है जबकि विक्रमी संवत् 2071। पिछले वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 11 अप्रैल 2013 को थी जबकि इस वर्ष यह तिथि 31 मार्च 2014 को पड़ रही थी परन्तु इस विषय पर हमनें ‘नीति’ के अप्रैल अंक में चर्चा करनी उचित समझी।

भारतीय नव संवत् किन्हीं अन्य कारणों से भी महत्वपूर्ण है जिनमें सृष्टि रचना, श्रीराम का राज्याभिषेक, पंचांग एवं युगाब्द का आरम्भ, आर्य समाज की स्थापना, रबी की फसल का संग्रह एवं देश के आर्थिक वर्ष का आरम्भ (प्रायः 1 अप्रैल से) मुख्य हैं।

अस्तु! राष्ट्रीय स्वाभिमान एवं गौरव का प्रतीक भारतीय नव-संवत्सर समस्त परिषद् परिवार एवं राष्ट्र के लिए मंगलमय हो, यही कामना है:

नव संवत् का हुआ आगमन, उल्लसित मन से करें स्वागतम्।
है मेरी यह मनोकामना, जग में हो अब शान्ति स्थापना।
बढ़े परस्पर भाई चारा, ऐसा हो संवत्सर हमारा।।

अप्रैल मास में भारत विकास परिषद् के नव निर्वाचित शीर्ष पदाधिकारियों का अभिनन्दन करते हुए भी हमें गर्व की अनुभूति होती है। 16 फरवरी 2014 को नोएडा शाखा (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) के आतिथ्य में आयोजित राष्ट्रीय शासी मण्डल की बैठक में सर्वसम्मति से श्री सीताराम पारीक को राष्ट्रीय अध्यक्ष, श्री सुरेन्द्र कुमार वधवा को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष, डॉ० कन्हैया लाल गुप्ता को राष्ट्रीय महामन्त्री और श्री सच्चिदानन्द पांडा को राष्ट्रीय वित्त मंत्री निर्वाचित घोषित किया गया। डॉ० सुरेश चन्द्र गुप्ता राष्ट्रीय संगठन मन्त्री हैं। इन सबका अभिनन्दन, स्वागत करना भी परिषद्-परिवार का पावन कर्त्तव्य बनता है। इनके मार्गदर्शन में परिषद् उत्तरोत्तर प्रगति-पथ पर बढ़े, यही कामना है।

ऊपर श्रीराम की ओर भी थोड़ा संकेत किया गया है। वस्तुतः राम नवमी हिन्दू-जाति के लिए एक महत्वपूर्ण पर्व है। राम के जीवन पर साहित्यकारों ने बहुत विस्तार से लिखा है। शायद इसीलिए कहा गया-

राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है। कोई कवि बन जाए सहज सम्भाव्य है।।
राम का जीवन चरित पूर्ण रूपेण आदर्श एवं अनुकरणीय है।

परिषद् का एक महत्वपूर्ण प्रकल्प है स्वास्थ्य। ‘पहला सुख नीरोगी काया’। आज विश्व स्वास्थ्य दिवस पर हम शपथ लें कि अपने नगर को रोग-मुक्त बनाने में हमारा भरसक प्रयास रहेगा।

अमृतसर के जलियाँ वाला बाग के नर-संहार की जब याद आती है तो खून खौल उठता है। बर्बरता का ताण्डव। परन्तु ऐसा लगता है कि हमारी सरकार और भारत वासियों ने अब भी उससे सबक नहीं सीखा। अन्ततोगत्वा अपने राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा हेतु हमें संगठित होना ही पड़ेगा। ‘संघे शक्ति कलियुगे’ और ‘संगछध्वं संवदध्वं, सं वो मनासि जानताम्’ की विचारधारा से यदि भारत वासी आगे बढ़ेंगे तो ही उनका कल्याण सम्भव होगा। इसलिए माता नानकी और पिता गुरु हरगोबिन्द की सन्तति (त्यागमल) सिक्खों के नवें गुरु ‘हिन्द दी चादर’ गुरु तेग बहादुर जी की बलिदान गाथा का स्मरण करते हुए राष्ट्र रक्षा के लिए तैयार हो जाइए;  न जाने कब देश की युवा शक्ति का इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आह्वान करना पडे़-

तीर पर कैसे रुकूं मैं,
आज लहरों का निमन्त्रण।
                             - डॉ० धर्मवीर


 

May, 2014
नमन् उन्हें मेरा शत बार
‘‘स्वतंत्रता हम ने केवल अहिंसक साधनों से प्राप्त की है, यह सरासर झूठ और धोखेबाज़ी है’’ यह उद्गार धीर, वीर, गम्भीर वीर सावरकर ने कहे थे। उन्होंने आगे कहा कि ‘‘1857 में हमारी भूमि पर सचमुच आग भड़क उठी थी ..... यह विश्व में गूंजने वाला एक धमाका था जिसके होम कुण्ड में अन्तिम आहुति थे वीर तात्याटोपे’’।

वीर दामोदर सावरकर का जन्म कृष्ण पक्ष 6 वैशाख, विक्रमी संवत् 1940 तदनुसार 28 मई, 1883 को भगूर ग्राम (नासिक) में हुआ था। अपने परिवार में ये तीन भाई थे परन्तु मातृभूमि भारत के प्रति समर्पित रहते हुए उनके ये उद्गार कितने हृदय स्पर्शी हैं, ‘‘ तीन ही क्यों यदि हम सात भाई भी होते तो भी सभी पुष्पों की तरह भारत माँ के चरणों पर न्योछावर होकर बलिदान का अमर धनुष बन जाते’’। वीर सावरकर को तो जैसे घुट्टी में ही, राष्ट्र के प्रति पूरी निष्ठा से, समर्पण की भावना पिलाई गई थी।

विजयदशमी पर दिए गए संदेशों में वीर सावरकर ने कहा था ‘‘यह ठीक है कि हिन्दुस्तान हिन्दुओं का है। फिर भी जिस प्रकार इन्द्रधनुष का सौन्दर्य बहुरंगी होने से बहुगुणा हो जाता है, उसी प्रकार भारत के भविष्य का आकाश भी उतना ही सुनहरा हो सकता है यदि मुस्लिम, पारसी, यहूदी व अन्य संस्कृतियों के सर्वोत्तम गुणों को हम ग्रहण कर लें’’ (क्या आज के परिदृश्य में ऐसी भाईचारे की भावना दिखाई पड़ती है?) इंडिया हाउस के सहवासी हर रात ‘शुभरात्रि’ के रूप में सामूहिक स्वर में दोहराते थे:-

