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                                    Niti Editorials : 2011
January हम करें राष्ट्र अराधन
February सा विद्या या विमुक्तये
March कर्त्तव्य्य-पथ अग्रसर रहें
April नव संवत्सर मंगलमय भवतु
May हमारे पुरोधा
June अति सर्वत्र वर्जयेत्
July जागो फिर एक बार
August Salute thy Motherland
September श्री गुरुचरण सरोज-रज, निज मन-मुकुर सुधार
October हमारी विरासत
November Village : Replica of real Bharat
December vision 2013

 

January, 2011

हम करें राष्ट्र अराधन
भा॰वि॰प॰ द्वारा प्रकाशित ‘चेतना के स्वर’ गीत-संग्रह के पृष्ठ 3 पर प्रकाशित गीत की वाद्य-यन्त्रों के साथ स्कूली बच्चों द्वारा जब सस्वर प्रस्तुति की जाती है, तो श्रोता का रोमांचित एवं भाव विभोर होना स्वाभाविक है। वस्तुतः इस गीत के बोल ही ऐसे हैं।

और जनवरी मास के गणतन्त्र दिवस (26.1) के प्रसंग में तो इस गीत का महत्व और भी द्विगुणित हो जाता है। जन मानस को गणतन्त्रीय राष्ट्र की प्रकृति का बोध कराया जाता है। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान जब लागू हुआ तो उसमें लिखा था "We the people... " इत्यादि। और Democracy (गणतन्त्र) की परिभाषा दी गई 'Govt. of the people, by the people and for the people.' परन्तु वाह रे भारतीय नेतृत्व! तुम्हारी स्वार्थपरता की तो अति ही हो गई। दिशा ही बदल गई "Govt off the people, buy people and far the people" बन कर रह गई। और नानाविध घोटालों के इस भयंकर चक्रव्यूह में क्षात्रधर्म (अर्जुन) का केन्द्रीय जाँच ब्यूरो (वीर अभिमन्यु) न जाने कहाँ खो गया। वह उस में पैठना तो जानता था परन्तु उससे निकलना अर्थात् उस का प्रतिफल नहीं। बिल्कुल यही स्थिति सरकारी तन्त्र की है। कितनी भी प्रभारी जाँच समितियाँ बना लो परन्तु परिणाम शून्य। कौन सा क्षेत्र बचा है जहाँ घोटाला नज़र नहीं आता।

वस्तुतः हम इतने स्वार्थान्ध हो गए हैं कि अपनी सांस्कृतिक धरोहर की हमें चिन्ता ही नहीं। वेदों के सत्य मार्ग से भटक गए हैं। यजुर्वेद (22/22) में जो वैदिक राष्ट्रीय प्रार्थना दी गई है, यदि सरकार के विभिन्न घटक उस पर थोड़ा भी अमल करें तो अनेकों राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान मिल सकता है। उन वेद मन्त्रों का हिन्दी पद्यानुवाद प्रस्तुत हैः

                                             ब्रह्मन! स्वराष्ट्र में हों, द्विज ब्रह्म तेजधारी।         क्षत्रिय महारथी हों, अरिदल विनाशकारी।।
                                             होवें दुधारू गौवें, पशु अश्व आशु वाही।          आधार राष्ट्र की हों, नारी सुभग सदा ही।।
                                             बलवान सभ्य योद्धा, यजमान पुत्र होवें।          इन्छानुसार वर्षें पर्जन्य ताप धोवें।।
                                             फल-फूल से लदी हों, औषध अमोघ सारी।        हो योग-क्षेमकारी, स्वाधीनता हमारी।।

ब्रह्म तेज, क्षात्र-तेज, गौ (माता) की रक्षा, पशुओं के प्रति उदारता, नारी शक्ति का आह्नान, आज्ञाकारी सन्तति, समयानुसार वर्षा, वनस्पतियों की प्रचुरता इत्यादि किस चीज की कामना नहीं की गई। और अन्त में क्या कहा गया कि हमारी स्वाधीनता ‘योग क्षेमकारी’ हो - योग अर्थात् अप्राप्तस्य प्राप्तिः’ और क्षेम अर्थात् प्राप्तस्य रक्षणम्। परन्तु आए दिन भारत के विभिन्न भागों से अलगाववादी स्वर सुनाई देते रहते हैं। हम सभी को इन विकट परिस्थितियों से जूझना है और वह तभी सम्भव होगा जब भारतवासी अपनी संगठन शक्ति का परिचय देंगे।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस (23.1) ने कहा था ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दिलवाऊँगा’। आजादी तो मिल गई परन्तु रक्षा की जिम्मेदारी भी तो हम सब की है। लाला लाजपत राय (28.1) ने भी तो इसी आजादी के लिए अपने जीवन की आहुति दी थी और स्वामी विवेकानन्द (25.1) ने भारत के परचम को शिकागो की धर्मसभा में लहराया था। आज के युवक को इन सभी महान् आत्माओं से प्रेरणा लेनी चाहिए।

