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                                    Niti Editorials : 2012
January हमारा दायित्व
February ..और बिगुल बज गया है
March .......Till the Goal is reached
Aprilar हम करें राष्ट्र आराधन
May संघं शरणं गच्छामि
June कहत कबीर सुनो भाई साधो

Julyay

नेह को बिरवा
August भारत विकास परिषद् स्वर्ण जयन्ती
Septemberuly Editorial
October हम कौन थे, क्या हो गए
November नानक दुःखिया सब संसार
December नारी सशक्तिकरण

January, 2012

हमारा दायित्व

गणतंत्र दिवस (26.1) भारतवर्ष का एक पावन पर्व है। इस महत्वपूर्ण दिवस पर सन् 1950 में भारत का अपना संविधान लागू हुआ था।

                            ‘‘ सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा।
                            हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा।।’’

अकसर यह धुन 26 जनवरी गणतंत्र दिवस परेड पर हमारे जांबाज जवानों द्वारा बजाई जाती है। इस स्वतंत्रता के पीछे भारत के महान सपूतों व क्रान्तिकारियों की याद आती है! नेता जी सुभाष चन्द्र बोस (23.1) ने नारा दिया था ‘‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’’। आजादी तो मिल गई परन्तु स्वतंत्रता की रक्षा का दायित्व भी तो हम सभी भारतवासियों का ही है।

गुरु गोविन्द सिंह (5.1) जयन्ती पर साथ-साथ उनके दिये बलिदान की याद ताजा हो जाती है। कौम के अस्तित्व व आन के लिये बलिदान की शहादत कितना महत्व रखती है, एक शायर ने यूं लिखा हैः-

                    ‘‘ शहीद की जो मौत है, वह कौम की हयात है। हयात तो हयात है, वह मौत भी हयात है।।’’

आन्दोलन, स्वतंत्रता, आजादी व राष्ट्र के प्रति समर्पित होने की भावना से आज भी (30.1) हम सभी भारतवासी राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी को श्रद्धांजलि देते हैं। गाँधी जी को एक मुकदमें के कारण दक्षिण अफीका जाना पड़ा था। वहाँ भारतीयों की दुर्दशा देखकर वह बहुत दुःखी व दंग रह गये थे। गाँधी जी ने इसके विरुद्ध सत्याग्रह किया और सफलता प्राप्त की। स्वदेश लौट कर भारत को स्वतंत्र  कराने का बीड़ा उठाया। असहयोग व स्वदेशी आन्दोलन चलाया। अनेकों बार कारावास गये। अंग्रेज सरकार बौखला उठी, अन्ततः भारत को स्वाधीन कराने में सफल हुए। 1948 को प्रार्थना सभा में जाते उनकी हत्या कर दी गई। गोली लगने के पश्चात् उनके अन्तिम शब्द थे ‘हे राम’ उनकी समाधि दिल्ली में राजघाट पर स्थित है। विश्व सदा गाँधी जी का ऋणी रहेगा।

स्वामी विवेकानन्द जी का जन्म (12.1.1863) को कोलकाता के ‘सिमला’ नामक स्थान के प्रसिद्ध दत्त परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री विश्वानाथ दत्त पेशे से प्रसिद्ध वकील थे तथा माता का नाम श्रीमती भुवनेश्वरी देवी था। स्वामी विवेकानन्द ने (25.1) भारत का परचम शिकागो की धर्मसभा में लहराया था। आज उन्हीं के सपनों को भारत विकास परिषद् साकार करने और इस दायित्व को निभाने का प्रयत्न कर रहा है।

याद रहे समयानुकूल बदलाव, संवर्धन और संरक्षण में ही संस्कृति का बार-बार सृजन होता है। अतः बुनियादी मूल्यों, संस्कारों की रक्षा आवश्यक है। विवेकानन्द जी के गुरु रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि पृथ्वी पर नदियाँ इसीलिए बह रहीं हैं, क्योंकि उनके जनक पहाड़ अटल रहते हैं। भारत व अन्तर्राष्ट्रीय धरती से जुड़ी भा॰वि॰प॰ सेवा-संगम के रूप में प्रतिष्ठित है। जन-जन के कल्याण से जुड़ी चिरन्तन धरा को सद्भाव, समरसता व सेवा की भावना से बढ़ाते रहने का परिषद् का लक्ष्य है। वस्तुतः परिषद् द्वारा इसी उद्देश्य से ‘‘भारत को जानो’’ राष्ट्रीय समूहगान, राष्ट्रीय संस्कृत समूहगान प्रतियोगिता युवकों में स्वाभिमान जागृत करने के लिये देश भर में आयोजित की जाती हैं।

जितना समाज व राष्ट्र के उत्थान हेतु भा॰वि॰प॰ अपने प्रकल्पों के माध्यम से कार्य कर रहा है उसके अनुपात में समाज व देश में इसके प्रचार की कमी को महसूस किया जा रहा है। मेरा तो यहाँ तक मानना है कि आज के संदर्भ में ‘‘भारत विकास परिषद् को जानो’’ की ¬प्रतियोगिता अति आवश्यक हो गई है, जिससे जन-जन तक इसका व्यापक प्रचार हो सके। इस विषय पर भी गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है। जनवरी 2012 तक विश्व में 7 अरब से अधिक आबादी हो चुकी है। जनसंख्या विश्व के लिये चिन्ता का सबब तो है ही, लेकिन भारत देश के लिये जिसकी जनसंख्या विश्व के दूसरे नम्बर पर आती है, वह भी बहुत गंभीर व चिन्ता का विषय बना हुआ है। देश की जनसंख्या का मूल कारण निर्धनता, अशिक्षा, अन्ध्विश्वास रूढ़ीवादिता आदि हैं। भू्रण हत्या का विरोध, बेटी बचाओ आन्दोलन, बेटा-बेटी एक समान आदि प्रकल्पों द्वारा परिषद् सामाजिक दायित्व को निभाने की भरपूर चेष्टा कर रहा है।

आइये! अपने राष्ट्र के त्यौहारों द्वारा परस्पर भाईचारा, भेदभाव मिटाने व देश की प्रभुसत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिये लोहड़ी (13.1), मकर संक्रान्ति (14.1) व पोंगल दिवस (15.1) और वसन्तोत्सव (28.1) को हर्षोल्लास से मनायें। यद्यपि हिन्दू समाज में नवसम्वत्सर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (23 मार्च) से आरम्भ हो रहा है, लेकिन आज के युवा 1 जनवरी को ही नववर्ष मानते हैं। यहाँ युवाओं को हिन्दू संस्कार व पद्धतियों के प्रति जागृत करने की अधिक आवश्यकता है।

अन्त में पुनः भारत के गणतंत्र दिवस पर आप सभी परिवार सदस्यों व समस्त भारतवासियों को बधाईयाँ व शुभकामनाएँ। 


February, 2012

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..और बिगुल बज गया है

यह एक सुखद संयोग है कि भारत विकास परिषद् के आदर्श (
Icon) स्वामी विवेकानन्द जी (पूर्व नाम नरेन्द्र नाथ) की उत्तर शताब्दी (150 वर्ष) और परिषद् की स्वर्ण जयन्ती (50 वर्ष) दोनों ही ई॰ सन् 2013 में मनाई जानी निश्चित् हुई हैं। 12 जनवरी को स्वामी जी का जन्म दिवस और 10 जुलाई को परिषद् का स्थापना दिवस-लगभग डेढ़ वर्ष; पूरे श्रद्धा, लगन और समर्पित भाव से मनाने के लिए केन्द्रीय कार्यालय से आवश्यक निर्देश जारी कर दिये गये हैं। और यह शंख 12 जनवरी, 2012 से अपना नाद आरम्भ कर चुका है, जब केन्द्रीय कार्यालय में स्वामी विवेकानन्द जी की आदम कद प्रतिमा की स्थापना और रविवार 15 जनवरी, 2012 को उस का विधिवत् लोकार्पण किया जा चुका है। उस दिन सभी प्रान्तों की शाखाएँ अपने-अपने नगरों में और अपनी-अपनी सुविधानुसार मानव-शृंखला से यह आयोजन आरम्भ करेंगी। ऐसे कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार के लिए प्रेस-कान्फ्रेन्स, भाषण, वाद-विवाद, लेख, चित्रकला प्रतियोगिताएँ एवं उच्च-स्तरीय कार्यक्रमों एवं प्रकाशनों की सूची बनाई जा चुकी हैं। यह गर्व की बात है कि सभी स्तर के पदाधिकारियों ने इन्हें सर्व प्रकारेण सफल बनाने की कमर कस ली है।