                                                                                                                                                                                        एक देव, एक देश, एक भाषा,
                                                                                                                                                                                        एक जाति, एक जीव, एक आशा।

क्या आप जानते हैं कि वीर सावरकर को एक जन्म में दो आजीवन कारावास का दण्ड दिया गया था। इस पर चुटकी लेते हुए उन्होंने कहा था ‘‘ मैं न्यायाधीश महोदय को कम से कम इस बात के लिए बधाई देता हूँ कि उन्होंने एक जीवन में दो जीवन के कारावास का दण्ड देकर हिन्दुओं के पुनर्जन्म के सिद्धान्त को मान लिया है’’।

अपनी मातृ-भूमि को आततायी अंग्रेज़ी प्रशासन से मुक्ति दिलाने वाले सभी वीरों/वीरांगनाओं को हम नमन् करते हैं। वस्तुतः अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्वाधीनता के लिए क्रान्तिकारी अभियान चलाने वाले सावरकर पहले भारतीय थे।

कारागार में रहते हुए अपने कवि-कर्म को निभाते हुए वह दीवारों पर कविता की पंक्तियाँ उकेरा करते थे। आइए! मन को झकझोरने वाली ऐसी ही कुछ पंक्तियों का भाव समझ हम भी अपने कर्त्तव्य के निर्वहन की शपथ लें:

 काटेंगे, हम माँ के बंधन काटेंगे,                                   मेरे वे सब सखा, स्नेही, साथी,
यह जीवन-बाती इसी हेतु निबटेगी।                   समिधा समान इस ध्येय के लिए आहुत।
बांटेंगे, हम सब माँ के दुःख बांटेंगे,                               बाजीप्रभु बन बलि-पथ पर बढ़ आए,
यह पूत प्रतिज्ञा कभी नहीं टूटेगी।                      बलिवेदी तरुण रक्त से सिंचित।
अपनी प्रतिभा से माँ की प्रतिमा चमके,                 ये ध्येय-सिद्धि-सोपान, सफलता-साक्षी,
अपनी तरुणाई माँ की शक्ति बनेगी।                   जागा फिर भारत, भारतवासी जागा।
वह ही शिक्षा जो माँ के सपने पूरे,                            हर्षित, हृत्तन्त्री-नाद-विभोर आज मैं,
वह ही दीक्षा जो दुश्मन से जूझेगी।                   आसेतु हिमाचल निरातंक, भय भागा।

                                                                     हे मातृभूमि! यह मन अर्पित है तुझको,
                                                                 वाणी-वैभव सब विद्या तुझे समर्पित।
                                                                  है विषय वांग्मय की अनन्य तू जननी,
                                                                  यह मेरा नवरस काव्य तुझे ही अर्पित।

                                                                                                                           -वीर सावरकर, (मराठी से भावानुवाद: वचनेश त्रिपाठी)

आधुनिक परिवेश में भी यह कविता सार्थक है क्योंकि भ्रष्टाचार से अभी मुक्ति दिलानी बाकी है। वेद में भी कहा गया है ‘आचारहीनो न पुनन्ति वेदाः

- डॉ॰ धर्मवीर सेठी


June, 2014
हमारे वन्दनीय

पंचतत्वों - पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश - से बने इस मानव देह की स्वयं मनुष्य ने इतनी दुर्गत कर दी है कि ‘पहला सुख नीरोगी काया’ मात्र कहने और सुनने को रह गया है, उसे सही मायने में क्रियान्वित नहीं किया जा रहा है। ज़रा सोचिए! इन पाँच तत्वों में से क्या कोई ऐसा तत्व बचा है जिसे दूषित न किया गया हो या किया जा रहा हो? विषैले तत्वों के मिश्रण से क्या मिट्टी, क्या पानी, क्या हवा कौन सी ऐसी चीज़ है जो मानव देह को नीरोग बनाए रखने में सहायक हो सके। इस विषय की गम्भीरता को देखते हुए शायद सरकार को भी ‘पर्यावरण मंत्रालय’ के गठन की आवश्यकता पड़ जाती है। इसीलिए ‘पर्यावरण दिवस’ (5 जून) मनाते हुए प्रत्येक मनुष्य को विचार करना चाहिए कि इस दिशा में हमारा क्या कर्तव्य है। पर्यावरण की रक्षा करने के लिए भारत विकास परिषद् ने भी अपनी कुछ योजनाएँ सफलतापूर्वक चला रखी है।

जून मास में पाँच महापुरुषों की जयन्तियाँ मनाई जा रही है। कोई क्रान्तिकारी, कोई कवि, तो कोई साहित्यकार है, तो कोई समाज सुधारक। महाराणा प्रताप (11 जून) की बात करें तो उन्होंने यवनों से लोहा लेने की कसम खाई थी। ‘हल्दीघाटी’ महाकाव्य इस दिशा में एक सर्वोत्तम रचना है। काकोरी काण्ड के पं. राम प्रसाद बिस्मिल (11 जून) ने तो आज़ादी की खातिर फाँसी का फंदा चूमते हुए ‘‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ूए कातिल में है’’ कितनी वीरता के भाव से कहा था।

‘मसि कागद छुओ नहीं, कलम गही नहीं हाथ’ वाला संत कवि, महात्मा गुरु रामानन्द का शिष्य कबीर (13 जून) यद्यपि जुलाहा थे परन्तु उनका एक-एक साखी, दोहा मानव जीवन के सारे तत्व का बखान करने वाला होता है। ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ वाला गीत न केवल मानव देह की संरचना का अति उत्तम उदाहरण है अपितु: उसे अपने शरीर के प्रति सचेत भी करता है। अन्त में कहते हैं ‘सन्त कबीर जतन ते ओढ़ी ज्यूँ की त्यूँ धर दीनी चदरिया’। बेदाग! ‘वन्दे मातरम्’ गीत के माध्यम से माँ-भारती के प्रति अपनी आत्मीयता, निष्ठा, सम्मान और अगाध श्रद्धा जैसी बंकिम दा (बंकिम चन्द्र) (27 जनू) ने व्यक्त की है उसकी सानी नहीं। इस धरती माँ में वह सभी गुण हैं जो किसी भी माँ में होने चाहिएँ। इस गीत का एक-एक शब्द इतना मार्मिक और सारगर्भित है कि गीत की प्रत्येक पंक्ति को गुनगुनाते हुए भारत-माँ जैसे साकार रूप में हमारे सामने उपस्थित हो जाती है। भारत सरकार ने इसे ‘राष्ट्र गीत’ के रूप में स्वीकारा, यही इसकी गरिमा की पहचान है।

