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                                                    Niti Editorials : 2013

January हमारे आदर्श पुरुष-स्वामी विवेकानन्द
February .यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते......
March Worship the Character
Aprilar Invocation Prayer
May कहत कबीर सुनो भाई साधो
June A Leader in Dr.Suraj Prakash

July

आओ! मनाएँ जन्म दिवस
August दायित्व बोध
Septemberuly Editorial
October हे राम
November तमसो मा ज्योतिर्गमय
December कर्मण्येवाधिकारस्ते..............

 

January, 2013

हमारे आदर्श पुरुष-स्वामी विवेकानन्द

स्वामी जी का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था, अतः 12 जनवरी 2012 से 12 जनवरी 2013 तक की एक वर्ष की अवधि को परिषद् उनकी 150 वीं जयन्ती वर्ष के रूप में मना रहा है। यह संयोग की बात है कि भारत विकास परिषद् की स्थापना स्वामी जी के जन्म शताब्दी वर्ष 1963 में हुई थी। परिषद् के संस्थापकों ने प्रारम्भ से ही स्वामी जी को अपना आदर्श माना।

स्वामी जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे एक प्रखर वक्ता, लेखक, कवि, नेतृत्व के गुणों से परिपूर्ण संगठनकर्ता, कर्ममय संन्यासी, योगी, दार्शनिक, आध्यात्मिक पुरुष एवं सेवा को समर्पित व्यक्तित्व के स्वामी थे। यह उचित होगा कि स्वामी जी के 150 वें जयन्ती वर्ष के समापन के इस अवसर पर उन आदर्शों तथा परिषद् द्वारा उन्हें व्यावहारिक रूप देने के लिए किये जा रहे प्रयासों का पुनः स्मरण कर लिया जाये।

पुण्य भूमि भारत : स्वामी जी भारत को पुण्य भूमि मानते थे। उनका विचार था कि भारत ने अध्यात्म, शान्ति एवं उदारता के क्षेत्रों में उन्नति के शिखरों को छुआ है।

परिषद् ने नवयुवकों में अपने देश के प्रति प्रेम एवं श्रद्धा जागृत करने के लिये अनेक प्रकल्प चलाये हैं। सर्वप्रथम 1967 में ‘राष्ट्रीय समूहगान प्रतियोगिता’ का आयोजन किया गया जिसमें छठी कक्षा से 12वीं कक्षा तक के छात्र-छात्राएँ भाग लेते हैं। ‘भारत को जानो’ प्रतियोगिता भी इसी उद्देश्य से सन् 2001 से राष्ट्रीय स्तर पर आरम्भ की गई। इसमें भारत के इतिहास, धर्म, संस्कृति, साहित्य इत्यादि से संबंधित लिखित तथा मौखिक प्रश्न पूछे जाते हैं।

मानव सेवा : स्वामी जी के जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य मानव सेवा था। उनका कथन था कि जब तक इस देश के लाखों-करोड़ों व्यक्ति निरक्षर हैं, अभाव, भूख एवं रोगों से पीड़ित हैं एवं तिरस्कृत जीवन व्यतीत कर रहे हैं तब तक इस देश के समृद्ध एवं शिक्षित लोगों को चैन से नहीं बैठना चाहिये।

परिषद् के पांच मूल मंत्रों में से ‘सेवा’ एक महत्वपूर्ण मंत्र है। सेवा के अन्तर्गत विकलांग सहायता योजना, ग्राम विकास योजना, स्वास्थ्य योजना, सामूहिक सरल विवाह, वनवासी सहायता योजना आदि प्रकल्प चल रहे हैं।

संगठन की आवश्यकता : प्रारम्भ से ही स्वामी जी की यह स्पष्ट धारणा बन चुकी थी कि शिक्षा के प्रसार, निर्धनों की सहायता एवं महिलाओं के उत्थान का कार्य एक कुशल एवं सक्षम संगठन के बिना नहीं हो सकेगा।

परिषद् के संस्थापकों ने प्रारम्भ से ही एक ऐसे संगठन की स्थापना का प्रयास किया। यही कारण है कि 50 वर्षों में एक शाखा से 1200 शाखाओं का विस्तार हुआ एवं आरम्भिक 25 सदस्यों से बढ़कर 50000 परिवार परिषद् से जुड़ गये हैं।

प्रबुद्ध एवं समृद्ध वर्ग का जनसाधारण के प्रति उपेक्षा भाव : कश्मीर से कन्याकुमारी तक के भारत भ्रमण में स्वामी जी ने देखा कि भारत की अधिकांश जनता अशिक्षित, अज्ञानता से परिपूर्ण एवं छुआ-छूत तथा जात-पात के बन्धनों में जकड़ी हुई है। उनकी वास्तविक आवश्यकता भोजन, शिक्षा एवं चिकित्सा सहायता की है। अध्यात्म एवं धर्म से पहले उनकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हमारा सर्वोच्च कर्तव्य होना चाहिये। सबसे बड़े दुःख की बात यह थी कि समाज का प्रबुद्ध, समृद्ध एवं शिक्षित वर्ग भारत की इस पीड़ित जनता के प्रति उपेक्षा का भाव रखता था, उनके दुःखों के प्रति लापरवाह था तथा आत्मकेन्द्रित था।

परिषद् के संस्थापकों ने भी 20वीं शताब्दी में समाज के समृद्ध एवं प्रबुद्ध वर्ग को इसी व्याधि से पीड़ित पाया। वे लोग भी आत्मकेन्द्रित थे एवं अपने चारों ओर निवास कर रहे भारत के दीन दुःखी वर्ग से उन्हें कोई सरोकार नहीं था। अतः प्रारम्भ से ही परिषद् के संस्थापकों का यह मिशन था कि समाज के इस प्रबुद्ध वर्ग में चेतना जागृत की जाये, उन्हें संगठित किया जाये तथा भारत की पीड़ित जनता के उत्थान के कार्यक्रम में उन्हें प्रवृत्त किया जाये। साथ ही यह भी ध्यान रखा गया कि यह कार्य किसी श्रेष्ठता अथवा दान की भावना से न करके, इसे भारतीय संस्कृति के आदर्शों के अनुसार पावन कर्तव्य की भावना से किया जाये।

प्रत्येक व्यक्ति में देवत्व का निवास है : स्वामी जी ने एक नया विचार Potential Divinity of Soul विश्व को दिया था। उनका विचार था कि विज्ञान ने मानव को बहुत कुछ दिया है किन्तु साथ ही ऐसा वातावरण भी उत्पन्न किया है जिससे मनुष्य पतन की ओर जा रहा है। बढ़ते अपराध, टूटते हुए घर एवं अनैतिकता इसी ओर संकेत करते हैं। पवित्र वातावरण मिलने से मानव फिर से देवत्व प्राप्त कर सकता है। परिषद् का ‘संस्कार’ सूत्र  इसी विचार पर आधारित है। संस्कार का अर्थ है दुर्गुणों का उच्छेदन एवं सद्गुणों का अधिष्ठापन। संस्कार पूर्ण सद् वातावरण मिलने से मनुष्य देवत्व की ओर अग्रसर हो जाता है। संस्कार उसके प्रच्छन्न देवत्व को प्रकाश में लाते हैं।

महिला सशक्तिकरण के लिये सन्देश : स्वामी जी ने भारतीय महिलाओं के लिये मातृत्व को सर्वोच्च आदर्श माना था। माँ के रूप में नारी सर्वोत्कृष्ट, निःस्वार्थ, कष्टों को सहन करने वाली एवं क्षमाशील बन जाती है। वे माता सीता को भारतीय नारी का मूर्त रूप मानते थे। उनके अनुसार महिलाओं को उच्चतम् शिक्षा दी जानी चाहिए, उनसे आदर पूर्ण तथा समानता का व्यवहार होना चाहिये एवं उन्हें प्रत्येक प्रकार की जिम्मेदारी सम्भालने के योग्य बनाया जाना चाहिए।