भारतीय संस्कृति समस्त विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (The entire Humanity is a family) मानती है। यही कारण था कि शिकागो में आयोजित धर्म-सभा में स्वामी जी ने अपना उद्बोधन ‘My dear Sisters and Brothers’ मेरी प्यारी बहिनो और भाईयो; इन शब्दों के साथ आरम्भ किया था। वस्तुतः परिवार की परिकल्पना में यह पवित्र रिश्ते गिने जाते हैं। मैं, वर्ष भर चलने वाले इन सभी आयोजनों की सफलता और जन-ग्राह्यता के लिए अभी से आप सब को साधुवाद कहना चाहता हूँ। युवकों के प्रति स्वामी जी का विशेष आकर्षण और आग्रह था क्योंकि उन्हीं के हाथों में देश की बागडोर सुरक्षित रहेगी। इसलिए उनके उद्गारों को यूँ प्रकट किया जा सकता है:

गर्दिश-ए-हालात की बरसात क्यूँ न हो,
कड़कती बिजलियाँ हिमपात क्यूँ न हो,
आगे बढ़ने से न रोक सकेगा तूफ़ाँ भी,
गर हौंसलों में जज्बा-ए-उमंग जवाँ हों।।

लगभग 19 वर्ष की आयु में जब नरेन्द्र श्री रामकृष्ण परमहंस (जयन्ती 23.2) को प्रथम बार मिले तो मानो उनमें उन्हें अपने परम तत्व ज्ञानी गुरु के दर्शन हुए और परमहंस को एक जिज्ञासु शिष्य के। बस गुरु और शिष्य के पवित्र रिश्ते ने युवा नरेन्द्र को भविष्य का स्वामी विवेकानन्द बना दिया। ऐसे परमहंस को भी हम नमन् करते हैं।

स्वामी विवेकानन्द ने ‘एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति’ 'God is one, though wise men speak of Him in different ways'-Rig Veda' के सिद्धान्त को सर्वोत्कृष्ट माना था। ऐसे महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती (जयन्ती-16.2) ने भी आर्य समाज की स्थापना करते हुए वैदिक विचारधारा की प्रमुखता को स्वीकारते हुए ‘एकमेव द्वितीयो नास्ति’ (ईश्वर एक ही है) का उद्घोष किया था। आर्य समाज के प्रथम नियम में इसी की व्याख्या है। ‘मूलशंकर’ से ‘दयानन्द’ की सीढ़ी तक पहुँचने के लिए शिवरात्रि (20.2) की एक मात्र घटना का़फी थी। स्वामी विवेकानन्द और महर्षि दयानन्द में आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत साम्य है।

अध्यात्म की दृष्टि से न सही, अपनी मातृ-भूमि (माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्यः) की रक्षा के प्रति माँ जीजा बाई के संस्कारों से अनुप्रेरित वीर शिवा जी (जयन्ती 19.2) और स्वामी विवेकानन्द जी में भी साम्य है जिन्होंने कहा था ‘सबसे पहले हम जिस देवी की पूजा करेंगे वह भारतमाता है और भारतवासी हमारे प्रथम देवता’।

वीर शिवाजी को यवनों से लोहा लेना पड़ा तो अंग्रेजी प्रशासन को हिलाने के लिए वीर चन्द्रशेखर आजाद (शहादत-27.2) को अपनी शहादत देनी पड़ी। वह भी अपनी मादरे-वतन को अपनी माँ समझते थे।

विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने चाहे कितनी प्रगति कर ली हो और प्रति वर्ष 28 फरवरी को ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ मनाया जाता हो परन्तु जब तक सन्तों, गुरुओं, महर्षियों का अध्यात्म चिन्तन उसके साथ नहीं जुड़ेगा, तब तक हमारी प्रगति अधूरी ही रहेगी।

इस क्रम में ‘सोलहवी शती’ के सुप्रसिद्ध निर्गुण-ब्रह्म के उपासक गुरु रविदास को भी उनकी जयन्ती (7.2) पर अवश्य स्मरण करना चाहेंगे जिन्होंने रामानन्द को अपना गुरु मानते हुए निर्गुण-ब्रह्म की उपासना की। स्वामी विवेकानन्द ने भी कहा था -ईश्वर नित्य, निराकार, सर्वव्यापी है। उसे एक साकार रूप मे समझना ग़लत होगा’

आइए! दोनों महान् आयोजनों को प्रत्येक स्तर पर भव्यता प्रदान करने के लिए कृत संकल्प हो जाएँ क्योंकि शंख की ध्वनि हमें सदा प्रेरित करती रहेगी।      


March, 2012

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......Till the Goal is reached
In my last editorial (February 2012 issue) I had written ...... और बिगुल बज गया है (........and the Bigul has blown). And now the next step is to achieve the Goal / Target i.e. to celebrate the year long celebrations of our ICON Swami Vivekanand in January 2013 and one and a half year long festivities of Bharat Vikas Parishad culminating in July 2013 with its Golden Jubilee. For this every single member of BVP has to gird up his/her lions.
 

The curtain raiser of upcoming memorable events was unveiling of a bright white marble statue of Swami Vivekanand in the courtyard of BVP HQ’s at Pitampura, New Delhi by none other than Sushri Nivedita Bhide, Vice President Vivekanand Kendra Kanyakumari on 15th January 2012. The readers shall have an opportunity to have a glimpse of that glittering function, in this issue, hosted by Delhi North. A big applause for the team headed by Shri Raj Kumar Jain, State President.
 

To reach our Goal, I am reminded of a saying "to reap the harvest of success, you have to sow the seeds of hard work " Swamiji worked relentlessly for the upliftment of the down trodden, have-nots and the like. His utterance : "Feel, my children, feel; feel for the poor, the ignorant, the down trodden; feel till the heart stops and the brain reels and you think you will go mad". Providing artificial limbs and arranging mass marriages, providing free medical and such like activities of BVP prove that the Parishad is on its way to come up to the guidelines penned by Swamiji.
 

India is a vast country of Holistic ideas, different seasons and numerous festival. On the Holi festival (8.3) people smear the forehead with Gulal and hug each other irrespective of caste and creed. This brotherhood (भाई चारा) is the soul of Indian philosophy. Holika Dahan is a symbol of the victory of truth over evil.
 

‘My faith is in the younger generation, the modern generation, out of them will come my workers x x x like lions’ said Swami ji. And lo! with such a high spirit the three youngsters, Sukhdev, Raj Guru and Bhagat Singh thrice shouted Vande Matram and kissed the gallows to pave the way to get the Indian soil rid of the British regime. Mother of S. Bhagat Singh was in tears and when asked why was she weeping, her answer was soul-stirring “I wish I had another son to be sacrificed for the mother land”. We bow our heads in reverence to these brave sons of the soil (माता भूमि पुत्रो ऽहं पृथिण्यः). 
 

The most important event of this month is the beginning of the first day of Indian Calendar (23, 3) (भारतीय नव वर्ष ) with the rise of the moon on 23rd instant. The first month being Chaitra (चैत्र). All the months of the calendar are scientifically named. In some states it is known as गुड़ी पड़वा i.e. ioZ (festival) उगाडि़ (उगना चाँद का), चेती चाँद i.e. the moon of चैत्र month. We should feel proud of our own NEW YEAR. Tell our children also be apprised about its significance.
 

When we talk about the महिला दिवस (8.3) Parishad’s Project (महिला सशक्तिकरण) Empowerment of the Indian women by educating them, falls in line with its objectives. Teach one woman and three families will be benefitted. We always bow with reverence to our Maatri Shakti (मातृ शक्ति).
 

Wishing all my BVP brotheren a very happy, prosperous and healthier NEW YEAR, let me once again remind all of you to organize the functions (as stated above) with full vigour and Samarpan Bhaav.