‘नीति’ पत्रिका के लिए लिखते हुए भला भारत विकास परिषद् के प्रथम राष्ट्रीय महामंत्री डॉ॰ सूरज प्रकाश को कैसे विस्मृत किया जा सकता है। समाज सेवा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता, दूरदर्शिता, निष्ठा और कुछ कर गुज़रने की उत्कट इच्छा का ही यह प्रतिफल है कि आज समस्त भारत में अपनी 1200 से अधिक शाखाओं के माध्यम से यह संस्था सेवा और संस्कार के विभिन्न प्रकल्पों को पूर्ण उत्साह से क्रियान्वित कर रही है। गत वर्ष ही तो परिषद् ने अपनी स्थापना की अर्द्ध-शती पूरी की थी। अपने प्रेरणा स्रोत डॉ॰ सूरज प्रकाश जी को भी हम उनकी जयन्ती (27 जून) पर नमन् करते हैं।

‘अपनी बात’ को पूरा करने से पहले थोड़ा संकेत समर्थ गुरु रामदास के प्रिय शिष्य छत्रपति शिवाजी (6 जून) की ओर भी करना चाहता हूँ। यदि इतना ही कहा जाए कि ‘शिवाजी न होते हो सुनत होती सब की’ तो स्पष्ट हो जाएगा कि मुगलों से लोहा लेते हुए ही शिवाजी ने हिन्दुओं की रक्षा की थी अन्यथा उन सब को मुसलमान बना दिया गया होता।

प्रत्येक भारतीय का सर, ऐसे महापुरुषों का स्मरण और उनकी जीवन गाथा को पढ़-सुन कर, गर्व से उन्नत हो जाता है। और हो भी क्यों न - यह सब ही तो हमारे प्रेरक रहे हैं और भारतीय संस्कृति के रक्षक भी।

अन्त में कुण्डलिया छन्द के माध्यम से उन सभी महापुरुषों के प्रति नमन् करना चाहता हूँ:

जन्म दिवस मनते रहें इसी तरह हर वर्ष,
कीर्ति स्तवन करते हुए सभी मनावें हर्ष।
सभी मनावें हर्ष बखान करें उदात्त कार्य,
अपने-अपने क्षेत्र में सभी हुए स्वीकार्य।
कहे ‘वीर’ विचार कर, सुनो-सुनो हे विज्ञ जन,
विभूतियों के आदर में सदा मनाओ दिवस जन्म
                    - धर्मवीर सेठी


July, 2014
संगच्छध्वं सं वदध्वं ........

संगठन सूक्त के इस मन्त्र को अक्षरशः न उद्धृत कर उसके भावार्थ को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में आंकना अधिक समीचीन समझता हूँ:

‘प्रेम से मिलकर चलो बोलो सभी ज्ञानी बनो। पूर्वजों की भान्ति तुम कर्त्तव्य के मानी बनो।। हों विचार समान सबके चित्त मन सब एक हों। ज्ञान देता हूँ बराबर भोग्य पा सब नेक हों।। हों सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा। मन भरे हों प्रेम से जिससे बढ़े सुख सम्पदा।।’

भारत के नव-निर्वाचित प्रधान मन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने शायद इन्हीं मन्त्रों के भाव को ध्यान में रखते हुए कहा था कि चुनाव के दौरान चाहे जैसे भी खट्टे-मीठे भाषण दिए गए हों, अब समय आ गया है कि परस्पर वैमनस्य भूलकर सभी दलों को एक जुट हो भारत-भू और राष्ट्र की गरिमा को बनाने के लिए कृत-संकल्प होना पड़ेगा क्योंकि ‘संघेशक्ति कलियुगे’ अर्थात् इस कलियुग में संगठन (एक्ता) में ही शक्ति होती है। एक अंगुली में वह ताकत नहीं होती जितनी शक्ति जब पाँचों अंगुलियाँ मिल जाती हैं तब होती है।

 प्रधान मन्त्री ने अपनी माँ के चरण स्पर्श कर तो आशीर्वाद लिया ही, लोक सभा को राष्ट्र-मन्दिर मानते हुए उसकी सीढ़ियों पर भी अपना माथा टेका। यह था भारतीय संस्कृति का जाज्वल्यमान उदाहरण।

‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमेः’ कहते हुए उन्होंने पहले तो अपनी मातृ-भूमि को वन्दना की, फिर उससे प्रार्थनाः ‘त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयम्’-माँ! आप का कार्य पूरा करने के लिए, आपकी सभी समस्याओं का समाधान ढूँढने के लिए मैंने कमर कस ली है, इसलिए मैं, अपने 125 करोड़ देशवासियों के साथ मिल अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकूँ, आपसे आशीर्वाद मांगता हूँ: ‘शुभमाशिषम् देहि तत्पूर्तये।’ प्रधान मन्त्री बनने के उपरान्त शायद ही इतने आध्यात्मिक और पवित्र भाव से किसी अन्य ने विचार व्यक्त किया होगा। समस्त भाविप परिवार की ओर से आदरणीय नरेन्द्र मोदी जी को प्रधान मन्त्री का पद सुशोभित करने पर अन्तर्मन से अनेकानेक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

आप जानते हैं भारत की संस्कृति को विश्व पटल पर सम्मानित करने वाले एक और ‘नरेन्द्र’ हुए थे जिनको संन्यास ग्रहण करने के बाद, स्वामी विवेकानन्द के नाम से जाना जाने लागा। 'My dear brothers and sisters of America'  उद्बोधन ही श्रोताओं से खचाखच भरे हॉल के लिए काफी था। तालियों की गड़गड़ाहट थमने का तो नाम ही नहीं लेती थीं। ऐसी ही कुछ छवि नरेन्द्र मोदी की भी बन रही है - दो वर्ष वह भी जंगलों, पर्वत-कन्दराओं में भ्रमण करते हुए लगभग परिव्राजक की तरह ही जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। स्वामी विवेकानन्दजी को उनकी पुण्य तिथि (4 जुलाई) पर हमारा सश्रद्ध नमन।