भारत विकास परिषद् एक मात्र ऐसी संस्था है जहाँ पति-पत्नी दोनों को ही सदस्य माना जाता है एवं दोनों को ही मताधिकार भी है। वे प्रत्येक पद के लिये सक्षम हैं एवं वर्तमान समय में शाखा, प्रान्त, क्षेत्र एवं केन्द्र के स्तरों पर महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर रही हैं।

युवा शक्ति को प्रोत्साहन : स्वामी जी युवकों को सदैव प्रोत्साहित करते थे। मद्रास एवं कलकत्ता में दिये गये उनके भाषण युवाओं के प्रेरणा स्रोत हैं। भारत विकास परिषद् ने भी सदैव नवयुवकों को ‘संस्कार’ एवं ‘सेवा’ के कार्यक्रमों से जोड़ने का प्रयत्न किया है। परिषद् उनके लिये संस्कार शिविरों का आयोजन करती है। राष्ट्रीय समूहगान प्रतियोगिता, भारत को जानो, गुरू वन्दन-छात्र अभिनन्दन इत्यादि प्रकल्पों के माध्यम से लाखों किशोर एवं युवक परिषद् के सम्पर्क में आते हैं। उच्च शिक्षा प्रदान करने वाले विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों के छात्रों के लिये सेमिनारों का आयोजन प्रारम्भ किया गया है और 26-27 जनवरी 2013 को राष्ट्र स्तरीय प्रतियोगिता का आयोजन कन्याकुमारी में होना निश्चित् हुआ है।                                             - सुरेन्द्र कुमार वधवा, राष्ट्रीय महामंत्री


February, 2013

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते......

देव भाषा संस्कृत की बड़ी प्रचलित और सारग£भत उक्ति है ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ जहाँ नारी की पूजा अर्थात् उसका आदर, सम्मान होता है वहाँ देवता निवास करते हैं अर्थात् वहाँ परमपिता परमात्मा की ओर से अपार कृपा बनी रहती है।

कविवर जय शंकर प्रसाद ने अपने महाकाव्य ‘कामायनी’ के आरम्भ में प्रलय के बाद की स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा हैः

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह।
एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह।।

और वह एक पुरुष था ‘मानव’ और कहीं अन्य स्थान पर बच गई थी एक महिला नाम था ‘श्रद्धा’। इन दोनों के सहयोग से नवीन सृष्टि का निर्माण हुआ था। दोनों नाम कितने सारगर्भित हैं; पुरुष अर्थात् ‘मानव’ और नारी अर्थात् ‘श्रद्धा’ की प्रतिमूर्ति। आरम्भ हुआ नारी (श्रद्धा) के मातृत्व से। नारी माँ है, बेटी है, बहिन है, बहु है और सास भी। मूलतः वे सभी माँ हैं और माँ का दर्जा तो भगवान से कम नहीं। परन्तु फिर भी ‘श्रद्धा’ रूपिणी माँ के साथ आधुनिक समाज में ‘मानव’ दानव बन कर क्यों व्यवहार करता है, यह चिन्ता का विषय बन गया है।

स्वामी विवेकानन्द ने कहा थाः भारत में स्त्री जीवन का आरम्भ और अन्त मातृत्व में ही होता है। विश्व में माँ नाम से पवित्र और कोई नाम नहीं हो सकता। मातृत्व में ही स्वार्थ-शून्यता, सहिष्णुता और क्षमाशीलता का भाव निहित है। मातृत्व ईश्वर का दिव्य रूप है।

एक अन्य स्थान पर कहा गया है ‘मातृवत् परदारेषु पर द्रव्येषु लोष्ठवत्’-दूसरे की स्त्री (अर्थात् वह उपरोक्त किसी भी रूप में क्यों न हो) को माँ के समान समझो और दूसरों की धन-दौलत को मिट्टी के समान। ऐसा जो करता है (स पण्डितः) वह बुद्धिमान कहलाता है। परन्तु वाह रे मानव! चकाचौंध की इस दुनिया में तू ने सब कुछ भुला दिया, सभी मर्यादायें लाँघ लीं। ऐसा करते हुए तुम्हारा क्या हशर होगा, स्वयं अनुमान लगा सकते हो। ध्यान रखो ‘नारी’ शब्द में चार मात्राएँ हैं और ‘नर’ में दो। इस दृष्टि से भी नारी का दर्जा ऊँचा है। भारत में स्त्री कहते ही मातृत्व का बोध होने लगता है जबकि पश्चिम में स्त्री केवल पत्नी है।

शिवाजी जयन्ती (19.2) को ही लीजिए। माता जीजा बाई को कौन सलाम नहीं करेगा। उनके द्वारा दिए गए संस्कारों से ही शिवा वीर शिवा बने। चन्द्रशेखर आजाद (शहादत 27.2) की शहादत पर माँ ने गर्व का अनुभव किया था क्योंकि उसका पुत्र राष्ट्र की प्रभु-सत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए कुर्बान हुआ था।

वसन्त पंचमी (15.2) के दिन माँ सरस्वती (विद्या की देवी) की पूजा होती है। जब किसी वक्ता अथवा गायक कलाकार को यह कह कर प्रोत्साहित किया जाता है कि तुम्हारी वाणी अथवा तुम्हारे कण्ठ में सरस्वती का वास है, तो वह बल्लियों उछलने लगता है।

भारत विकास परिषद् ने महिला सशक्तिकरण को एक प्रकल्प (Project) के रूप में अपनाकर इन के प्रति सत्कार का परिचय दिया है।

स्वामी विवेकानन्द ने भारत की दो महत्वपूर्ण बुराईयाँ बताई थीं : एक-महिलाओं से तिरस्कार पूर्ण व्यवहार और दोः गरीबों को जातीय बन्धनों में पीसना। परन्तु उनको पूरा विश्वास था कि भारतीय नारी अपनी समस्याओं को स्वयं सुलझा लेगी। उन्होंने ने महिलाओं को निर्भीक होकर कार्य करने का सन्देश दिया। वस्तुतः समय की मांग है कि प्रत्येक स्त्री सशक्त होने के लिए कराटे अथवा जूडो का प्रशिक्षण प्राप्त करे और बच्चों को घर से ही संस्कारित होने का पाठ पढ़ाया जाए। भारतीय जन मानस की मनोदशा (मानसिकता) को बदलने की नितान्त आवश्यकता है। अपने संस्कार प्रकल्पों के माध्यम से भारत विकास परषिद् इस दायित्व को निभाने में सदा तत्पर रहती है, यह एक सकारात्मक संकेत है।  - धर्मवीर सेठी


March, 2013

Worship the Character
There is an important saying: ‘Chitra Nahin Charitra Ki Pooja Karo’  (
चित्र नहीं चरित्र की पूजा करो). Character building is the prime object of all institutions: family, educational, spiritual and the like.

BVP chose its icon in Swami Vivekananda who by his sheer high moral character addressed the Parliament of Religions in Chicago with the opening words ‘Brothers and Sisters of America’ and got thunderous applause. His entire journey was summed up by himself ‘Arise, Awake and stop not till the goal is reached’. His teachings, preachings and books speak of high moral character.

We may install as many statues as we can at different places and garland them but it will only be worship of Chitra not Charitra.

An incidence from the Life of Swami Vivekananda confirms this assertion:

During his all India tour in 1892, Swamiji had established a centre of Ramakrishna Mission at Mayawati in Himalayas. After coming back from the second tour of West, Swamiji visited this centre. He found that the in-charge of the Centre had installed a statue of Swami Ramakrishna Paramhans and started its worship. Swamiji expressed his displeasure as softly as expected from him and ordered the removal of the same. This shows what he thought about statues of great men. (अतः चरित्र की पूजा आवश्यक है)

Bharat Vikas Parishad has announced that it will continue celebrations of 150th anniversary of Swamiji till 12th January 2014.