 

April, 2012

हम करें राष्ट्र आराधन

भारत विकास परिषद् के राष्ट्रीय पदाधिकारियों का दायित्व ग्रहण, भारतीय नव वर्ष 2069 का शुभारम्भ और वित्तीय वर्ष 2012-13 का आरम्भ, अप्रैल 2012 में इन तीनों का मधुर संगम ही प्रतीत होता है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी के मुखिया (अध्यक्ष) के रूप में न्यायमूर्ति वी॰एस॰ कोकजे (इन्दौर), उनके सहयोगी (कार्यकारी अध्यक्ष) प्रो॰ एस॰पी॰ तिवारी (चण्डीगढ़), परिषद् की धुरी (महामंत्री) एस॰के॰ वधवा (दिल्ली) और कुबेर का दायित्व सम्भालने वाले (वित्त मंत्री)  डॉ॰ कन्हैयालाल गुप्ता (अलीगढ़) एवं संगठन को और शक्तिशाली बनाने वाले (संगठन मंत्री) हरीश जिन्दल (ग़ाजियाबाद) और समस्त कार्यकारिणी का ‘नीति’ परिवार की ओर से हम स्वागत एवं अभिनन्दन करते हैं। परिषद् उत्तरोत्तर गतिशील रहते हुए अपने उद्देश्यों/लक्ष्यों को प्राप्त करता रहे, यही हमारी मंगल कामना है। समाज के सभी वर्गों से जुड़े हुए लोग जब मिल कर बैठते और सोचते हैं, तो किसी भी संगठन की प्रगति अवश्यमभावी होती है क्योंकि ‘संगच्छध्वं, संवदध्वं, सं वो मनासि जानताम्’ की भावना से उन सभी का मन ओतप्रोत रहता है।

अस्तु! एक बार पुनः साधुवाद!

क्या ही सुखद संयोग है कि नए सत्र का श्रीगणेश मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जयन्ती (1.4) से हो रहा है और उनके परम भक्त, जो सर्व भावेन राम के प्रति समर्पित थे, हनुमान, की जयन्ती भी उनके पीछे-पीछे 6 अप्रैल को मनाई जा रही है। हनुमान चालीसा का एक-एक शब्द उनकी अथाह वीरता, लावण्य और अटूट प्रभु-भक्ति का परिचायक है। ‘रामदूत, अतुलित बलधामा’ ‘कंचन वरण’, ‘हाथ वज्र’ आदि इसी ओर संकेत करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ‘राम सो बड़ो है कौन, मोसों कौन छोटो। राम सो खरो है कौन, मोसों कौन खोटो’, कहते हुए अघाते नहीं। आर्यवर्त के ऐसे पुरुषोत्तम और उनके ‘अंगरक्षक’ को हम सब अन्तर्मन से स्मरण करते है।

स्वामी विवेकानन्द भी ‘एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति’ इस महावाक्य को अपनी विचार सरणी का आधार मानते थे। भारतीय परम्परा में इसी कारण अन्य धर्मावलम्बी भी हुए। जिनमें जैन सम्प्रदाय का अपना योगदान रहा। दिगम्बर और श्वेताम्बर दो धाराएँ होते हुए भी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर स्वामी महावीर की जयन्ती (15.4) पर अहिंसा के इस पुजारी का हम सादर वन्दन करते है।

अप्रैल मास में ही दो और महान् पुरुषों की जयन्तियाँ हैं। एक हिन्दुत्व का रक्षक बना और दूसरे ने इस राष्ट्र को अपना संविधान दिया। पिछले दिनों एन॰डी॰ टीवी चैनल पर पूर्ण रूपेण काश्मीर की समस्या और वहां से आए हिन्दुओं/पण्डितों, जो कश्मीर को छोड़ कर भारत के अन्य राज्यों में शरणार्थी बन कर रह रहे है, पर परिचर्चा हो रही थी। मुगल कालीन बादशाहों के अमानवीय अत्याचारों की कहानी सुनकर रोंगटे खड़े होना स्वाभाविक था। वे कश्मीरी पण्डित अपनी रक्षा के लिए गुरुतेग बहादुर के पास फरियाद लेकर गए। जो गुरु अपने राष्ट्र की अस्मिता और हिन्दुत्व की रक्षा के लिए अपने चारों पुत्रों का बलिदान दे सकता है, ऐसे महान् गुरु तेगबहादुर की इतिहास में क्या कोई सानी हो सकती है? सिक्ख सम्प्रदाय के ऐसे नवें गुरु को उनकी जयन्ती (11.4) पर किन भावों से स्मरण किया जाए, शब्द नहीं है। क्योंकि उनके जीवन की प्रत्येक घटना अपने आप में एक इतिहास है।

येन-केन प्रकारेण देश स्वतन्त्र हुआ तो एक बुद्धिजीवी डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर (14.4) ने इस गणतन्त्र के लिए एक प्रभावी संविधान दिया जो 26.01.1950 को लागू हुआ। गीता के समान इस पवित्र संविधान की प्रत्येक धारा का ठीक प्रकार से सम्मान करने की प्रभु सबको सद्बुद्धि दे।

स्वतन्त्रता की कहानी जब लिखी जाती है तो अमृतसर के जलियाँवाल बाग में बैसाखी का पर्व मनाने के लिए एकत्रित निहत्थी जनता पर जिस क्रूरता, बर्बरता और नृशंसता से अंग्रेजी हुकूमत के जनरल डायर ने हुक्म देकर गोलियों की बौछार करवाई, उसके चिह्न आज भी बाग की दीवारों पर मिल जाते हैं। अनगिनत कत्ले आम हुआ। क्या अपने देश के हिन्दू इस तरह पिटते और पिसते ही रहेंगे?

बैसाखी (13.4) का पर्व आज भी पंजाब के गबरु जवान नई फसल आने पर बड़े जोशो खरोश से मनाते है! असम में इसे बीहू के नाम से जाना जाता है। यह जोश तभी बना रह सकता है जब युवा स्वस्थ रहेंगे, फॉस्ट-फूड से बचेंगे, योगाभ्यास, प्राणायाम और कुछ देर के लिए आत्म चिन्तन करेंगे। इसी लिए 7 अप्रैल को ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाया जाता है।

समस्त परिषद् परिवार स्वस्थ एवं नीरोग रह कर स्वामी विवेकानन्द की 150वीं जयन्ती और भाविप की स्वर्ण जयन्ती के विशाल कार्यक्रमों में सहयोगी बना रहे, इन्हीं कामनाओं के साथ ‘सर्वे भवन्तु सुखिनाः सर्वे सन्तु निरामयः’ को दुहाराते है। - आर॰पी॰के॰


May, 2012

संघं शरणं गच्छामि
महात्मा गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) (6.4) ने अपने तीन उद्घोषों:
बुद्धं शरणं गच्छामि
धम्मं शरणं गच्छामि
संघं शरणं गच्छामि


में अपनी दृष्टि से चाहे ‘बौद्ध संघ’ की ओर संकेत किया हो परन्तु भारत विकास परिषद् की दृष्टि से तो हम इस परिषद् को ही एक ‘संगठन’ मानते हैं और जैसा महात्मा बुद्ध चाहते थे वैसे ही अपने पंचम सूत्र ‘समर्पण’ के माध्यम से तो यही कहना होगा ‘परिषद् शरणं गच्छामि’ अर्थात् मैं तो परिषद् कार्य के लिए समर्पित हो ही गया हूँ। भारत विकास परिषद् के कर्णधारों ने अपने वरिष्ठ और अनुभवी सदस्यों को ‘विकास समर्पित’ अलंकरण देकर मानों उनके कन्धों पर कुछ स्वैच्छिक दायित्व डाल दिया हो़; चाहे वह मार्ग दर्शन हो अथवा क्षमता अनुकूल सेवाकार्य। किसी भी संगठन अथवा संस्थान की उत्तरोत्तर प्रगति ‘समर्पित’ व्यक्तियों द्वारा ही सम्भव होती है। योगीराज श्री कृष्ण ने भी तो गाण्डीव-धारी अर्जुन से यही तो कहा था।:

सर्व धर्मान् परित्यज्य मां एकं शरणम् व्रज

अर्थात् सभी धर्मों का परित्याग कर मेरी ही शरण में आ जाओ। यह होता है गुरु का शिष्य पर अधिकार और शिष्य का गुरु के प्रति विश्वास। किसी भी कार्य की बात की जाए, समर्पण भाव सर्वोपरि माना जाता है।

घास की रोटी खाने वाले महाराणा प्रताप (24.4) भी तो राष्ट्र के प्रति समर्पित थे। ‘हल्दी घाटी’ महाकाव्य में कवि ने उनके चेतक की पगध्वनि का सटीक वर्णन किया हैः

टक टक, टक टक, टक टक टक
चेतक की टाप सुनाई दी।

वस्तुतः चेतक राणा प्रताप का सखा, सहयोगी और सेनानी सब कुछ था। महाराणा ने यवनों से इसी समर्पित भाव के कारण लोहा लिया था।