जैसे प्रधान मन्त्री ने जून के प्रथम सप्ताह में अपने पद और गोपनीयता की शपथ लेते हुए भारत को सजाने और संवारने का बीड़ा उठाया है वैसे ही 10 जुलाई को डॉ॰ सूरज प्रकाश जी और उनके बुद्धिजीवी साथियों ने पंच सकार-सम्पर्क, सहयोग, संस्कार, सेवा और समर्पण - की सहायता से समृद्ध, स्वस्थ और संस्कारवान भारत बनाने का सपना संजोया था। सम्पादक कक्ष में बैठा हुआ मैं यह अनुभव कर सकता हूँ कि इस दिशा में हमारी शाखाएँ कितना ठोस कार्य कर रही हैं।

अपनी उपलब्धियों को प्राप्त कराने के लिए कोई मार्गद्रष्टा होना चाहिए तो उसे ही गुरु की संज्ञा दी जाती है। ‘गुरु वन्दन छात्र अभिनन्दन’ प्रकल्प इस दिशा में भाविप की एक महती उपलब्धि है। गुरु पूर्णिमा का पर्व आपके लिए मंगलमय हो यही कामना है। महर्षि वेदव्यास ने कहा थाः ‘‘धर्म दक्षता में, यश दान में, स्वर्ग सत्य में और सुख शील में रहता है।’’ भारत में शिव रात्रि का पर्व बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। शिव के पर्याय चाहे कितने ही क्यों न हो उसका अर्थ है ‘काल्यणकारक’। आइए! इस पर्व को (25.07) इसी पावनता के साथ मनाएँ और कहें ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः

31 जुलाई को अपनी शहादत देने वाले ऊधम सिंह को भला कौन हिन्दुस्तानी भुला सकता है। पंजाब का एक बड़ा मशहूर शहर अमृतसर, उसमें जलियांवाला बाग और उसमें निरीह जनता को घेर कर उनकी जान लेने वाले अंग्रेज़ जनरल डायर। ऐसे क्रूर जनरल की हत्या करने का श्रेय सरदार शहीद ऊधम सिंह को ही जाता है जिन्होंने अपने देश की अस्मिता की रक्षा हेतु अपना भी बलिदान दे दिया। ऐसे यशस्वी वीरों को श्रद्धा-सुमन अर्पित करना कैसे भूल सकते हैं।

यदि प्रधान मन्त्री के शब्दों को ही दुहराया जाए तो समूचे राष्ट्र के लिए अब अच्छे दिन आने वाले हैं। इन्हीं शुभाकाँक्षाओं के साथ ........... - धर्मवीर सेठी


August, 2014
अदीनाः स्याम....

अगस्त मास सदा-सर्वदा के लिए भारतवासियों के लिए एक अविस्मरणीय नसैनी रहेगा क्योंकि बाल गंगाधर तिलक (01-08) का उद्घोष ‘स्वतन्त्रता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है’ इसी महीने चरितार्थ हुआ था। यद्यपि सन् 1947 के 15 अगस्त को हमें स्वतन्त्र देश घोषित कर दिया गया परन्तु यह केवल राजनैतिक स्वतन्त्रता ही थी न कि बौद्धिक स्वतंत्रता। हम आज भी पश्चिमी विचारधारा के अनुगामी बने हुए हैं। खेद की बात है कि आज भी हम अपने प्राचीन ऋषि - मुनियों, वैज्ञानिकों की उदात्त उपलब्धियों के प्रति हीन भाव रखते हैं। 15 अगस्त 1947 को लाल किले की प्राचीर से भारतीय ध्वज को लहराते हुए प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था।
' We have still miles to go and miles to go ' । 67 वर्ष की एक लम्बी अवधि बीत चुकी है परन्तु ग़रीबी पर आज भी हम उतना काबू नहीं पा सके जितना होना चाहिए था। ‘तृष्णा न जीर्णा, वयमेव जीर्णा’ - सरकार की अनेकों योजनाओं को बिचोलियों ने न जाने कैसे हज़म कर लिया। आज़ादी के बाद स्वराज तो मिला लेकिन सुराज नहीं मिल सका।

अब आशा की एक नई किरण दिखाई देने लगी है जब से बहुआयामी व्यक्त्वि के धनी, कर्म निष्ठ एवं पूर्ण रूपेण राष्ट्रोत्थान के लिए समर्पित सम्माननीय श्री नरेन्द्रभाई मोदी ने भारत के प्रधनमंत्री पद को अलंकृत किया है। 15 अगस्त (तब तक यह पत्रिका आपके पास पहुँच चुकी होगी) को प्रथम बार वह दिल्ली के लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को सम्बोधित करेंगे और अपना ‘रोड मैप’ सबके साथ सांझा करेंगे। बिगड़ी अवस्था को सुधारने में समय तो लगता ही है क्योंकि किसी के पास भी जादू की छड़ी नहीं होती कि उससे ‘खुल जा सिम-सिम’ कह कर सब कुछ प्राप्त किया जा सके। देशवासियों को भी उतावलापन न दिखा कर कतिपय धैर्य से काम लेना पडे़गा। परिषद् परिवार आदरणीय मोदी जी की चतुर्दिक सफलता की कामना करता है।

भारत छोड़ो आन्दोलन (09-08) के क्रान्तिकारी एवं फांसी का फंदा चूमने वाले अनेकों वीरों के साथ हमें हेमूकालानी को कभी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने लक्ष्य प्राप्ति के लिए अपने कर्त्तव्य कर्म को खूब अच्छी तरह निभाया।

श्रीमद् भगवद् गीता (18-08) का तो उपदेश ही यही है - कर्मण्येवाधिकारस्ते - कर्म करना ही तुम्हारा अधिकार है। उसका फल देना उस परमपिता के हाथ में है। यदि जनता जनार्दन के हित में कोई काम किया जायेगा तो उसका फल भी अच्छा ही मिलेगा इस में सन्देह नहीं ।

नरहरिदास के शिष्य गोस्वामी तुलसीदास (03-08) ने तो राम के पावन चरित्र की उदात्तता का वर्णन करते हुए स्वयं को कितना तुच्छ समझाः

कवि न होऊँ नहिं वचन प्रवीणू, सकल कला गुण विद्या हीनू।
कवित्त विवेक एक नहीं मोरे, सत्य कहूँ लिखी कागद कोरे।।

उनके इस कथन में उनकी हलीमी की अतिशयता दिखलाई पड़ती है। वाह रे कवि शिरोमणि!