Another spiritual monk whose birthday falls in this month (07.03) is Maharshi Swami Dayanand Saraswati, the founder of Arya Samaj way back in 1875 at Bombay. He got an enlightenment on the Shivratri (10.3) Night and left the worldly attractions in search of the Real God. He preached the dictum Krinvanto Vishvamaryam (कृण्वन्तो विश्वमार्यम) Let the entire world become noble. Nothing would deter him from the path of righteousness. ‘Satyarth Prakash’ and ‘Sanskar Vidhi’ are a couple of books that guide us to keep our head high by character building.

World Women Day (विश्व महिला दिवस ) is being celebrated on 08.03.2013. Both the monks spoke very high about the women folk and also advocated for their right place in the society which is presently gender based. Women have every right to educate themselves and then alone they can bring up families and teach ethics to their offspring's. BVP also is doing its bit in this field.

Let us turn around towards the martyrs who laid their precious lives for the motherland. Imagine what type of noble character they possessed when they never bothered about the earthly benefits as compared to service  of motherland - the real mother  (वन्दे मातरम् ). This is the real example, set by Sukhdev, Rajguru, Bhagat Singh (23.3) for the youth of the country. Let us discard selfishness for the sake of our Bharat.

People of high moral aptitude and character cay only face the sufferings with determination. Both the monks, Swami Vivekananda and Maharishi Dayanand never left the path of righteousness even though they had to face many odds. It was because of their high moral character. Both of them got many allurements but did not yield.

Our Sanskar Projects are a step towards this direction.

Let us follow into the footsteps of our great Rishis.
Let me end by quoting a famous quote:
If money is lost nothing is lost.
If health is lost something is lost.
But if Character is lost everything is lost                            
- D.V.Sethi


April, 2013

Invocation Prayer
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।
यद्भद्रन्तन्न आसुव।। (यजुर्वेद 30-3)

O Deva Savitar (All Creating Divinity) please keep far from us all evils and let us attain whatever be beneficial to us - Yajurveda (XXX-3)
 x                      x                      x                      x                      x  
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठान्ते नम उक्तिं विधेम।।
                                                                        - यजुर्वेद 40/16

O Self-Refulgent Divinity! Please lead us on the path of virtue for the requirement of physical and spiritual wealth. Thou knowest all the procedure, of works and wisdom underlying therein. Please remove from us the act of sin which involves transgression of Nature and its Laws. We may remain ever engaged in uttering Thy praise in various ways.     -Yajurveda (40-16)

Come April, the entire Bharat VARSH hails the advent of Indian Calendar known as Vikrami Samvat  2070 starting from 11th April 2013. It is a moment to rejoice because Our New Year is celebrated in different states as Gudi Parva, Ugadi, Chetichand etc. Being Bhartiya  first, we should feel proud of our Calendar which is 57 years old as compared to ईस्वी सन् i.e. 2013. But it is unfortunate that we merrily dance on the eve of New Year i.e. 31st Dec. every year.

Let us organize functions to celebrate Our New Year and tell our progeny the relevance and importance of this because this New Year is related with the Six Seasons-our rich heritage-we have in our country.

I, therefore, thought it fit to hail this Samvat  with Invocation Prayer that is given above:

Let us, therefore, pray for the well being of every one on World Health Day (7.4) and spread the message of peace, prosperity and non - violence as preached by Dr. Ambedkar (14.4),  Lord Ram (19.4) and Lord Mahavir (24.4)                                   

May our New Year bring fortunes for the entire BVP fraternity.                                                                              - D.V. Sethi


May, 2013

कहत कबीर सुनो भाई साधो

भारत-भू के फकीर, संन्यासी, साधु, महात्मा, ऋषि, मुनि जीवन भर कन्दराओं में रहते, घोर तपस्या करते, बीहड़ जंगलों में घूमते उस परम पिता परमात्मा की महिमा को जानने और उसे व्यक्त करने का अपने-अपने ढ़ंग से प्रयास करते रहें हैं। कुछ ऐसे भी थे जो साधारण वर्ग से और कुछ अन्य उच्च वर्ग से सम्बन्ध रखते थे। परन्तु एक बात उन सब में समान थी और वह कि जो बात भी उन्होंने काव्य या गद्य के माध्यम से कही, मानो जीवनानुभव का निचोड़ थी।

एक साधारण सा जुलाहा, लोई का पति महात्मा कबीर (जयन्ती 24 मई) अपनी साखियों में कुछ ऐसे उपदेश दे जाएगा जो शाश्वत रहेंगे, किसे पता था कि - मसि कागद छुओ नहीं, कलम गहि नहीं हाथ। वाला साधारण जाति का एक कवि:

झीनी झीनी बीनी चदरिया
 x x x x x x x x
दास कबीर जतन से ओढ़ी
ज्यूँ की त्यूँ धर दीनी चदिरया

का रहस्यवादी गीत गाता फिरता है तो सारा सम्भ्रान्त समाज भी मुँह बाय खड़ा रह जाता है। इतना गूढ़ ज्ञान, इतना गम्भीर जीवन दर्शन ऐसे समाज को पिछड़े वर्ग के प्रति आदर व्यक्त करने को बाध्य कर देता है।

आज आवश्यकता है, ऐसे पिछड़े समाज की इकाईयों को उनका हक दिलवाने के प्रयत्न का और उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने का। चलिए उनकी एक ही बात मान लीजिएः

मीठी वाणी बोलिए मन का आपा खोए,
औरन को शीतल करे आपु भी शीतल होए।

क्योंकि मुँह से निकली वाणी और धनुष से निकला तीर दुबारा वापिस नहीं आता।

एक ओर यह अति साधारण सन्त कवि और दूसरी ओर गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर (जयन्ती 9 मई) एक उच्च कोटि का कवि-लेखक जिसने बंग भाषा एवं साहित्य को अपनी रचनाओं से चमत्कृत ही नहीं समृद्ध भी कर दिया। ‘गुरुदेव’ उपनाम से विभूषित, शान्ति निकेतन (विश्व भारती) के संस्थापक और विश्व विख्यात ‘गीतांजलि’ काव्य के रचयिता गुरुदेव को हमारा सश्रद्ध नमन्। ‘व्यवहार एक दर्पण है जिसमें व्यक्ति का व्यक्तित्व दिखाई देता है’ व्यक्ति की परिभाषा के सम्बन्ध मे उनका कितना सटीक कथन है। ‘जन गण मन अधिनायक जय हो-भारत भाग्य विधाता’ गीत (जिसे बाद में भारत सरकार ने राष्ट्र गीत के रूप में स्वीकार किया) के रचनाकार गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को भारत का नागरिक कभी भी विस्मृत नहीं कर सकता।

बुद्ध पूर्णिमा (25,5) के अवसर पर महात्मा बुद्ध की शान्ति प्रक्रिया के वाचकः

‘बुद्धं शरणं गच्छामि’
धम्मं शरणं गच्छामि
संघं शरणं गच्छामि

का स्मरण हो आना भी स्वाभाविक है। एक ओर शान्ति का प्रचार और दूसरी ओर युद्ध की दुन्दुभि। भारत को अंग्रेजी साम्राज्यवाद की बेड़ियों से मुक्त कराने हेतु 10 मई 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का आरम्भ मेरठ से हुआ। परन्तु इस स्वतंत्रता समर की स्वर्ण जयन्ती लन्दन के इंडिया हाउस में पूरी भव्यता से मनाई गई। नायक थे वीर दामोदर सावरकर (जयन्ती 28,5) वीरता की साक्षात् प्रतिमा। मानों उनकी रंगों में भारतीयता की ज्वाला कूट कूट कर भरी थी। अपनी भाभी को लंदन से लिखी एक पत्र-कविता (जब उनके पति अंडमान की जेल मे बन्दी थे) के कुछ अंश यहाँ उद्धृत करने की लोभ संवरण नहीं कर सकता।