ऐसे ही एक और भारत माँ के सपूत थे वीर सावरकर। दुःख की बात है कि वीर सावरकर सरीखे हिन्दुत्व के रक्षक, जिसने अपना सारा जीवन ही सलाखों के पीछे काले पानी की सेलिल्युर जेल में काट दिया ऐसे राष्ट्र नायक की मानसिक प्रतिबद्धता और हिन्दु राष्ट्र के लिए सर्व भावेन समर्पण को देश का मानस पहचान नहीं सका। स्वतंत्रय वीर विनायक दामोदर सावरकर (जयन्ती 28.4) का लक्ष्य था ‘राजनीति का हिन्दुकरण और हिन्दुओं का सैनिकी करण’। प्रायः उनका परिचय' Light House of the Andamans'  कह कर दिया जाता है। जिसने पग-पग पर भारतीयों को आततायियों और ब्रिटिश साम्राज्य की भारत विरोधी मानसिकता के प्रति जेल में रहते हुए भी आगाह किया था, ऐसे वीर सेनानी को राजनीति के गलियारों में पूरी श्रद्धा और निष्ठा से मात्र स्मरण भी नहीं किया जाता। उनके प्रति ये शब्दः

तुम अजर, अमर, तुम सदा अभय
तुम कालजयी, तुम मृत्युंजय

पूर्ण रूपेण सटीक हैं! ऐसे वीर के लिए प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल एवं भारत रत्न श्री सी राज गोपालाचार्य ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा थाः

‘सावरकर मेरे जीवन के प्रथम क्रान्तिकारी आदर्श थे जिन्होंने हमें भरपूर प्रेरित और प्रोत्साहित किया था’।

इस देश की प्रगति गाथा में जहाँ अपने जीवन को आहूत करने वाले क्रान्तिकारी वीर/वीरांगनाओं की चर्चा होती है, वहां साथ ही कवियों और कलाकारों का भी अपनी लेखनी से राष्ट्र को जागरूक करने में विशिष्ट योगदान रहा है। ऐसे ही ‘गीतांजलि’ और राष्ट्रगान के रचयिता रवीन्द्रनाथ टैगोर को उनकी जयन्ती (8.4) पर हम सब अवश्य स्मरण करते हैं। उनका यह कथनः -‘व्यवहार एक दर्पण है जिसमें व्यक्ति का व्यक्तित्व दिखाई पड़ता है’, अत्यन्त मार्मिक और अर्थ संगत है।

यहाँ एक प्रश्न उठता है। युवा पीढ़ी के कितने युवक ऐसे हैं जो भारत को माँ का दर्जा देने वाली ऐसी महान् विभूतियों से परिचित हैं। उन्हें तो बालीवुड और क्रीड़ा जगत में मात्र क्रिकेट के मैदान पर बल्ले का करतब दिखाने वाले ही याद आते हैं। परन्तु सन्तोष इस बात का है कि युवकों में ऐसी जन-चेतना जगाने के लिए भारत विकास परिषद् ने ‘भारत को जानो’ प्रतियोगिता के माध्यम से स्कूलों के विद्यार्थियों में प्रतियोगिता करवाकर इस खाई को पाटने का प्रयास किया है जो सराहनीय है। यह समय है हमारी युवा पीढ़ी को चेतने का क्योंकि उन्होंने ही भविष्य में माँ भारती की अस्मिता को बचाना है।                                                   - धर्मवीर सेठी


June, 2012

कहत कबीर सुनो भाई साधो
15वीं शती का सन्त, महात्मा, कवि (परन्तु अनपढ़ - मसि कागद छुओ नहीं। कलम गही नहीं हाथ) निर्गुणोपासक, रामानन्द का शिष्य कबीर अपने दोहों की रचना के माध्यम से अमर हो गए हंै। उनका एक-एक दोहा अपने गर्भ में इतना कुछ छिपाए हुए है कि प्रत्येक दोहे पर एक लेख लिखा जा सकता हैं। कविवर बिहारी के दोहों के बारे में तो प्रचलित है ही किः

सत सइया के दोहरे ज्यों नाविक को तीर।
देखन में छोटे लगें घाव करें गम्भीर।।

परन्तु निर्गुण भक्त कबीर भी किसी से न्यून नहीं। प्रायः भौतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक सभी विषयों पर उस ‘मसि कागद’ न छूने वाले कवि की ‘कलम’ जरूर चली है। हम उनकी जयन्ती (4 जून) पर उन्हें पुनः स्मरण करते हैं कि उन्होंने हिन्दी भाषा को ही नहीं अपितुः राष्ट्र को अपने साहित्य द्वारा अनूठी देन दी है।

एक स्थान पर उन्होंने कहाः

जननी जने तो भक्त जन, या दाता या शूर।
नाहिन तो तू बांझ रह, क्यों व्यर्थ गंवावे नूर।।

वस्तुतः ऐसी माँ (ओं) को हम सादर नमन करते हैं जिसने राम प्रसाद बिस्मिल, सरदार ऊधम सिंह, बीरांगना रानी लक्ष्मी बाई सरीखे वीरों-वीरांगना को अपनी कोख से जन्म देकर सदा के लिए उन्हें अमर बना दिया।

काकोरी काण्ड के प्रणेता राम प्रसाद बिस्मिल को 11 जून उनकी जयन्ती पर जहाँ सादर नमन करते हैं वहीं राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा के लिए अपनी जान पर खेलने वाले इस वीर को इतिहास सदा स्मरण रखेगा। इसी प्रकार जनरल डायर को सबक सिखाने वाले (उन पर गोली चला कर) रणबांकुरे सरदार ऊधम सिंह को भी उनके बलिदान (12 जून) को कैसे भुलाया जा सकता है।

‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ इस प्रसिद्ध पंक्ति से अंग्रेज़ों से जूझते हुए 23 वर्ष की आयु में (18 जून) अपना बलिदान देने वाली (मनु) रानी लक्ष्मी बाई के विषय में कौन नहीं जानता। अपने नेत्र बन्द कर उस वीरांगना के दृश्य को जरा निहारिएः घोड़े पर सवार, मुँह में उसकी लगाम, एक हाथ में तलवार, दूसरे हाथ में ढाल और पीठ पर छबीली का नन्हा पुत्र। कल्पना तो कीजिए उसके जुनून की और आततयियों के साथ टक्कर लेने की हिम्मत की। ऐसी वीरांनाओं को राष्ट्र सदा स्मरण करता रहेगा। उनकी माँ भागीरथी बाई को अन्तःकरण से वन्दन।

जब हल्दी घाटी युद्ध (18 जून) की चर्चा होती है तो महाराणा प्रताप का नाम स्वतः जिह्वा पर आ जाता हैं। उनकी स्नेहमयी ममता भरी माँ जयन्ती बाई को भी बधाई जिसने ऐसे वीर को जन्म दिया था।

पंजाब में सिक्ख राज्य की स्थापना, कोहेनूर हीरे के रक्षक एवं 19 वर्ष में राज्यारोहण करने वाले महाराणा रणजीत सिंह की पुण्यतिथि (22.6) पर ऐसे वीर योद्धा को भी हम अन्तर्मन से स्मरण करते है।

विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day) (5 जून) की जब बात आती है तो पर्यावरण से सम्बन्धित जल (जीवन) की महत्ता को भी नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता। कवि ने ठीक ही कहा थाः

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।।

परन्तु, खेद है हम लोग जीवन में पानी की कद्र करना अभी भी नहीं सीखे।

कबीर ने कहा था .......‘या दाता या शूर’। शूरवीर सन्तानों की चर्चा तो ऊपर हो गई, अब थोड़ी बात दाता की भी कर लें। भारत विकास परिषद् के लिए इस संस्था के संस्थापक डा॰ सूरज प्रकाश (जयन्ती 27.6) का ‘दाता’ के रूप में बड़ा स्पष्ट उदाहरण है। पहाड़गंज नई दिल्ली में अपने क्लिनिक पर आने वाले हर गरीब का इलाज मुफ़्त किया जाता था। कभी-कभी उनके घर जाकर भी उनकी मिजाज पुरसी कर आते थे। सेवा के क्षेत्र में उन्होंने एक मिसाल कायम कर दी थी। इस दिन पर भारत भर में परिषद् की शाखाएँ विशेष आयोजन करती हैं। सभी शाखाओं को साधुवाद।

जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा (21 जून) के सम्बन्ध में इस अंक में ओड़ीशा प्रान्त की ओर से सहयोग की एक विशेष सूचना दी गई है। सदस्यगण उसका लाभ उठा सकते हैं।