कविता कर के तुलसी न लसे।
कविता लसी भा तुलसी की कला।।

भारतीय वाड़्मय में तुलसी और राम तो जैसे एक दूसरे के पूरक बन गये हैं।

आइए! संस्कृत भाषा में लिखी ‘रामायण’ के रचयिता वाल्मीकि को भी नमन कर लें। संस्कृत (10-08) जितनी कोमल और मृदु भाषा है उतनी ही वह अन्य भाषाओं की जननी भी। अंग्रेज़ी भाषा के Father और Mother क्रमशः संस्कृत के पितृ और मातृ शब्दों से ही तो बने हैं। ऐसे अनेकों उदाहरण दिए जा सकते हें। व्याकरण की दृष्टि से भी संस्कृत जितनी समृद्ध है उतनी और कोई भाषा नहीं।

परन्तु दुर्भाग्य! अपने ही देश में अपनी प्राचीनतम् भाषा, जिसमें अद्वितीय साहित्य उपलब्ध है, को उतना प्रश्रय नहीं मिल पा रहा। यह चिन्ता का विषय है। सम्भवतः नई सरकार इस दिशा में कोई कारगर कदम उठाएगी, ऐसा विश्वास है।

इसी दिन यानि 10 अगस्त को रक्षा बन्धन का पवित्र पर्व भी है। बहिन भाई की कलाई पर, नगरवासी भारत की सीमाओं पर डटे हुए वीर जवानों की कलाई पर, मात्र धागा नहीं बांधते अपितुः उनसे बलात्कारियों से रक्षा एवं सीमाओं की भी रक्षा की महत् कामना करते हैं। इन सूत्रों की बड़ी पवित्रता है, यह हमें समझना और अपने बच्चों को समझाना पड़ेगा। इत्यलम्। - धर्मवीर


September, 2014
सम्पादकीय
हमारी प्रेरणा का स्रोत-भारत माता की सेवा, हमारा लक्ष्य-राष्ट्र का सर्वांगीण विकास। परिषद् के कार्यकर्ताओं में यदि उपरोक्त दो सूत्र हृदय में विद्यमान रहे, तो तत्कालिक कार्यविधि में आने वाली प्रत्येक विसंगति का समाधान आसानी से हो सकता है। बार-बार हमें परिषद् की पंच सूत्री का स्मरण कराया जाता है। क्या यह आवश्यक है? क्या इनके पुर्नस्मरण की आवश्यकता है?  इसका उत्तर आने से पूर्व यह विचार करना अपेक्षित है कि क्या किंचित यह तत्व हमारे व्यवहार का हिस्सा बन गये हैं। यदि नहीं, तो कहीं हम तोता रटन्त के समान इन मंत्रों की जाप तो कर रहे हैं लेकिन जीवन में प्रत्यक्ष व्यवहार का प्रयास नहीं हो रहा है।

पिछले वर्षों में परिषद् की प्रशस्ति बढ़ी है। कार्यकर्ताओं का प्रयास, चिन्तन में नवीनता और उत्साह, लगन, समर्पण के कारण समाज में हमारी स्वीकार्यता भी बढ़ी हैं इस स्वीकार्यता के साथ हमारी महत्वाकांक्षा, प्रसिद्धि की इच्छा और सहभागी कार्यकर्ताओं में प्रतिस्पर्धा की भावना भी बढ़ी है। जब हमें लम्बी दूरी का लक्ष्य लेकर कोई कार्य सम्पन्न करना होता है तो उसमें न्यूनताओं से बचना जरूरी है।

पिछले कुछ महीनों में वार्षिक कार्ययोजना, प्रशिक्षण और नये प्रान्तीय नेतृत्व के क्रियाकलापों से अपनी प्रिय ‘नीति’ के पृष्ठ भरे रहे। विशाल कार्यकर्ता समूह देश भर में जिन कार्यक्रमों का आयोजन करता है, उसका समायोजन नीति में असम्भव नहीं, तो कठिन अवश्य है। इसीलिये इस माह से व्यक्ति नहीं, विचार और कार्य का प्रसार ‘नीति’ की नीति रहेगी।

पारिवारिक संगठन को व्यापकता में वृद्धि के लिये महिलाओं के विषय एवं कार्यक्रम को प्रमुखता देने का विचार भी हुआ है। संगठन का व्याप बढ़ने के कारण हर समय हर स्थान पर अधिकृत विचार देने वाले कार्यकर्ता उपलब्ध नहीं हो पाते। इसीलिये सदस्यों से सीधा संवाद स्थापित करने के लिये ‘‘प्रश्न आपके, उत्तर हमारे’ स्तम्भ चालू किया जा रहा है।

डॉ॰ सूरज प्रकाश जी ने परिषद् को क्लब नहीं वरन् बुद्धिजीवी एवं सम्पन्न वर्ग के चिन्तकों का संगठन बताया था। बढ़ती वैश्विक स्पर्धा में यांत्रिक व्यवस्था, प्रशासन, कार्पोरेट शैली और समर्पण का अहंकार आदि विसंगतियों के कारण आत्मीयता स्नेह और अहंकार का त्याग जैसे गुणों का अभाव कहीं-कहीं दृष्टिगत होता है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि प्रत्येक व्यक्ति के गुणों का सदुपयोग संगठन के लिये करें तभी लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है।

सेवाकार्य में वाह्य आडम्बर, प्रसिद्धि की लालसा और संवेदनहीनता हमारे पुण्य को कम करते हैं। प्रसिद्धि की कामना से की गई सेवा फलीभूत नहीं होती। सेवा की संवेदनशीलता के अनुभव को साझा करें तो अच्छा रहेगा।