काटेंगे, हम माँ के बंधन काटेंगे,
यह जीवन-बाती इसी हेतु निबटेगी।
बांटेगे, हम सब माँ के दुख बांटेंगे,
यह पूत प्रतिज्ञा कभी नहीं टूटेगी।

अपनी प्रतिभा से माँ की प्रतिमा चमके
अपनी तरुणाई माँ की शक्ति बनेगी
वह ही शिक्षा जो माँ के सपने पूरे
वह ही दीक्षा जो दुश्मन से जूझेगी।

मेरे वे सब सखा, स्नेही, साथी
समिधा समान इस ध्येय के लिए आहुत
बाजीप्रभु बन बलि-पथ पर बढ़ आए
बलिवेदी तरुण रक्त से सिंचित

ये ध्येय-सिद्धि-सोपान, सफलता-साक्षी
जागा फिर भारत, भारतवासी जागा
हर्षित, हृत्तन्त्री-नाद-विभोर आज मै
आसेतु हिमाचल निरातंक, भय भागा

हे मातृभूमि! यह मन अर्पित है तुझको
वाणी-वैभव सब विद्या तुझे समर्पित
है विषय वांग्मय का अनन्य तू जननी।
यह मेरा नवरस काव्य तुझे ही अर्पित                          -वीर सावरकर

ऐसे प्रबुद्ध एवं देश भक्त वीरों को भी हम सदा स्मरण करें यह हम सब देशवासियों का परम कर्त्तव्य बनता है। जैसे वे अपनी मातृभूमि के लिए समर्पित रहे वैसे ही हम भी हो, यह अपेक्षा रहेगीः

मन समर्पित, तन समर्पित और यह जीवन समर्पित चाहता हूँ मातृ-भू, तुझको अभी कुछ और भी दूं।                    - धर्मवीर


June, 2013

A Leader in Dr.Suraj Prakash
(His B’day falls on 27th June)

Dr. A.P.J. Abdul Kalam, Former President of India defined a leader as: "Quality leaders are like magnets that will attract the best persons to build a team for the organisation and give inspiring leadership even during failures of missions as they are not afraid of risks. The creators of vision ignite the young mind in particular". It is often said that a leader is born not made. Perhaps the truth lies somewhere between the two; qualities a person is born with and qualities he acquires by learning and hard work. Development of leadership is a continuous process and is not acquired in a day.

Another question arises: what are the qualities that make a successful leader? Well known German Philosopher, Hegel once said "The Great Man of an age is the person who gives words to its aspirations, can tell what its aspirations are and can make things happen. His actions are the views and essence of that age and he moulds it". Character, Self-discipline, Courage, the Power of Oratory, commitment and Charisma are the qualities that a leader should possess. True commitment (समर्पण) inspires and attracts people. It shows them that you have conviction. They will believe in you if you believe in your cause. If you want to make a difference in other people’s live as a leader please stand wholly committed to the cause. And the real measure of commitment is Action. Every leader faces plenty of obstacles and opposition and it is commitment only which overcomes such hurdles.

Let me quote a Sanskrit Shloka which enumerates three types of persons:

प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः
प्रारभ्य विघ्नविहिता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः
प्रारब्धमुत्तमजनाः न परित्यजन्ति।

The  first category is of those people who do not know if they can reach their goal and so they are afraid to commit /start. The second are those who start towards a goal but quit when the going gets tough. And finally are those people who set goals, commit to them, and pay the price to reach them.

This is the last category of the enlightened ones who once take up a challenge only to achieve the goal. Charisma of a leader is also equally important. Charisma is not mystical but is the ability to draw people to you. And like all other character traits, it can be developed. Zest is their energy.

The most important thing that attracts people to a leader is to expect the best from them. The appreciation and encouragement help people to reach their potential, and they love their leader for it. The more good a leader sees in his followers the more successful he will be. It is a gift that will make others to be attracted towards him like a magnet.

Hence, a leader should know the pulse of his followers because, I Quote:

 "They like to feel special, so sincerely compliment them.
 They want a better tomorrow, so show them hope.
 They desire direction, so navigate for them.  
They get low emotionally, so encourage them.  
They want success, so help them win".

The first impression is very important. A successful leader will learn by heart the name, interests and other particulars of the person. He meets the concerns of others and is really interested in them. Such a leader is sure to become a charismatic leader.

But what type of leader Dr. Suraj Prakash was? Whether he was a committed leader or a charismatic leader? He saw a dream and made ceaseless efforts for twenty eight long years to make it a reality. He worked hard, sometimes for three to four years, to open a new branch of BVP at a new place or to bring a new competent person to the organization. A Committed leader he was but charismatic as well.

May God give us strength to follow in his footsteps.


July, 2013

आओ! मनाएँ जन्म दिवस
जी हाँ! समय आ गया है कि हम सब मिलकर जन्म दिवस मनाएँ। कहीं आप यह तो नहीं सोच रहे हैं कि मैं अपने जन्म दिन की बात कर रहा हूँ? शाखाएँ अपने सदस्यों के जन्म दिन पर उन्हें शुभकामनाएँ अवश्य देती हैं और उपहार भी। परन्तु इन पंक्तियों के माध्यम से मैं उस पावन अवसर की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ जिसके लिए भारत भर से परिषद् के सदस्यों की प्रतीक्षा बनी हुई है - भारत विकास परिषद् का ‘स्वर्णिम जन्म दिवस’।

किसी व्यक्ति का जन्म दिन तो मात्र व्यक्ति तक ही सीमित रहता है परन्तु संस्था का स्थापना दिवस ही उसका जन्म दिवस होता है। वैसे तो प्रति वर्ष भारत विकास परिषद् का स्थापना दिवस बड़े उत्साह और पूरी निष्ठा से मनाया जाता है परन्तु ‘स्वर्ण जयन्ती’ (50वाँ जन्म-स्थापना-दिन) तो ‘संगच्छध्वं, सेवदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्’ की भावना से मनाया जा रहा है।

मानव जीवन में जैसे रजत जयन्ती (Silver Jubilee), स्वर्ण जयन्ती (Golden Jubilee), हीरक जयन्ती (Diamond jubilee), प्लैटिनम जयन्ती (Platinum Jubilee) और शताब्दी (Centenary) का विशेष महत्व होता है; क्रिकेट के खेल में जैसे अर्द्ध शतक-50 रन (Half Century) अथवा शतक (100 रन - Century) पूरी होने पर जैसे खचाखच भरे स्टेडियम में बैठे दर्शक करतल ध्वनि से समस्त वातावरण को गुंजायमान कर देते हैं वैसे ही किसी संस्था की प्रगति गाथा में भी ऐसे महत्वपूर्ण परन्तु अनुकरणीय आयामों की अपनी गरिमा होती है।

हमारी शाखाएँ जब अपनी रजत जयन्ती के समाचार हमें भेजती हैं, तो उनकी लेखनी से लिखे वाक्यों से ही हम (सम्पादक मण्डल) अपने प्रकोष्ठ में बैठे उनके मन की अल्हादकारी स्थिति का भरसक अनुमान लगा सकते हैं। कितना उत्साह होता है उन सदस्यों में।