कबीर की वाणी से ही अपनी बात समाप्त करते हैः

कबिरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर। न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।।

इत्यलम्..                                                                                                                                                                         - डा॰ धर्मवीर


July, 2012

नेह को बिरवा
सगुण भक्त महाकवि तुलसी दास ने अपने अमर काव्य रामचरितमानस की चौपाईयों में एक स्थान पर कहा था: पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर निन्दा सम नहिं अधमाई।। अर्थात् अपने से अन्य का उपकार (भला, सेवा) करने के समान कोई भला काम (धर्म) नहीं है और दूसरे की निन्दा करने जैसा कोई नीच कर्म नहीं।

जरा इसके प्रथम अंश पर विचार करें। सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध के लोमहर्षक परिणाम को देखकर न जाने डॅ. सूरज प्रकाश जी के मन में क्या उद्वेलन हुआ कि उन्होंने तो समाज के Have-nots की सेवा करने का मानो बीड़ा उठा लिया। अपने क्लिनिक में बैठ कर ऐसे वर्ग की निःशुल्क सेवा (सहायता) तो आरम्भ हो ही गई परन्तु अपने कुछ साथियों के साथ नई दिल्ली के होटल मेरीना में बैठ-चिन्तन-मनन और विचार मन्थन आरम्भ हुआ कि ऐसा एक संगठन बनाया जाए जो नर-सेवा को प्रमुख उद्देश्य मान कर कार्य-रत रहे। पहले ऐसे संगठन को Citizen Council  का नाम दिया गया परन्तु और बुद्धि-जीवियों के जुड़ने और विचार-आलोड़न की प्रक्रिया को जारी रखते हुए इस संस्था का नामकरण हुआ ‘भारत विकास परिषद्’। शुरु में उसके सूत्रों को चार सकारों - सम्पर्क, सहयोग, संस्कार और सेवा- तक ही सीमित समझा गया परन्तु इस मुहिम में डा. लक्ष्मीमल सिंघवी के जुड़ने के उपरान्त एक और सूत्र -समर्पण - को जोड़ दिया गया और बन गए पाँच सकार। ‘भारत विकास परिषद्’ नाम की एक गैर-सरकारी संस्था की विधिवत् स्थापना हुई 10 जुलाई, सन् 1963 को सेवा और संस्कार दो मुख्य उद्देश्यों को लेकर। इस यात्रा को आगामी 10 जुलाई 2013 को ठीक पच्चास वर्ष होने जा रहे हैं जब भारत भर में परिषद् की शाखाएँ सोल्लास इसकी स्वर्ण-जयन्ती मनाएँगी। सेवा और संस्कार से सम्बन्धित विभिन्न आयोजनों द्वारा इसे और संगठित किया जायेगा ताकि इसके संस्थापक डा. सूरज प्रकाश, जहाँ भी हों, आश्वस्त हों सकें कि जिस पौधे को उन्होंने लगाया था, आने वाली सन्ततियाँ उसे भली-भाँति सींच कर वट-वृक्ष तक पहुँचा रही हैं: नेह को बिरवा गयऊ लगाए। सींचन की सुधि लीजो, मुरझि न जाए।

चौपाई का दूसरा भाग है ‘ पर निन्दा ........ अधमाई’। इस पर जरा सकारात्मक दृष्टि से विचार किया जाए तो लगता है कि आलोचक (निन्दक) का साथ में होना भी जरूरी है क्योंकि वह व्यक्ति को सचेत रखता है, मनमानी नहीं करने देता। कबीर ने शायद इसीलिए कहा था: निन्दक नियरे राखिये, आँगन कुटि छवाए। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाए।। कार्य क्षेत्र में आगे बढ़ने वालों की आलोचना भी होती है, परन्तु स्वर्गीय पी.एल.राही जी के शब्द याद आते हैं ‘तुम अपना काम करते चलो, जब तक तुम्हारी सोच सकारात्मक है, आगे बढ़ते चलो’।

महाकवि तुलसी से बात आरम्भ हुई थी तो स्मरण हो आता है राम के प्रति उनका समर्पण (भारत विकास परिषद् का पंचम सूत्र): राम सो बड़ो है कौन, मोसों कौन छोटो। राम सो खरो है कौन, मोसो कौन खोटो।। इसी समर्पित भावना से हम 25 जुलाई को उनकी जयन्ती मनाएँगे।

वेद की ऋचा कहती है: ‘जीवेम् शरदः शतम्’ अर्थात् हे मनुष्य  तू सौ वर्ष तक जीवित रह। परन्तु कुछ  हस्तियाँ ऐसी भी होती है जिन्हें शायद प्रभु अपने पास जल्दी बुलाना चाहते हैं। अध्यात्म के क्षेत्र में स्वामी विवेकानन्द (पुण्यतिथि 4 जुलाई) और आजादी के दीवानों और सन् 1919 में जलियाँ वाला बाग, अमृतसर में हुए नर संहार के प्रणेता जनरल डायर को उनकी भाषा में पाठ पढ़ाने वाले सरदार ऊधम सिंह (पुण्यतिथि 31 जुलाई) ऐसे ही गौरव पुरुष थे जो अपने जीवन की अर्द्ध-शती भी पूरी नहीं कर पाए। भारत माँ के उन सपूतों को सारे भारत वासी श्रद्धावनत् हो स्मरण करते हैं।

पर्यावरण को सुरक्षित और शुचि बनाए रखने के लिए ‘हरियाली तीज’ (22.7) पर मातृ-शक्ति विभिन्न कार्यक्रम तो करेगी ही परन्तु किसी बालक के जीवन में आमूल परिवर्तन लाने वाले महान् पर्व ‘शिवरात्रि’ (17.7) की चर्चा भी आवश्यक है। त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु, महेश-में महेश अर्थात् शिव की पूजा उस रात्रि मंदिरों में हर्षोल्लास के साथ की जाएगी परन्तु मूलशंकर नाम के बालक को उस रात की एक घटना ने कैसे हिला दिया और सच्चे शिव की खोज के लिए घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया, यह सर्वविदित है। वही मूलशंकर दयानन्द बना और ‘आर्य समाज’ का संस्थापक भी।

ऐसा ही एक पर्व है गुरु पूर्णिमा जिसे वेदव्यास जयन्ती के नाम से भी अभिहित किया जाता है। उसी वेद-व्यास से ‘ व्यास-पीठ’ नामकरण हुआ जिसे गुरु-पूर्णिमा अर्थात् 3 जुलाई को पूजा-गृहों में विद्वान् वक्ताओं के प्रवचनों द्वारा मनाया जाएगा। ऐसे ही धार्मिक प्रवचनकर्ता स्वमी विवेकानन्द जब विश्व धर्म सम्मेलन की व्यास-पीठ से बोलने लगे, तो समस्त विश्व अवाक् रह गया।

अस्तु! ‘परोपकार करना ही जीवन है, और परोपकार न करना मृत्यु’ - स्वामी विवेकानन्द।                                                      - डा. धर्मवीर


August, 2012

भारत विकास परिषद् स्वर्ण जयन्ती
माननीय डॉ॰ सूरज प्रकाश द्वारा 1963 में स्थापित भारत विकास परिषद् सम्पर्क, सहयोग, संस्कार, सेवा और समर्पण के पांच सूत्रों का प्रयोग करते हुए एक विशाल वट वृक्ष का रूप धारण कर चुकी है। परिषद् ने एकात्म मानववाद अंगीकृत करते हुए सम्पर्क में आत्मीयता, सहयोग में एक और एक ग्यारह, सेवा में कर्त्तव्य भावना, समर्पण में तन, मन, धन की क्षमतानुसार क्रियाशीलता और दानशीलता एवं संस्कारों के स्थापन में ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनाः’’ का भाव निहित करते हुए सशक्त, समृद्ध व अखंड भारत के निर्माण की कल्पना को साकार करने का प्रयत्न किया है।