विकास की कोई सीमा नहीं है, विकास के अनेक तंत्र विकसित हो रहे हैं। आज देश के चिन्तन का केन्द्र बिन्दु विकास हो गया। विकास में गैर सरकारी संगठन सामाजिक, धार्मिक और जातीय संस्थाओं ने भी अब सेवाभावी कार्यों की ओर कदम बढ़ाये हैं। यह सब भौतिक विकास के अग्रदूत हैं। मानव में सेवाभाव का निर्माण करना संवेदनशीलता विकसित करना और विकास की गति को तेज करना हमारा लक्ष्य है। विकास कार्यों में प्रतिस्पर्धा छोटे-बड़े, कम-अधिक, प्रभावी एवं अप्रभावी कार्य नहीं होते। सेवा कार्य जैसा भी है वन्दनीय है।

कार्य संस्कृति विकसित करने के लिये सभी स्तरों पर मासिक अथवा त्रैमासिक आख्या का प्रबन्ध किया गया है। तंत्र के सभी दायित्वधारी इसका परिपालन सुनिश्चित करें।

यहीं अपेक्षा है! शेष फिर.............                                                                                                            - प्रभारी प्रकाशन विभाग


October, 2014
सम्पादकीय

देश के सुदूर उत्तर पूर्व में ब्रह्मपुत्र उफान पर है, पटना सहित बिहार के अनेक क्षेत्रों में जल भराव के कारण राज्य के नगर विकास मंत्री को विदेश यात्रा स्थगित करनी पड़ी। बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों में परिषद् के शाखाओं ने बाढ़ पीड़ितों को भोजन, वस्त्र आदि की व्यवस्था की है। प्रशासन ने परिषद् सदस्यों की प्रशंसा की। अगस्त माह में स्वतंत्रता दिवस पर रक्तदान, फल वितरण, चिकित्सा शिविर, बच्चों को स्कूल ड्रेस, स्टेशनरी आदि के वितरण का भरपूर कार्यक्रम आयोजित हुए।

गुरु वन्दन छात्र अभिनन्दन और संस्कृति सप्ताह के कार्यक्रम की धूम से नीति के पृष्ठ भरे हुए हैं। तुलसी पौधों का वितरण और वृक्षारोपण की धूम सारे देश में रही। मौसम अनुकूल हो या न हो परिषद् के सदस्य पूरे जोश के साथ जनहित के कार्यक्रमों में जुटे रहे - बधाई। झारखण्ड, कोशी बिहार, दक्षिण बिहार, पश्चिम बंगाल के लम्बे प्रवास के बाद राजस्थान उत्तर पूर्व प्रान्त के जयपुर, अलवर, भिवाड़ी के उत्साही कार्यक्रताओं से मिलने का सुअवसर मिला। प्रान्तीय महासचिव अशोक मित्तल जी कहते हैं परिषद् के काम का चस्का जब तक नहीं लगता कार्यक्रम जीवन्त नहीं होता।

लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री ने ग्रामीण विकास में जन प्रतिनिधियों के विशेष रूचि लेने की अपील की। समग्र ग्राम विकास के प्रकल्प की महत्ता रेखांकित हुई। समस्त शाखायें जनप्रतिनिधियों के सहयोग से ग्राम विकास के प्रकल्प में अग्रणी भूमिका निभाएं सामाजिक सरोकार के बिना समाज सेवी संस्था का प्रभाव दृष्टिगत नहीं होता।

बैंको में सभी परिवारों का शून्य कोष (Zero Balance) से खाता खोलने की योजना ‘‘जन धन योजना’’ के द्वारा चल रही है। व्यापक प्रचार कर बैंकों के समन्वय से एक दिन इस योजना में सहयोग करना अपेक्षित है।

संस्कृति सप्ताह में महिला सहभागिता और नेतृत्व विकास करके महिलाओं को शाखा संचालन में भागीदारी बनाना एक महत्वपूर्ण कदम है। अनेक शाखाओं में कोषाध्यक्ष का दायित्व महिलाओं को देने की परम्परा है। यह प्रशंसनीय है और अनुकरणीय भी। सितम्बर माह के अंक में महिला स्तम्भ एवं जिज्ञासा समाधान का निवेदन किया था। इस कदम को आपने सराहा। धन्यवाद।

लम्बे अन्तराल के बाद आपको राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. के.एल. गुप्ता जी का आलेख ‘राष्ट्र नीति एवं परिषद् की कार्यनीति'  पढ़ने को मिलेगा। आपकी शुभेच्छा से उनका स्वास्थ्य उत्तरोत्तर प्रगति कर रहा है। शीघ्र ही उनका नियमित मार्गदर्शन मिलने की सम्भावना है।

राष्ट्रीय दायित्वधारियों की बैठक 6-7 सितम्बर, 2014 को दिल्ली उत्तर प्रान्त के आतिथ्य में पंजाबी भवन, शालीमार बाग में सम्पन्न हुई। परिषद् की अर्द्धवार्षिक प्रगति और सेवा, संस्कार व सम्पर्क प्रकल्पों का मूल्यांकन सम्पन्न हुआ। संगठन के सत्र में प्रान्ताशः प्रगति की चर्चा हुई। पूर्व अधिकारियों को मुख्यधारा में लाने, समयानुसार कार्यक्रमों में परिवर्तन, क्रियाशीलता, अनौपचारिक सम्पर्क के बारे में प्रतिनिधियों ने सुझाव दिये। बैठक में माननीय वी. भगइया जी ने परस्पर हृदयस्पर्शी सम्पर्क और कार्य संस्कृति को विकसित करने का सुझाव दिया।

शीर्ष मण्डल की बैठक में उत्तराखण्ड के लिये 1.2 करोड़ की निर्माण योजना स्वीकार की गई एवं गोचर में निर्माणाधीन स्कूल भवन का 75% लगभग पूर्ण हो गया है। उडीशा में वृद्धाश्रम सामुदायिक केन्द्र के लिये आर्थिक सहायता स्वीकृत की गई। बहराइच जिले के कई क्षेत्रों में आई विनाशकारी बाढ़ से पीड़ित लोगों के लिये केन्द्र की ओर से सहायता प्रदान की गई।

और चलते-चलते-आप सभी को सूचित करना है कि 7 सितम्बर, 2014 को भारत विकास परिषद् केन्द्रीय कार्यालय में भवन के द्वितीय तल के निर्माण के लिये हवन एवं पूजन के साथ शिला स्थापित की गई। भवन में लिफ्ट का प्रावधान भी किया गया है। देश व्यापी संगठन-समर्पित सदस्य-द्वितीय तल के निर्माण के महत्वपूर्ण कार्य में अपना योगदान करेंगे ऐसी अपेक्षा हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष ने की है। 