ऐसे ही भारत विकास परिषद् की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर जब उसकी प्रगति को - सदस्यों/शाखाओं/सेवा और संस्कार से जुड़े प्रकल्पों/राष्ट्रीय आपदाओं के समय पीड़ितों को पहुँचाई गई सहायता/शिक्षा के क्षेत्र में साक्षरता अभियान/खुर्जा में स्कूल की स्थापना, स्वास्थ्य की दिशा में Multi-Speciality अस्पतालों किंवा अपने पूर्ण रूपेण सक्षम Diagnostic केन्द्रों आदि की स्थापना का आकलन किया जाता है तो बांछें खिलने लगती हैं। उत्साहवर्द्धन के लिए जब परिषद् का नेतृत्व अपने सहयोगियों की पीठ थपथपाता है तो कर्मठ कार्यकत्र्ता अधिक निष्ठा से क्रियाशील बनते हैं। यही सेवा का परमोत्कर्ष है। हजरत ख्वाजा गरीब नवाज ने तो यहाँ तक कहा था : Whoever gained anything, gained by service. परिषद् के सेवा कार्यों की तो सानी नहीं। सेवा के क्षेत्र में लगभग 23 गाँवों का समग्र विकास और भारत के विभिन्न प्रदेशों में कृत्रिम अंग बनाने एवं मुफ़्त बाँटने के 16 केन्द्र अपना परिचय स्वयं देते हैं।

किसी व्यक्ति के जन्म दिवस पर तो मैं अपने भावों को इस प्रकार लिपिबद्ध करता हूँ:

जन्म दिवस मनता रहे, इसी तरह हर वर्ष।
ऋचा पाठ करते हुए सभी मनावें हर्ष।।

सभी मनावें हर्ष स्वजन और परिजन सम।
रहे तुम्हारा लक्ष्य सदा ही ‘इदन्न मम्’।।

कहे ‘वीर’ सद्भाव से सुनो सभी हे आर्य जन।
सब कार्यन् को छोड़ मनाओ दिवस जनम।।

‘इदन्नमम्’ की भावना सेवा का ही परिचायक है।

यदि ऐसे पावन अवसर पर प्रभु का आशीष प्राप्त करने के लिए यज्ञ का अनुष्ठान किया जाए, तो सोने पर सुहागे का भाव चरितार्थ होगा।

आज जब हम 1200 शाखाओं, एक लाख से अधिक सदस्यों और सेवा तथा संस्कार के बहुचर्चित प्रकल्पों के माध्यम से भारत विकास परिषद् की स्वर्ण जयन्ती, अर्द्धशती अथवा 50 वर्ष की इस दीर्घ परन्तु सकारात्मक यात्रा को पूरे उत्साह और मनोयोग से पावन-पर्व के रूप में मना रहे हैं, तो मैं भी अपनी मंगल-कामनाएँ इन शब्दों में प्रेषित करना चाहता हूँ:

स्वर्ण जयन्ती पर हुए, सभी यहाँ एकत्र।
खुशबू सी है फैल रही, जहाँ तहाँ सर्वत्र।।

जहाँ तहाँ सर्वत्र बना यह दृश्य मनोरम।
आशीष हैं सब दे रहे यहाँ जितने हैं फोरम (Forum) ।।

कहे ‘वीर’ सुविचार कर बने न यह किंवदन्ति।
अन्तस् के सद्भाव से मनाओ स्वर्ण जयन्ती।।

                                                                         डॉ॰ धर्मवीर


August, 2013

दायित्व बोध
सम्पादक का दायित्व निभाते समय उसे सभी ओर से जागरूक रहना पड़ता है-सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक सभी क्षेत्रों पर उसकी नजर रहती है।

उत्तराखण्ड की भयावह त्रासदी ने जहाँ जन-मानस को झकझोर कर रख दिया वहाँ दूसरी ओर से सभी को सोचने पर विवश भी कर दिया कि क्या यह आपदा किसी प्रकार रोकी जा सकती थी। भू-माफियाओं ने प्रकृति की मर्यादाओं का उल्लंघन कर सामान्य जनता के जीवन से जो खिलवाड़ की, क्या उसका दण्ड कभी उनको भोगना पड़ेगा? इसका उत्तर तो भविष्य के गर्भ में ही निहित है। रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसी दास (जयन्ती 13.8) की चौपाई दुहराना चाहता हूँ:

दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि व्यापा।।

परन्तु कहाँ गई वह राम राज्य की परिकल्पना जिसे कभी राष्ट्र-पिता महात्मा गाँधी भी अपने प्रवचनों में कहा करते थे। यह ठीक है कि भारत विकास परिषद् ने भी उन बेघर हुए लोगों को पुनः स्थापित करने का बीड़ा उठाया है, परन्तु इस गम्भीर समस्या का यह चिर-स्थायी हल नहीं है, ऐसा न हो कि चार धाम की धार्मिक यात्रा से अथवा ईश्वर के अस्तित्व से ही लोगों का विश्वास उठ जाए। एक मित्र ने तो यहाँ तक पूछ लिया कि क्या यह सब उन हजारों भक्तों के पूर्व जन्म के कर्मों का फल है कि उन्होंने अपनी जान गंवा दी। क्योंकि कहा जाता है ‘अवश्यमेव भोक्तव्यं कर्मफल शुभाशुभम्।' पर यह तर्क हृदय को छू नहीं गया। जो भी हो परिषद् के पर्यावरण प्रकल्प को ध्यान में रखते हुए इतना तो कर ही सकते हैं कि पेड़ों की अन्धाधुंध कटाई को रोका जाए, अपने जन्म-दिवस/अपनी वैवाहिक वर्षगांठ पर अथवा अपने किसी अत्यन्त प्रियजन की स्मृति में एक पेड़ अवश्य लगाया जाए। जल की बचत की जाए और पंच-भूतों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) से मैत्री सम्बंध स्थापित किए जाएँ।

20 अगस्त को रक्षाबंधन का पवित्र पर्व सभी बहन-भाई बड़ी निष्ठा और प्रेम से मनाएँगे। परन्तु क्या यह सम्भव है कि उस दिन उपरोक्त त्रासदी से बच गए बहन-भाईयों; बच्चों; बूढ़े माता-पिता की रक्षा हेतु जैसा बन पाए, आर्थिक अथवा अन्य किसी प्रकार की सहायता करने का हम संकल्प लें। ऐसा करने से रक्षा बन्धन पर्व का महत्व और भी बढ़ जाएगा।

28 अगस्त को जब सारा भारत कृष्ण जन्माष्टमी के महान् पर्व को कृष्ण की विभिन्न लीलाओं का मंचन कर, रातभर जगकर मनाएगा, तो एक लीला का तो यहाँ स्मरण अवश्य करना चाहिए-अपनी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाना। ऐसा उन्होंने क्यों किया-त्रस्त जन-मानस की रक्षा के लिए। आज ऐसे ही गोवर्धन-धारी और सुदर्शन चक्रधारी श्री कृष्ण की प्रतीक्षा बनी है परन्तु कलियुग में क्या यह सम्भव हो पाएगा।

लाल किले की प्राचीर से जब 15 अगस्त को भारत के प्रधान मंत्री देश के नाम अपना सन्देश प्रसारित करेंगे तो उत्तराखण्ड की त्रासदी में जान-गंवाने वालों के प्रति सहानुभूति और बच गए लोगों को फिर से बसाने की बात अवश्य कहेंगे। परन्तु क्या यह इस समस्या का पुख्ता समाधान है? इस विषय पर अर्थ शास्त्रियों, भूगोल शास्त्रियों, पर्यावरणविदों को मिल बैठ विचार करने और ठोस निर्णय लेने की आवश्यकता है, केवल सहानुभूति प्रकट करने से काम नहीं चलेगा। स्वतंत्रता दिवस प्रति वर्ष धूम-धाम से मनाया जाता है परन्तु राष्ट्र को सभी क्षेत्रों की उपलब्धिओं का आकलन अवश्य करना चाहिए।

‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’-एक नारा था भारत छोड़ो आन्दोलन (9.8) का। कितने युवा/युवतियों ने अपनी जान की आहुति दे दी। आज नारा होना चाहिए पर्यावरण से खिलवाड़ करने वालो भारत छोड़ो; कुपोषण भारत छोड़ो, अशिक्षा भारत छोड़ो; दुराचार, पापाचार, रिश्वतखोरी भारत छोड़ो। अपने विभिन्न प्रकल्पों के माध्यम से भाविप इस दिशा में प्रयत्न शील है। यह आत्म बोध सन्तोष का विषय है परन्तु सभी स्तरों के पदाधिकारियों को इन में और तीव्रता लानी होगी तभी सेवा और संस्कार में हमारा योगदान कारगर सिद्ध होगा। -

डॉ॰ धर्म वीर


September, 2013

Come September, and the entire Nation remembers with highest esteem and pride a Robust, Charming and Towering personality in Dr. Sarvapalli Radhakrishnan on 5th September. Dr. S. Radhakrishnan, Philosopher, and active Statesman, a Political thinker, Educationist and Religious luminary of high order was one of those few persons who equally distinguished themselves in various fields of knowledge.

This man with white turban, achkan and white Churidar pyjama  was India’s Ambassador to the USSR from 1949-1952. Even Marshal Stalin, as a mark of respect, exchanged caps with him. He was elected Vice President of Indian Republic and by virtue of his high office became the Chairman of Rajya Sabha in 1952. It was his distinguished role in the office when the Nation accorded him the highest recognition by electing him the President of Indian Republic in 1961. As India’s First Citizen, wherever he went to spread the message of peace and friendship, he was given profuse welcome.

Dr. Radhakrishanan was also the First recipient to be decorated with the coveted highest award of Bharat Ratna in 1954.

As a religious thinker Dr. Radhakrishanan has written a large number of books but ‘The Hindu view of life; ‘East and West’; Religion & Culture’ are read by millions.  ‘Religion is not magic or witchcraft, quackery or superstition, xxx Religion is fulfillment of man’s life, an experience in which every aspect of his being is raised to its higher extent’ - he wrote.

Swami Vivekanand in Bhagwa, also roamed about preaching the in-depths of Hindu Philosophy when at last he got a rousing applause at the Parliament of Religions held at Chicago by addressing the comity 'Brothers and Sisters of America’.

He has his own views about Religion: मैं एक ऐसे धर्म का प्रचार करना चाहता हूँ, जो सब प्रकार की मानसिक अवस्था वाले लोगों के लिए उपयोगी हो। इसमें ज्ञान, भक्ति, योग और कर्म समभाव से रहेगें।

His 150th Birth Anniversary has already been widely celebrated in January 2013. BVP organized a function to celebrate this occasion on 7th July 2013, at India International Centre by honoring a couple of Parishad stalwarts. Another big event in this connection is slated to be organized in the month of December this year. (Get ready to be a part of that event of high magnitude.)

Dr. Radhakrishnan B’day is also observed as शिक्षक दिवस (Teacher’s Day) as he himself was teacher par-excellence. BVP also holds GVCA programme on being inspired by him. A Guru (teacher) can be of great help in molding the lives of his disciples - ‘गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः’

In this chain, Literacy Drive (साक्षरता अभियान ) has also been taken up as Permanent   Project by some of our branches.

Ganesh Chaturthi  is being observed/ celebrated on 9th Sept. It is said that before every important event - at home or workplace - one should do Ganesh Pujan. Ganesh is considered symbol of Prosperity.

Onam festival (16.9) is celebrated with great pomp and show and zeal is Southern India. We wish our brothern in that region best of luck and prosperity.           - D.V. Sethi


October, 2013

हे राम
मोहनदास करमचन्द गाँधी (MKG) (2.10) को समूचा राष्ट्र बापू के अभिधान से अभिहित करता है। एक ऐसा व्यक्ति जो शारीरिक रूप से चाहे कृश-काय रहा हो परन्तु मनोबल की दृष्टि से उसकी सानी नहीं। तभी तो पोरबन्दर (गुजरात) में जन्मा वह व्यक्तित्व शरीर पर धोती, पाँव में साधारण जूती और हाथ में लाठी लिए हुए इतना तेज चलता था कि उनकी गति के साथ मुकाबला करना आसान नहीं था। उनके सत्याग्रह/अनशन की तीव्रधार के सम्मुख ब्रिटिश साम्राज्य भी नहीं टिक सका और अन्ततोगत्वा 15 अगस्त, 1947 को लाल किले की प्राचीर से अपना तिरंगा लहराया गया। जहाँ बापू का मनोबल जवाँ था वहाँ उनकी लाठी की भी करामात थी कि उसके सहारे वह अत्यन्त तीव्र गति से चल भी सकते थे। शायद लाठी के अन्य गुणों से भी वह परिचित थे:

                लाठी में गुण बहुत हैं सदा राखिए संग।
                गहरो नदी नारो जहँ तहँ बचावे अंग।।
                तहँ बचावे अंग झपट कुत्तन को मारे।
                दुसमन दावागीर तिनहूँ को मस्तक झारे।।
                कह ‘गिरधर’ कविराय सुनो हे धूर के बाठी।
                सब हथियारन छाँड़ि हाथ महँ लीजे लाठी।।

बापू ने राम राज्य की कल्पना की थी, अपने देश के अति-निर्धनों की खुशहाली चाहते थे परन्तु क्या पता था कि आज प्रत्येक भारत-वासी लम्बी सांस भरते हुए अनायास, परिस्थितियों को देखते हुए, कहने पर मजबूर हो जाता है कि ‘हे राम! हम किधर को जा रहे हैं।’ बापू ने अन्तिम सांस लेते हुए भी यही शब्द बोले थे ‘हे राम’। राजधाट पर बनी उनकी समाधि पर आज भी यही अक्षर पत्थर में उकेरे हुए दिखाई पड़ते हैं। काश! भारत के कर्णधार अपने ‘बापू’ की किसी बात को तो मानते! वर्ष में दो बार उनकी समाधि पर पुष्पांजलि दे देना पर्याप्त नहीं है।

ऐसा ही एक अन्य व्यक्तित्व भी आज (2.10) हमें स्मरण हो आता है जो (गुदड़ी का) लाल भी था और (दिल का) बहादुर भी! क्या हुआ वह भारत का प्रधान मंत्री बना परन्तु उनके चरित्र में इस पद की बू तक नहीं थी। कैबिनेट का मंत्री होने पर एक रेल दुर्घटना ने उनकी आत्मा को ऐसा कचोटा कि उन्होंने त्याग पत्र दे दिया। ऐसी मिसाल आज ढ़ूँढ़े भी नहीं मिलती। शायद ‘नैतिकता’’ शब्द भारतीय राजनीति के शब्द कोष से ही निकाल दिया गया है। वाह रे मानव! बाहरी चकाचौंध में तू इतना सराबोर हो गया है कि आत्मा की आवाज तुम्हें सुनाई ही नहीं देती। ‘जय जवान जय किसान’ का नारा देने वाले भारत के ऐसे महान् सपूत ‘भारत रत्न’ की उपाधि से अलंकृत लाल बहादुर शास्त्री को भी हम सश्रद्ध नमन करते हैं।