स्वतंत्र भारत में जन्मी लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या नवयुवक है। इतिहास में संजोये स्वतंत्रता संग्राम के बलिदान उनकी स्मृति में हैं। परम पूज्य डॉ॰ हेडगेवार जी कहते थे, ‘हमारे देश में बल, बुद्धि, धर्म, धन, संस्कृति किसी बात की कमी नहीं थी फिर भी देश पराधीन हुआ .....दुर्बलता महापाप है कोई भी समाज दुर्बल न रहे तो यह विश्व शान्तिपूर्वक चलेगा।’ युवा पीढ़ी इस सिद्धांत को समझ चुकी है और ‘जय विज्ञान’ की गूंज समाहित कर चुकी है। आधुनिक भारतीय शिक्षा ‘ज्ञान विज्ञान विमुक्तये’ और राष्ट्रीय सुरक्षा ‘बलस्य मूलम् विज्ञानम्’ के सिद्धांतों पर आधारित है। हम विश्व की सबसे बड़ी वैज्ञानिक और तकनीकी शक्तियों में से एक हैं। सूचना प्रौद्योगिकी की अग्रणी पंक्ति में हैं। नाभिकीय शक्ति से युक्त जल, थल और आकाश में हमारी उपस्थिति है और हम चन्द्रमा पर भी उतरने के लिए तैयार हैं।

युवा पीढ़ी दूरगामी योजनाओं के साथ अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ व स्थायी बनाते हुए आधुनिक भारत के निर्माण के लिए तत्परता से प्रयत्नशील है। औद्योगिकीकरण से पर्यावरण की भयावह स्थिति से भी अवगत है। प्राकृतिक दुर्घटनाओं से चिन्तित है और यह समझ रही है कि हम प्रकृति का उतना ही उपयोग करें जितनी हमें आवश्यकता है। सारांशतः हम ‘उतिष्ठत जाग्रत’ सिद्धांत को समझ सभी परिस्थितियों में राष्ट्र उत्थान के लिए दृढ़ संकल्प हैं।

यह निश्चित् है कि बिना विज्ञान एवं तकनीकी के गौरवमय भारत की स्थापना कठिन है। पर यह भी सत्य है कि भारतीय मूल्यों को अंगीकृत किए बिना हम अपनी पहचान नहीं बना सकते। अतः आज आवश्यकता है आधुनिक वैज्ञानिक युग के भारत के परिप्रेक्ष्य में परिषद् द्वारा 5 दशकों के सेवा व संस्कार के कार्यो की संख्यात्मक व गुणात्मक विश्लेषण की सही दिशा एवं मार्ग निश्चित् करने की और उस मार्ग पर पूरी तैयारी के साथ चलने की।

आइए, हम चिंतन करें कि समाज चेतना एवं राष्ट्र चेतना का भाव समाज में कहाँ तक स्थापित कर पाए। हमारा आचरण कहाँ तक अनुकरणीय बन पाया, हमारी विशिष्ट पहचान समाज ने कहाँ तक स्वीकार की। ‘नर सेवा-नारायण सेवा’ को कर्त्तव्य भावना से निर्वाहित करते हुए, समाज को संस्कार कार्यक्रमों के द्वारा कहाँ तक प्रभावित कर पाए। चिर भारतीय संस्कृति को पुनः स्थापित करने और भावी पीढ़ी के प्रेरणा स्रोत बनने में हम कहाँ तक पहुँचे। अनुशासन, निःस्वार्थ सेवा और त्याग भावना के मापदंडों में हमारी क्या स्थिति है, यह परिषद् के प्रत्येक सदस्य के लिए आत्म चिंतन व आत्म विश्लेषण का विषय है। आइए हम सब इन विषयों पर चिंतन एवं विचार विमर्श करें और उत्तिष्ठत जाग्रतय् की कल्पना को साकार करें।

 - सत्य प्रकाश तिवारी, राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष


 

September, 2012

Editorial
Come September, and the entire Nation remembers with great respect and pride a Robust, Charming and Towering personality in Dr. Sarvapalli Radhakrishnan on 5th September. Dr. S. Radhakrishnan, Philosopher, an active Statesman, a Political thinker, Educationist and Religious thinker of high order was one of those few persons who equally distinguished themselves in the various fields of knowledge. 

This man with white turban, white achkan and white churidar pajama  was India’s Ambassador to the USSR from 1949-1952. Even Marshal Stalin, as a mark of respect, exchanged caps with him. He was elected the Vice President of Bharat and Chairman of the Rajya Sabha in 1952. It was his distinguished role in that office when the Nation accorded him the highest recognition by electing him the President of Bharat in 1961. As India’s FIRST CITIZEN, wherever he went to spread the message of peace and friendship, he was given profuse welcome.

Dr. Radha Krishanan was also the FIRST recipient to be decorated with the coveted highest award of Bharat Ratna  in 1954.

As a religious thinker Dr. Radhakrishnan has written a large number of books but ‘The Hindu view of Life’ ‘East and West’ and ‘Religion & culture’ are read by millions. ‘Religion is not magic or witchcraft, quackery or superstition, xxx Religion is fulfillment of man’s life, an experience in which every aspect of his being is raised to its highest extent’.

Swami Vivekanand in Bhagwa attire also roamed about preaching the in-depths of Hindu Philosophy when at last he got a rousing applause at the Parliament of Religions held at Chicago.

He has his own views about Religion: मैं एक ऐसे धर्म का प्रचार करना चाहता हूँ, जो सब प्रकार की मानसिक अवस्था वाले लोगों के लिए उपयोगी हो;  इसमें ज्ञान, भक्ति, योग और कर्म समभाव से रहेंगे।

His 150th Birth Anniversary is slated to be widely observed in January 2013. BVP is also girding its lions for this event of high magnitude.

Both these Philosophers need to be read and followed profusely by the present youth.

Dr. Radhakrishnan B’day is also observed as शिक्षक दिवस (Teacher’s Day) as he himself was a teacher par-excellence. BVP also holds GVCA programme on being inspired by him. A Guru (teacher) can be of great help in molding the lives of his disciples - 'गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः' GVCA has become very popular amongst the younger generation. Let us, therefore, follow the foot steps of our great teacher.  -         D.V. Sethi


 
October, 2012

हम कौन थे, क्या हो गए
भारत-भू ने सदियों से न जाने कितने ऋषियों-मुनियों, साधु-संन्यासियों, स्वामियों-सेवकों, महात्माओं, लाल-बाल-पाल, महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, महारानी लक्ष्मी बाई, राम, कृष्ण धर्मों-सम्प्रदायों, राष्ट्र पर मर मिटने वाले वीरों-वीरांगनाओं को जन्म दिया और उन्होंने अपने सुकृत्यों से जहाँ राष्ट्रधर्म को निभाया वहीं राष्ट्रीय-अस्मिता का परचम भी देश-विदेश में लहराया। परन्तु हमारे राज-नेताओं ने क्या उनके आदर्शों का सही रूप से अनुपालन किया। यह प्रश्न आज भी जीवन्त बना हुआ है। जिस मोहन दास करमचन्द गाँधी (2.10) को देश ने बड़े प्यार से ‘बापू’ और ‘महात्मा’ के नाम से अभिहित किया, उन्हें मात्र उनकी समाधि पर वर्ष में दो बार फूल माला चढ़ा कर स्मरण किया जाता हैं। उनके द्वारा प्रचारित-प्रसारित विचारों की महत्ता तो जैसे धूल-धूसरित हो गई! कहाँ गई उनकी अहिंसा (अहिंसा परमो धर्मः) और शान्ति की शिक्षा। आज हिंसा का बोल-बाला चारों ओर दिखाई देता है। हाँ! एक बात जरूर की गई। उन्हें कागज के नोटों और कहीं-कहीं धातु की Currency  पर अवश्य सजा दिया गया। जिसने राष्ट्र को स्वाधीनता की गरिमा प्रदान की, आज उसकी शिक्षाओं को नगण्य रूप से ही अपनाया जाता है। कैसी विडम्बना है। देश की नवीनतम परिस्थितियों के बारे में उन्होंने कहा थाः ‘मुझे यदि कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हुआ तो सबसे पहले धर्मान्तरण को प्रतिबन्धित करूंगा।’ (1935)

एक अन्य महामानव की चर्चा करें। ‘जय जवान जय किसान’ का उद्घोष करने वाले (लाल) बहादुर शास्त्री (2.10) भी मात्र दो अवसरों पर ही स्मरण किए जाते हैं। यदि उनकी विचारधारा को अपनाया जाता तो न तो जवानों में असन्तुष्टि दिखाई पड़ती और न अन्न प्रदाता किसान आत्म हत्या के लिए विवश होता। जिसने अपने स्वयं का उदाहरण (उपवास रखने का) प्रस्तुत किया हो ऐसे महापुरुष की संदिग्ध  हालात में मृत्यु न जाने कितने प्रश्नों को आज भी अनुत्तरित ही रहने देती है। काश! हम महापुरुषों के बताए और सुझाए मार्ग का, निजी स्वार्थ का परित्याग कर, अनुसरण कर पाते।