 - प्रभारी प्रकाशन विभाग


November, 2014
समग्र ग्राम विकास की परिकल्पना

हे मेरा हिन्दुस्तान कहाँ, वह बसता हमारे गाँवों में’ एवं ‘भारत माता ग्राम वासिनी’ स्वतंत्रता से पूर्व लिखी ये पंक्तियाँ आज भी उतनी ही सच है, जितनी 67 वर्ष पूर्व थी। अन्तर इतना ही आया है कि उस समय देश की 85% जनसंख्या गाँवों में रहती थी और आज 68% भारतवासी देश के 6,40,867 गाँवों में रहते हैं। स्पष्ट है कि भारत गाँव प्रधान देश है और गाँवों के विकास की कल्पना एवं प्रयास के बिना देश की उन्नति की प्रत्येक योजना अर्थहीन रहेगी और देश के सर्वांगीण विकास का प्रत्येक सपना अधूरा रहेगा। वास्तव में ग्रामीण क्षेत्र का सन्तुलित, सर्वागींण एवं तीव्र विकास देश के सामजिक एवं आर्थिक विकास तथा ग्रामीण जनता की खुशहाली के लिये उचित ही नहीं, अनिवार्य है।

भारत विकास परिषद् देश के सर्वांगीण विकास के लिये प्रतिबद्ध है एवं ग्राम तथा मलिन बस्तियाँ हमारे देश का ही अंग है। अतः इन दोनों के विकास को राष्ट्रीय प्रकल्प घोषित किया गया है। इस प्रकल्प में दोनों ही विकल्प सम्मिलित है। किसी एक गाँव का सम्पूर्ण विकास करके उसे आदर्श गाँव बनाना अथवा किसी एक समस्या को हाथ में लेकर उसे हल करना। उदाहरण के लिये किसी गाँव के लिये यह संकल्प लिया जा सकता है कि वहाँ का एक भी बच्चा निरक्षर नहीं रहेगा अथवा वहाँ प्राथमिक चिकित्सा प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपलब्ध कराई जायेगी। मलिन बस्तियों में भी इसी प्रकार के कार्य किये जा सकते हैं।

यहाँ पर एक बिन्दु और स्पष्ट कर देना आवश्यक है। गाँवों के विकास के लिये भारत विकास परिषद् की ओर से इस समय दो योजनाएँ चलाई जा रही हैं एक है समग्र ग्राम विकास योजना जिसके अन्तर्गत पीने का स्वच्छ जल, स्वच्छता, पर्यावरण, शिक्षा तथा रोजगार परक प्रशिक्षण आदि के लिये धन अप्रवासी भारतीय डॉ. शिव जिन्दल एवं श्रीमती सरिता जिन्दल के जिन्दल फाउण्डेशन, कनाडा से प्राप्त होता है एवं दूसरा ग्राम बस्ती विकास योजना जिसके अन्तर्गत निम्न प्रकल्प चलाये जा रहे हैं - स्वच्छता : शौचलायों का निर्माण ओर गन्दे पानी की निकासी। स्वास्थ्य : औषधालयों का प्रबन्ध, नेत्र चिकित्सा, तथा अन्य प्रकार के शिविर। शिक्षा : साक्षरता अभियान, प्राथमिक शिक्षा के लिये बच्चों को स्कूल भेजने हेतु प्रेरणा, प्रौढ़ साक्षर कक्षायें एवं रोजगार परक प्रशिक्षण। विविध : वृक्षारोपण एवं वनों की रक्षा, समरसता प्रयास एवं विभिन्न त्यौहारों का आयोजन। इसके लिये धन का प्रबन्ध शाखाओं को स्वयं करना पड़ता है।

इसी विषय के सन्दर्भ में देश के 68वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने राष्ट्र-नीति पर अपने विचार रखते हुए देश में स्वच्छता, पर्यावरण एवं स्कूलों और ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों के निर्माण पर समुचित ध्यान देने पर बल दिया। परिषद् ने भी ‘स्वच्छ भारत और सुन्दर भारत’ की परिकल्पना के लिये पर्यावरण सरंक्षण के विभिन्न कार्यों को हाथ में लिया है और ग्राम तथा बस्ती विकास के प्रकल्प द्वारा उन क्षेत्रों में सैनीटेशन पर ध्यान दिया है। परिषद् के ‘पर्यावरण’ प्रकल्प का दर्शन ‘पर्यावरण संरक्षणः ज्यादा हरियाली-ज्यादा खुशहाली’ है, जिसके अन्तर्गत परिषद् की शाखाओं के माध्यम से वृक्षारोपण, तुलसी पौधा वितरण, पर्यावरण रैली एवं संगोष्ठी इत्यादि का व्यापक स्तर पर आयोजन किया जाता है, जबकि ग्राम एवं बस्ती विकास योजना के अन्तर्गत निरक्षरता उन्मूलन, प्राथमिक स्वास्थ्य एवं प्राथमिक सुविधाओं को विकसित करने में सहयोग दिया जाता है। प्रधनमंत्री जी की राष्ट्र-नीति के सन्दर्भ में कुछ समायोजन करते हुए ग्रामीण क्षेत्रों एवं स्कूलों में शौचालयों की समुचित व्यवस्था में सहयोग का उत्तरदायित्व लिया जा सकता है। इसके लिये डॉ. शिव जिन्दल जैसे दानदाताओं एवं कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अन्तर्गत कम्पनी क्षेत्र से वित्तीय सहयोग सरलता से उपलब्ध हो सकता है।

कुल मिलाकर ‘‘स्वच्छ, समर्थ, समृद्ध और संस्कारित भारत’’ की परिषद् की कार्यनीति प्रधानमंत्री जी की ‘स्वच्छ भारत, स्वावलम्बी भारत, स्वाभिमानी भारत और सशक्त भारत’ की राष्ट्र-नीति की पूर्ण संगतता में है। अतः परिषद् में प्रत्येक स्तर पर संगठन को और अधिक प्रभावी और सामन्जस्यपूर्ण बनाकर प्रत्येक प्रकल्प को अधिक से अधिक प्रभावी ढ़ंग से पूरा करने का संकल्प लिया जाये तो हम प्रधानमंत्री द्वारा उद्बोधित ‘राष्ट्र-नीति’ के दर्शन के अनुकूल अपना महत्वपूर्ण सहयोग देने तथा उत्तरदायित्वपूर्ण सहभागी बनने में समर्थ होंगे तथा परिषद् को देश का शीर्षस्थ ‘सेवा-संस्कार’ उन्मुख समाजसेवी संगठन बनने की आकांशा को पूरा करके अपने नाम के अनुकूल भारत के सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण घटक सिद्ध होंगे।