बापू के राम की ओर तो थोड़ा ऊपर संकेत किया है; तो क्यों न संस्कृत भाषा में रचित वाल्मीकि की ‘रामायण’ की चर्चा की जाए। वाल्मीकि ने अपने महाकाव्य में राम के उदात्त चरित्र का जो चित्रण किया है वह देखते ही बनता है। उन्होंने राम के चरित के माध्यम से युवा वर्ग को राष्ट्र के उत्थान हेतु उनका अनुकरण करने की प्रेरणा दी है। इस वर्ग के लिए परिषद् भी अनेकों आयोजन करता है क्योंकि इसी वर्ग ने देश की बागडोर सम्भालनी है। ध्यान रहे ‘रामायण’ की रचना संस्कृत में हुई थी और तुलसी कृत ‘राम चरित मानस’ की (अवधी) हिन्दी में। राम के चारित्रिक गुणों से महाकवि मैथिली शरण गुप्त इतने प्रभावित हुए कि उन्हें कहना पड़ा:

        राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है।
        कोई कवि बन जाए सहज सम्भाव्य है।।

और विजयदशमी (दशहरा) का पर्व भी भारत भर में हर्षोल्लास से मनाया जाएगा। सन्देश होगा ‘सत्य की असत्य पर और न्याय की अन्याय’ पर विजय। खेद है कि राष्ट्र के कर्णधार राष्ट्रधर्म के स्थान पर भ्रष्टाचार धर्म निभाने में जी जाँ से लगे हुए हैं। बात यह है कि हम ने अपने आदर्श नायकों से (चाहे वे किसी भी क्षेत्र के क्यों न हों) कुछ भी नहीं सीखा। आज ‘राम राज्य’ की जगह ‘रावण राज्य’ की सी स्थिति दिखाई पड़ती है। कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं बचा जो भ्रष्टाचार से मुक्त हो। यहाँ तक कि प्राकृतिक आपदा में भी स्वार्थी अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं।

इन गम्भीर परिस्थितियों को देखते हुए राष्ट्र को राम जैसे पराक्रमी नायक की आवश्यकता है।

इस तिमिर में आशा की किरण ढ़ूँढ़ने की भरपूर कोशिश कर रही है भारत विकास परिषद् अपने विभिन्न प्रकल्पों के माध्यम से। अन्त में इतना कहना ही पर्याप्त होगाः

    न हो साथ कोई अकेले बढ़ो तुम, सफलता तुम्हारे चरण चूम लेगी।      - धर्म वीर सेठी


November, 2013

तमसो मा ज्योतिर्गमय
उपनिषद् का अधोलिखित उद्घोष सार्वकालिक और सार्वजनीन हैः

असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय।

उस प्रभु से याचक क्या अभ्यर्थना करता है कि हे परम पिता परमेश्वर! मुझे असत्य के मार्ग से हटाकर सत्य के मार्ग पर ले चलो, अन्धकार के रास्ते को छोड़ मैं प्रकाश-पथ का पथिक बनूं और मृत्यु के चंगुल में न भेज कर मुझे मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होने अर्थात् आवागमन के चक्रव्यूह से निकाल कर जीवन-मुक्त होने की प्रेरणा दीजिए। कितनी उदात्त प्रार्थना है। ‘तमस’ अर्थात् अन्धकार शारीरिक एवं मानसिक दोनों दृष्टियों से भयावह होता है। यह सत्य है कि अन्धेरे के बाद प्रकाश की लौ अवश्य दिखाई देगी, परन्तु एक विद्वान् साधक तो यही प्रार्थना करेगा कि हे प्रभु मुझे अज्ञान रूपी अन्धकार से निकाल कर ज्ञान रूपी प्रकाश का मार्ग दिखाओ। यही सनातन सत्य है और हर कोई इसकी वाञ्छा करता है।

दीपोत्सव, दीपों की अवली (पंक्ति) - दीपावली (03.11) का भी यही सन्देश है। एक दीप से जले दूसरा - सम्पर्क और सहयोग का अत्युत्तम उदाहरणः मिट्टी का दिया, उसमें डाला गया तेल और उसमें रखी गयी रूई की कोमल बाती-तीनों का संगम ही तो प्रकाश का स्वरूप बनता है। दिया-सलाई से, ‘ओम् उद्बुध्यस्वाग्ने......’ मंत्र का उच्चारण करते, जब उस बाती को जलाया जाता है तो वह बाती स्वयं जल जाती है परन्तु दूसरों को प्रकाश दे जाती है।

श्री राम अयोध्या लौटे, चौदह वर्ष वनवास काटने के बाद, तो चारों ओर दीपमालिका हुई। हर्ष का कोई ठिकाना नहीं था। सिक्खों के प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी का जन्मोत्सव (17.11) ‘प्रकाशोत्सव’ के रूप में मनाया जाता है। गुरुद्वारे सजाए जाते हैं, गुरुवाणी का निरन्तर पाठ होता रहता है। हमारे सिक्ख भाई हुमहुमा कर अपने धर्म-स्थानों पर गुर-वाणी सुनने और ऐसे पवित्र पर्व पर सहभागी बनने जाते हैं। ‘इक ओंकार, सतनाम, करता पुरख, निरभो, निरवैर, ...........’ (ईश्वर एक है, उसका नाम ही सच्च है, वह सृष्टि का रचयिता है, न किसी से डरता है न किसी से वैर रखता है .................... इत्यादि) दिल को छू जाने वाली प्रार्थना है। गुरु नानकदेव जी ने कहा था ‘नानक नाम जहाज है, चढे़ सो उतरे पार’ - यह है प्रभु नाम की महिमा।

इसी मास में गुरु तेग बहादुर जी का शहीदी दिवस (11.11) भी मनाया जाएगा। ऐसे गुरु जिन्होंने अपने धर्म की रक्षा के लिए अपनी सन्तति का भी बलिदान कर दिया। मुगलों से लोहा लेने वाले ऐसे शहीद को भी हमारा सश्रद्ध नमन्।

पारिवारिक रिश्तों में भाई-बहन का रिश्ता भी बड़ा पवित्र माना जाता है। भाई-दूज (05.11) का पर्व हमें यही शिक्षा देता है। इस दिन भाई के मस्तक पर चन्दन का तिलक लगा कर बहन अपने भाई की सर्व-प्रकारेण श्री-वृद्धि की कामना करती है। जरा शिकागो की उस धर्म-सभा का स्मरण करें, जब भगवा-वस्त्र धारी उस स्वामी विवेकानन्द ने ‘My dear Sisters and brothers of America’ कह कर श्रोताओं को मन्त्र-मुग्ध कर दिया था। अमेरिका वाले भी बहन-भाई के इस पवित्र रिश्ते को समझे तभी तो पाँच मिनट तक करतल ध्वनि से उस महामानव का स्वागत एवं अभिनन्दन किया गया।

आइए! ऐसे ही एक और रिश्ते की चर्चा करें। परिवार में चाचा भी होते हैं। राजनीति के आईने से देखें तो भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु को ‘चाचा नेहरु’ कह कर सम्बोधित किया जाने लगा। -शायद उन्हें बच्चों से बड़ा लगाव था। और सम्भवतः इसी कारण उनका जन्म दिन (14.11) ‘बाल दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। परन्तु बच्चों में व्याप्त कुपोषण और सरकारी ‘मिड-डे-मील’ खा कर अपने जीवन से हाथ धोने वाले प्यारे-प्यारे बच्चों की कहानी ‘बाल-दिवस’ की गरिमा को कैसे बढ़ा सकती है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।            परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
अभ्युत्थानधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।           धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।। 
     

योगीराज श्रीकृष्ण के बाल जीवन की एक सर्व-विदित घटना है ‘गोवर्धन पर्वत (04.11)’ को उठा ग्राम वासियों की रक्षा करना। अभिमानी एवं अत्याचारियों से बचाने के लिए किसी न किसी महापुरुष का जन्म तो होता ही है। अहं की जब अति हो जाती है तो उसका नाश करने के लिए स्वयं भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं -

गुरु तेग बहादुर जी को भी इसी रक्षक के रूप में देखा जा सकता है।

हमारा सौभाग्य है कि ऐसे गुरुओं, सन्तों, फकीरों की इस धरा पर हमने जन्म लिया जिन्होंने अपनी वैदिक संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अपने प्राणों तक का बलिदान कर मानों उन्होंने गीत के इस पंक्ति को चरितार्थ कर दिया:

तुम समय की रेत पर छोड़ते चलो निशाँ।      देखती तुम्हें ज़मीन देखता है आसमाँ ।।                                            - धर्मवीर सेठी


December, 2013

कर्मण्येवाधिकारस्ते..............
‘मैं गीता पर हाथ रखकर कसम खाता/खाती हूँ कि मैं जो भी कहूंगा/कहूंगी सच कहूंगा/कहूंगी और सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा/कहूंगी। न्यायालय में, न्यायाधीश के सम्मुख गवाही देते हुए गवाह यह कसम उठाता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि श्रीकृष्ण के मुखारविन्द से ‘युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र’ में अर्जुन को उपदेश देते हुए निस्तृत गीता के अठारह अध्यायों के प्रत्येक श्लोक का एक-एक शब्द कितना महत्वपूर्ण है। न्यायाधीश के आसन के ठीक पीछे दीवार पर लगे भारत सरकार के लोगो (Logo) के ठीक नीचे लिखा रहता है ‘सत्यमेव जयते’। प्रश्न उठता है कि गीता की कसम ही क्यों दिलाई जाती है, किसी अन्य धार्मिक ग्रन्थ की क्यों नहीं? गीता के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण उक्ति हैः

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्।।

सम्पूर्ण उपनिषद गौ के समान हैं, गोपालनन्दन श्रीकृष्ण दुहने वाले हैं, अर्जुन बछड़ा है तथा महान् गीतामृत ही उस गौ का दुग्ध है और शुद्ध बुद्धि वाला श्रेष्ठ मनुष्य ही इसका भोक्ता है।

भारत की संस्कृति कर्म के सिद्धान्त को अक्षरशः स्वीकारती है और साथ ही ‘अवश्यमेव भोक्तव्यं कर्मफल शुभाशुमम्’। परन्तु श्रीकृष्ण का तो कहना था ‘कर्म करते चलो, फल (परिणाम) की इच्छा मत करो।’ अर्जुन के लिए परिस्थितियों के अनुसार, ऐसा ही उपदेश अनिवार्य था। वेद, उपनिषद्, महाभारत, गीता और रामायण आदि धार्मिक ग्रन्थ भारतीय संस्कृति की थाती हैं परन्तु गीता का सुष्ठु स्वाध्याय दैहिक, दैविक, भौतिक तीनों प्रकार के तापों (समस्याओं) का निदान प्रस्तुत करता है। शर्त केवल एक ही है इसका सुस्वाध्याय। अस्तु! मानव, चाहे किसी भी इदारे में क्यों न हो, को अनिवार्य है कि वह अपने कर्त्तव्य कर्म का पूरी निष्ठा और ईमानदारी से पालन करे और उसके परिणाम को परम पिता परमेश्वर पर छोड़ दे -‘....... मा फलेषु कदाचन।’  इसी सन्देश को गीता जयन्ती (26.11) के पावन पर्व पर हम सब भारतीयों को अंगीकार करना है।

युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र की बात चली तो मानना होगा कि वह सारा युद्ध अन्याय के विरोध में था- कौरवों का पाण्डवों के प्रति अन्याय। श्री कृष्ण ने कितना समझाया परन्तु अहंकार की मानों सीमा लांघ दी गई हो। ‘सूच्यग्र नैव दास्यामि’- आप पाँच गाँवों की बात करते हो मैं तो सूई की नोक के बराबर भी भूमि देने को तैयार नहीं (दुर्योधन का कथन)। अहं की पराकाष्ठा हो गई।

ऐसी ही एक स्थिति थी अंग्रेज़ी आक्रन्ताओं से देश को बचाने की। इस युद्ध में जिन वीरों ने अपनी शहादत दी उनके सम्मुख किसी जाति, धर्म या सम्प्रदाय की बात नहीं थी वरन् ‘भारत माता’ की लाज का प्रश्न था। वे ‘वन्दे मातरम्’ का उद्घोष कर वतन पर मर मिटते थे। काकोरी काण्ड के नायक राम प्रसाद बिस्मिल की शहादत (19.11) अन्ततोगत्वा काम आईः

सरफरोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है। देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है।

वस्तुतः जब भारत की आज़ादी का इतिहास पढ़ा जाता है। तो रोमाँच हो उठता है, अंग्रेज़ी प्रशासन की भारतीय नागरिकों के प्रति बदसलूकी और अमानवीयता की मानों इन्तिहा हो गई थी।

और जब पाप का घड़ा भर गया तो स्वामी श्रद्धानन्द (23.11) (पूर्व नाम महात्मा मुंशीराम) को छाती खोलकर कड़कती बोली में कहना पड़ा, ‘मारो गोलियाँ, किरच घुसा दो। हम रुकेंगे नहीं, आगे जायेंगे शान्ति से’। अद्भुत दृश्य देख दूर से अंग्रेज़ अफसर घोड़े से पहुँचा, उस वीर की वीरता से प्रभावित हो कहा ‘जुलूस को जाने दो’। एक कवि ने ठीक ही कहा थाः

कितनी विस्तृत वह छाती थी     x x       जिसकी छाती ने खूब सहे दुनिया के तीनों ताप प्रबल    x x  बलिदानी थी मदमाती थी

उनका सिद्धान्त था ‘जब तक दम में दम है, तब तक मनुष्य को बेदम (निरुत्साही) नहीं होनी चाहिए।’ और हुआ भी ऐसा ही। क्रान्ति की ज्वाला सर्वत्र फैलने लगी। इसलिए यह कहना, ‘ले दी हमें आजादी बिना खङ्ग बिना ढाल’, देश की आन-बान-शान को बचाने के लिए मर मिटने वाले असंख्य वीरों/वीरांगनाओं के प्रति अन्याय होगा।

शिक्षा के क्षेत्र में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए भी स्वामी श्रद्धानन्द को सदा स्मरण किया जाएगा।

आज भी अपने भारत की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति चिन्ता का विषय बनी हुई है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएंगे तो आप किस पर विश्वास कर सकते हैं-

किस का विश्वास करें                  डसते हैं अपने ही                   भोर हुए सपने ही।

अवांञ्छित तत्वों के विरुद्ध जैसे ही कोई कार्यवाही शुरू की जाती है मानवाधिकार (दिवस-10.11.13) की दुहाई देने वाले अपनी तूती बजाना आरम्भ कर देते हैं। उन्हें सर्वप्रथम देश की अस्मिता की रक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए जो उनके आचरण से नजर नहीं आता।

हिन्दू विश्वविद्यालय और हिन्दू महासभा के संस्थापक महामना पं॰ मदन मोहन मालवीय जी की जयन्ती (25.11) भारत-भू के लिए विशेष महत्व रखती है। स्वामी विवेकानन्द ने भी कहा था कि ‘मुझे गर्व है कि मैं हिन्दू हूँ।’

भारत विकास परिषद् का सदा यही प्रयास रहा है कि वह अपने संस्कार प्रधान प्रकल्पों - राष्ट्रीय समूहगान (हिन्दी-संस्कृत), भारत को जानो आदि के माध्यम से बालक/बालिकाओं, युवक/युवतियों को अपने देश की पवित्र माटी की गन्ध से अनुप्राणित कर सके।

आइए! इन शब्दों से अपनी बात की इति करें:  कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा। यह जिन्दगी है कौम की, तू कौम पै लुटाए जा। - डॉ॰ धर्मवीर सेठी


 

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