भारत सरकार का ध्येय वाक्य है ‘सत्यमेव जयते’ जो तीन शेरों की मूर्ति के नीचे न्यायाधीश की पीठ के पीछे भी लिखा मिलता हैं। परन्तु वास्तविकता इसके विपरीत बन चुकी है। ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का मुहावरा सब जगह चरितार्थ होता दिखाई पड़ता है।

परन्तु राम-कृष्ण का उदाहरण देते हुए आज भी विजय दशमी (दशहरा) (24.10) का पर्व ‘असत्य पर सत्य की विजय’ का ही पाठ पढ़ाता है। प्रति वर्ष इस पर्व का भव्य आयोजन एवं मंचन किया जाता है, करोड़ों की धन-राशि व्यय की जाती है परन्तु क्या हम अपने आदर्श राम के जीवन से एक भी बात अपने जीवन में उतार पाए हैं। यदि ऐसा होता तो परिवारों का विघटन न हो पाता। पर्व का अभिप्राय है जोड़ना (सकारात्मक दृष्टिकोण) न कि तोड़ना (नकारात्मक चिन्तन)। जिस वाल्मीकि (29.10) ने ‘राम-राम-राम-राम’ रटते हुए कवियों की शृंखला में प्रथम स्थान प्राप्त किया, उसी ने संस्कृत भाषा में ‘रामायण’ की रचना कर समाज को एक अद्भूत महाकाव्य प्रदान किया। इस एक ‘राम’ शब्द ने उसके जीवन में आमूल परिवर्तन ला दिया।

इस राम महिमा का वर्णन करते हुए (देहरी दीप न्याय) के अनुसार ‘॰मानस रचयिता’ गोस्वामी तुलसीदास ने ठीक ही कहा थाः

राम नाम मणि दीप धरऊ जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहिरऊ जो चहसि उजियार।।

महात्मा गाँधी ने भी तो अन्तिम शब्द यही कहे थे। ‘हे राम!’

समय है स्वार्थ से ऊपर उठ कर कार्य करने का, राष्ट्रीय उत्थान की भावना से ओत-प्रोत होने का, क्योंकि यदि राष्ट्र है तो मैं हूँ न कि याद मैं हूँ तो राष्ट्र है। जिस दौर से आज देश गुजर रहा है, भारत विकास परिषद् के प्रत्येक सदस्य को भी चिन्तन करना होगा कि हमारी दिशा क्या होनी चाहिए।

परिषद् अपने कार्यक्रमों ‘भारत को जानो’ ‘समूहगान प्रतियोगिता’, ‘ग्राम विकास’ और अन्य सेवा कार्यों के माध्यम से यही प्रयत्न  करती है कि भावी पीढ़ी में किसी भी प्रकार से अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम एवं आत्मीयता की भावना जागृत हो सके। निःस्वार्थ भाव से हम सबको इन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु इस 2012-13 के विशिष्ट वर्ष में एक जुट हो क्रियाशील हो जाना होगा, यही समय की मांग है।   - डॉ. धर्मवीर सेठी


November, 2012

नानक दुःखिया सब संसार
प्रायः ऐसा कहा जाता है कि इस धरा पर कुछ शख्सीयतें (व्यक्तित्व) ऐसी हुई हैं जिन्हें प्रभु का वरदान प्राप्त था और वह भविष्य द्रष्टा थे। मैं मानता हूँ कि उनमें एक ऐसा व्यक्तित्व नानक चन्द (गुरु) (जयन्ती 28.11) का भी रहा होगा। कितना सत्य कहा हैः किसी को धन के कारण, किसी को पदोन्नति, किसी को गाड़ी-बंगला न होने अर्थात् किसी न किसी प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्त करने की लालसा होने के कारण निरन्तर दुःखी जीवन व्यतीत करना पड़ता है। समाचार पत्र से ऐसी दूषित मानसिकता का बोध निरन्तर होता रहता है।

पारस्परिक सम्बन्धों की महत्ता, पवित्रता और कद्र तो रह ही नहीं गई। माता-पिता-पुत्र-पुत्री-बहु-बेटी-सास-ससु के रिश्ते किसी अन्धे प्रेम के कारण अथवा पैसे की लालसा के कारण धराशायी से हो गए हैं। मुँह से अचानक निकल पड़ता है, ‘कैसा जमाना आ गया है’ ‘नरक नहीं यह पृथ्वी महा नरक बन गई है’, या फिर ‘महाकलियुग में हम विचर रहे हैं।’ अन्तर्मन से सोचा जाए तो कितनी सच्चाई है इन शब्दों में। आज तो कुर्सी प्राप्ति के लिए अपने प्रतिद्वन्द्वी पर न जाने कितने लाँछन लगाने में कोई भी पीछे नहीं रहता। येन-केन-प्रकारेण सत्ता हथियानी है। एक विद्वान् ने राजनीति की ठीक ही परिभाषा दी हैः % 'Politics is the last resort of a scoundrel'

इन सब व्यवस्थाओं का शायद हमारे महापुरुषों को पहले से ही संज्ञान हो चुका था। तभी तो कहा था ‘नानक दुःखिया सब संसार’। अरे भाई! इन शब्दों से ही सीख ही ले ली होती-‘मुटठी बांध के आए थे, हाथ पसारे जाओगे’ तो भी कुछ राहत मिल जाती। परन्तु महाज्ञानी रावण पर भी जब मदान्धता हावी हो गई तो छद्मवेष में सीता का अपहरण करने में भी उसे कुछ पाप नहीं लगा और उसका परिणाम-प्रथम धनुषधारी राम (चन्द्र) की लीलाएँ और अन्त में उस महाभिमानी दशसिरों वाले अर्थात् महाज्ञानी परन्तु अभिमानी का हरण (हरण-नाश-दशहरा)। यही प्रकृति का नियम है-यही चक्र है, कभी उत्थान कभी पतन। सुख, दुःख तो आते ही रहेंगे। इसीलिए किसी ने सत्य ही कहा हैः

मैं नहीं चाहता सिर सुख। मैं नहीं चाहता सिर दुःख। जीवन तो सुख दुःख का संगम

प्रत्येक मानव को इस परिस्थिति का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए और जब ऐसी मानसिकता बन जाएगी तब मन रूपी मन्दिर में सकारतामक (Positive) सोच के दीप जलेंगे-दीपोत्सव होगा। भाविप की संरक्षिका स्व॰ कवयित्री महादेवी वर्मा की वाणी में मधुर-मधुर मेरे दीपक जल। प्रियतम का पथ आलोकित कर।।

और वह (प्रियतम) राम जो, अयोध्या वापिस लौटे तो सर्वत्र सजाई गई दीपों की पंक्ति-दीपावली (13.11)। प्रकाश ही प्रकाश, अध्यात्म की दृष्टि से ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ -हे प्रभु! मुझे अज्ञान रूपी अन्धकार से ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर ले चलो।

वस्तुतः भारतीय संस्कृति के यही तो तीन आयाम हैं: असतो मा सद्गमय (असत्य से सत्य की ओर), तमसो मा ज्योतिर्गमय (अन्धकार से प्रकाश की ओर) और मृत्योर्मा अमृतं गमय (मृत्यु से अमरत्व की ओर)। मानव जीवन का कोई भी ऐसा पहलू नहीं जो इन तीनों उद्घोषों से अछूता रह सके।

और जब अपनी शरण में आए कश्मीरी पण्डितों की गुहार पर, कि आततायि से उनकी प्राण रक्षा की जाए, तो ‘तिलक जंजू रखा’ गुरु तेगबहादुर ने ‘सवा लाख से एक लड़ाऊँ’ कहते हुए अपने पुत्रों के साथ बलिदान दे दिए (24.11) तो वह वस्तुतः अमर हो गए। शरणागत की रक्षा का इससे उदात्त उदाहरण क्या हो सकता है। विभिन्न क्षेत्रों से उपलब्ध हमारे पूर्वजों की यश-गाथाएँ वस्तुतः हमारे लिए प्रेरणादायक होती हैं परन्तु, न जाने क्यों, आधुनिक परिवेश में पलने-बढ़ने वाली सन्तति उनसे कुछ सीखना नहीं चाहती-यह दुर्भाग्य की बात है। ‘भारत को जानो’ और ‘राष्ट्रीय समूहगान प्रतियोगिताओं’ के माध्यम से युवाओं में राष्ट्र प्रेम/धर्म को जगाने की दिशा में भाविप का प्रयास स्तुत्य है। परन्तु अब भी इस दिशा में और अधिक करने की आवश्यकता है।