-प्रभारी प्रकाशन विभाग


December, 2014
सम्पादकीय
भारत अपनी संस्कृति और सभ्यता के लिये पूरे विश्व में विख्यात है। भिन्न धर्मों, जातियों और संस्कृतियों का इतना विशाल समागम अद्वितीय है। अनेकता में एकता की ऐसी अनूठी मिसाल दुर्लभ है। भारतीय संस्कृति की एक और विशेषता इसे अन्य संस्कृतियों से श्रेष्ठ बनाती है और वह यह है कि भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक होने के साथ-साथ आनन्दमयी भी है। त्यौहारों पर पूजा पाठ, हवन इत्यादि के साथ विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाने के अतिरिक्त हर्ष व उल्लास छाया रहता है तथा ईश्वर की उपासना में भजन कीर्तन आदि भी मधुर संगीत के साथ गाये जाते हैं।

परिषद् भारत के विकास में सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक, राष्ट्रीय एवं आध्यात्मिक सभी प्रकार के विकास में अपने मूल मंत्रों : सम्पर्क, सहयोग, संस्कार, सेवा और समर्पण के माध्यम से समाज के उत्थान में प्रयत्नशील है। परिषद् के पाँचों सूत्र एक दूसरे के पूरक हैं। इन्हीं के अन्तर्गत सम्पर्क को चरितार्थ करने के लिये राष्ट्रीय परिषद् अधिवेशन की एक सभा पवित्र नगरी हरिद्वार (उत्तराखण्ड) में 20-21 दिसम्बर, 2014 को आयोजित की जा रही है। यह गंगा की पावन स्थली है। चारों धाम यात्रा का प्रवेश द्वार है और ऋषियों की तपो स्थली है। परिणाम स्वरूप देश के विभिन्न प्रान्तों से आये सदस्यों के मध्य सहयोग पूर्ण सम्पर्क, कार्यों सिद्धान्तों व लक्ष्यों का आदान प्रदान भी होता है। ऐसे कार्यक्रम किसी पर्व का दर्शन कराते हैं और सदस्यों में सेवा कार्य करने के लिए नई ऊर्जा एवं प्रेरणा प्रदान करते है। परिषद् का मूल लक्ष्य भी यही है कि इसके सदस्य अपनी कर्म साधना से भारत के बहुआयामी विकास को अंजाम दें। परन्तु यह कर्म तब तक सम्भव नहीं हो सकता जब तक हम सभी सामूहिक रूप से देश के विकास को अपना विकास नही मानते। परिषद् अपने सम्पर्क के माध्यम से सभी के मध्य समन्वय बनाकर संवाद की गति को तीव्र करके पहले स्व संवाद की प्रक्रिया को धारदार बनाता है। इस विषय में समाज वैज्ञानिकों की सोच भी है कि जब तक लोगों के बीच स्वस्थ और पारस्परिक सम्पर्क के माध्यम से संवाद विकसित नहीं होता, तब तक सम्प्रेक्षण की प्रक्रिया भी कमजोर पड़ती है। तत्पश्चात अनेक प्रकार की भ्रातियाँ उत्पन्न हो जाती है। यहीं हमें समर्पित भाव से निष्काम कर्म का स्मरण आता है। भारतीय संस्कृति भी परिणाम अथवा प्रतिफल की इच्छा को नकार कर कर्म की प्रधानता को बल देती है। इस संदर्भ में गीता भी संदेश देती है कि -

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
स्वधर्म निधनं श्रेयः परधर्मों भयावहः

अर्थात् अपने नियत कर्मो को दोषपूर्ण ढंग से सम्पन्न करना भी अन्य कर्मों की भाँति करने से श्रेयस्कार है। स्वीप कर्मों को करते हुए मरना पराये कर्मों में प्रवृत होने की अपेक्षा श्रेष्ठकर है। वह इसलिए क्योंकि किसी के मार्ग का अनुशरण भयावह होता है।

सही अर्थों में स्वहित को त्याग कर समाज व देश के प्रति समर्पण ही हमें हमारे कर्तव्य का बोध् भी कराता है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि समाज व देश ने यदि आपको एक सम्मान दिया है तो देश के प्रति आपका यह एक प्रकार का ऋण है। इस ऋण को चुकाने का आपका दायित्व है। आप इससे तभी उऋण हो सकते हैं जब आप देश व समाजोहित उद्देश्य के प्रतिसमर्पित भाव से सेवा के लिए सदैव उद्यत रहे। ज़रा गौर करें तो यह बात ध्यान में आती है कि गाँधी, पटेल व नेहरु के बाद नरेन्द्र भाई मोदी राष्ट्र के प्रति समर्पण के सबसे बड़े प्रतीक बनकर उभरे हैं। छः दशक के बाद यह प्रधानमंत्री ऐसा है जो देश को अपनी माँ के रूप में स्वीकार करता है और राष्ट्र विकास के प्रति उनका समर्पण हमें हमेशा प्रेरणा देता है। उनकी स्वच्छता की अवधारणा, गंगा निर्मल अभियान व सांसद ग्राम विकास के प्रकल्प हम लोगों के लिये एक रोल मॉडल बन रहे हैं।

कुल मिलाकर परिषद् का सम्पर्क, सहयोग, संस्कार, सेवा व समर्पण का यह संगम वर्तमान भारत में एक बार फिर हमें संकेत दे रहा है कि उतिष्ठत जागृत अर्थात् उठो और जागो और तब तक न रूकों जब तक हमारी सेवा और समर्पण की भावना से यह राष्ट्र परम वैभव के शिखर पर नहीं पहुँच जाता।

मुझे आशा है कि देश की पवित्र नगरी हरिद्वार में आयोजित यह सम्मेलन हमारे मध्य संवाद के नये संस्कार प्रवाहित करके सभी के सहयोग से नूतन सम्पर्क विकसित करने में सफल होगा।


 

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