ऊपर तो संस्कार सम्बन्धित कार्यक्रमों की चर्चा की गई है। सेवा के क्षेत्र में भी भाविप का सराहनीय योगदान रहा है। नवम्बर मास में केनेडा के (भारतीय मूल से जुड़े) डॉ॰ शिव जिन्दल और श्रीमती सरिता जिन्दल के भारत आगमन पर समस्त भाविप परिवार उनका स्वागत और अभिनन्दन करता है। लगभग 20 भारतीय गाँवों के सर्व प्रकारेण काया-कल्प का जो बीड़ा परिषद् के साथ मिलकर उन्होंने उठाया है और जिस द्रुतगति से वहाँ गाँवों में समग्र-ग्राम विकास योजना के अन्तर्गत उनका जीर्णोद्धार हो रहा है, वह स्तुत्य ही नहीं अनुकरणीय भी है। हमारी तो परमपिता परमात्मा से सदा यही प्रार्थना रहेगी कि इस दम्पति को सेवा के इस कार्य को सम्पन्न करने में और अधिक सामर्थ्य और शक्ति प्रदान करे।

भारतीय दर्शन पत्नी को वामांगी कहता है, अर्द्धनारीश्वर की यही परिकल्पना है। वही पत्नियाँ अपने पतियों के कल्याणार्थ ‘करवा चौथ (2.11) के दिन व्रत रखती हुई शपथ लेती’ है कि पति स्वस्थ आयु व्यतीत करें। Husband शब्द संस्कृत के ‘हस्त-बन्ध’ से ही तो उद्भूत है।

बाल समुदाय की जो ऊपर चर्चा की गई है वह भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु को ‘चाचा नेहरु’ कह कर पुकारते थे। बस नेहरु जन्म दिवस (14.11) बाल दिवस बन गया। अपेक्षा इतनी ही है कि माटी के उन कच्चे घड़ों को सही ढंग से संवारा जाए।

मैंने अपनी बात गुरुनानक की पंक्ति ‘नानक दुःखिया सब संसार’ से की थी। उन्हीं की दूसरी पंक्ति ‘सोई सुखी जो नाम आधार’ अर्थात् जिस व्यक्ति ने उस प्रभु के नाम का अन्तस्तल से सुमिरन करना आरम्भ कर दिया है वही सुखी रहेगा-से अन्त करना चाहता हूँ। कितना उद्भूत निदान है बीमारी का। ‘इक ओंकार,’ एक ‘ओ३म्’ शब्द का निरन्तर ध्यान और उच्चारण करते रहो। भारत के सभी पर्व यही संदेश देते है। ‘एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति’                                    - डॉ॰ धर्मवीर सेठी


December,2012

नारी सशक्तिकरण
नारी प्रकृति का स्वरूप है, सृष्टि की सुन्दरता को परमात्मा ने नारी के भावों में ढाल दिया है। उसकी आत्मा में प्रेमत्व है। उसी से समस्त भावों का निर्माण होता है। नारी को जिस तरह से आज आकर्षण के जाल में फंसाकर कैद किया जा रहा है, यह चिन्तन का विषय है।

हमारी संस्कृति ‘मातृदेवो भव’ की रही है। नारी का सबसे बड़ा महत्त्व उसके ‘माँ’ होने में है। यदि ‘माँ’ नहीं होती तो ऐसी कौन सी शक्ति होती जो हमें अनीति के विरुद्ध लड़ना सिखाती? ‘माँ’ ही है, जो हमें यह सिखाती है कि कहाँ डरना है और कहाँ नहीं डरना। माता के संस्कार, भावनाओं और जिज्ञासाओं के कारण ही इस भूमि पर वीर, वैज्ञानिक, प्रचण्ड विद्वान, साहित्यकार, दार्शनिक, महात्मा और मनीषी अवतरित हुए हैं।

सतयुग में माता अनुसूइया, गार्गी, मैत्रेयी, शतरूपा, अहिल्या, मदालसा जैसी ऋषि पत्नियों ने ज्ञान के विस्तार में पतियों का साथ दिया है। हमारे देश में झाँसी की रानी, रानी दुर्गावती जैसी अनेक वीरांगनाएँ भी हुई हैं जिन्होंने क्षत्रिय धर्म का पालन करने हेतु अपने हाथों में तलवार उठाई। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि नारी पुरुष के कार्यों में मंत्री की तरह सलाह देनेवाली, सेवा में दासी, धर्म और क्षमा को धारण करने वाली, पृथ्वी के समान, छः गुणों से युक्त यह विश्व की दुर्लभ कृति है।

परमात्मा तो हमें जीवन देता है और ‘माँ’ हमें जीने के योग्य बनाती है। इस दिव्य शक्ति का शोषण और उपहास कर इसे नष्ट कर यदि हम सुखमय जीवन जीने की कामना करते हैं, तो व्यर्थ है। जब नारी क्रोधित होती है तो रणचण्डी, दुर्गा, महिषासुरमर्दिनी की भूमिका में हमें दिखाई देती है। सीता के रूप में आई थी तो समूचा रावण वंश नष्ट हुआ, द्रौपदी के रूप में आई तो कौरव वंश के नष्ट होने का कारण बनी। उसका अपमान वंश के नाश का प्रमाण है। स्त्री कर्म योग की प्रतिमूर्ति है। उसकी स्वतंत्र इच्छा नहीं होती। उसकी सर्वस्व इच्छा अपने परिवार के लिए होती है। पति और बच्चों को जो अच्छा लगे वही वस्त्र वह पहनती है। उसका पढ़ना, गुनगुनाना भी बच्चों की छोटी-छोटी खुशियों पर होता है। सेवा-भाव के साथ-साथ सहनशीलता, उदारता, त्याग, क्षमा, धर्म के अनुसार नियम, सहिष्णुता जैसे अनेक गुण उसमें होते हैं। वर्तमान परिवेश में नारी सशक्तिकरण की अवश्यकता है। समाज में आदर्श नागरिकता बढ़ाने के लिए नारी शिक्षा, कन्या भ्रूण संरक्षण जैसे सामाजिक विकास के लिए हम संलग्न हैं।

भारत विकास परिषद् में नारी एक विशेष भूमिका निभा रही है। वह राष्ट्रीय स्तर पर, क्षेत्र में, प्रान्त में एवं शाखा स्तर पर भी विभिन्न पदों पर कार्यरत रहकर अपना योगदान दे रही हैं। अपने संस्कार एवं सेवा के कार्य तो वह बहुत ही बखूबी से सम्पन्न कर रही हैं। उनकी कार्य क्षमता एवं उत्साह को देखते हुए ‘राष्ट्रीय महिला कार्यकर्ता’ कार्यशाला का आयोजन 7 अक्टूबर 2012 को फरीदाबाद (हरियाणा) में सम्पन्न हुआ। इसमें 26 प्रान्तों से विभिन्न स्तर की 398 महिलाओं ने भाग लिया और उनकी अपने कर्तव्य एवं अधिकारों पर चर्चा हुई एवं निर्णय भी लिए गए। कार्यशाला में राष्ट्रीय अध्यक्ष ने एवं मुख्य अतिथि श्रीमती सुमित्रा महाजन, राष्ट्रीय चेयरपर्सन प्रकल्प डा॰ अजित गुप्ता, राष्ट्रीय मंत्री प्रकल्प श्रीमती अर्चना सिंहल आदि ने, बहुत से कार्य जो केवल महिलायें ही कर सकती हैं और उसमें पहल भी अनिवार्य है, पर विस्तार से चर्चा की। अपने-अपने क्षेत्र में महिलायें अत्यधिक सक्रिय हों, इसका आह्नान किया गया।

हमें पूर्ण विश्वास है कि यह कार्यशाला बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुई होगी जिससे महिलायें और अधिक सक्रिय होकर परिषद् के उद्देश्यों को सार्थक करेंगी। कार्यशाला की सम्पूर्ण व्यवस्था एवं आतिथ्य हरियाणा दक्षिण प्रान्त की औद्योगिक नगरी फरीदाबाद की सभी शाखाओं ने बखूबी सफलता पूवर्क निभाई, इसके लिए उन्हें बहुत-बहुत बधाई।     -सुरेन्द्र कुमार वधवा, रा॰ महामन्त्री

 

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