वस्तुतः इसी उद्देश्य से भारत विकास परिषद् राष्ट्रीय समूहगान एवं भारत को जानो आदि बहुचर्चित प्रतियोगिताओं का आयोजन पिछले कई वर्षों से करती चली आ रही है। इस सभी स्पर्धाओं में भारत की भावी-युवा पीढ़ी का उत्साह देखने को बनता है।
आइये! अपने राष्ट्र की प्रभुसत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए पुनः कृत्संकल्प हों और उस गीत को गणतन्त्र दिवस पर समवेत स्वर से गाएँ-

हम करें राष्ट्र आराधन। हम करें राष्ट्र अभिवादन।
हम करें राष्ट्र का अर्चन। हम करें राष्ट्र का चिंतन।
अपना तन-मन-धन देकर।
हम करें पुनः संस्थापन।।

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February, 2011

सा विद्या या विमुक्तये
कितनी सुन्दर परिभाषा है विद्या की, ज्ञान की। ज्ञान वही उत्तम है जिससे मानव के अन्तस की नकारात्मक वृत्तियाँ शान्त होकर सकारात्मक एवं उदात्त भावनाएँ जागृत हों, जिससे पाप-वृत्ति का समूल ह्रास हो। इसीलिए तो भारतीय जन-मानस हंसवाहिनी, वीणा वादिनी विद्या की देवी सरस्वती का आह्नान करते हुए उसकी जयन्ती (8.2) पर समवेत स्वर में गाएगाः

हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी अंब विमल मति दे।
जग-सिर मौर बनाएँ भारत, वह बल विक्रम दे।।
साहस शील हृदय में भर दे, जीवन त्याग तयोमय कर दे।
संयम सत्य स्नेह का भर दे, स्वाभिमान भर दे।।
और
या देवी सर्वभूतेषु विद्या रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

ज्ञान भी दो प्रकार का होता है-पुस्तकीय एवं अनुभूतिजन्य। महात्मा कबीर ने कितनी स्टीक बात कही थी।:

मैं कहता आँखिन की देखी, तू कहता है कागद लेखी।
मैं कहता सुरझावन हारी, तू रहता अरुझाई रे।।

इस उक्ति में टीस भी है और मार्मिकता भी। माँ सरस्वती से ‘विमल मति’ की कामना की गई है क्यों कि ‘बुद्धि नाशात् प्रणश्यति’ (0 गीता) और ‘ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः। और इसी सत्य-ज्ञान का अन्वेषण करने हेतु ही शायद मूलशंकर (स्वामी दयानन्द सरस्वती) (27.2) का जन्म हुआ था जिनकी लेखनी से आगे चलकर ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना हुई। यह सब अनुभव जन्य ज्ञान पर आधृत था। भटके हुए मानव को सही मार्ग दिखाने का प्रयास।

फरवरी मास में प्रकृति में चारों ओर वासन्ती आभा (8.2) देखने को मिलती है। इस अवसर पर ‘वीरों का कैसा हो वसन्त’ कविता की पंक्तियाँ गुनगुनाने का मन करता है-

पीली सरसों ने दिया रंग। वसु वसुधा पुलकित अंग-अंग।।
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग। है वीर वेष में किन्तु कंत।।
वीरों का कैसा हो वसन्त।

खेतों में बिखरी हुई पीली सरसों का दृश्य आह्लादकारी होता है।

कवि की बात चली तो संस्कृत के महाकवि माघ (18.2) का स्मरण भी हो आता है। ‘शिशुपाल वध’ महाकाव्य में उसकी लेखनी द्वारा संस्कृत के तीन महाकवियों की भाषा और शैली गत तीनों विशेषताएँ एक ही स्थान पर निहित दिखाई देती हैं:

उपमा कालिदासस्य, भारवेः अर्थ गौरवम्।।
                                                                 दण्डिनः पदलालित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणः।।
                      बड़ी प्रसिद्ध उक्ति है।

स्नेही समाज के रामचरण जी (17.2) और सिक्ख सम्प्रदाय के दस गुरुओं में गुरु हरिराय (16.2) के प्रकाशोत्सव पर हम उन्हें नमन् करते हैं। वस्तुतः इन धार्मिक गुरुओं ने सदा ही समाज को कल्याण मार्ग का पथिक बनाने की निरन्तर प्रेरणा दी और उत्साहित भी किया। समर्थ गुरु रामदास (26.2) ने तो शिवाजी को सच्चे अर्थों में वीर शिवा बना ही दिया था।

भारत विकास परिषद् का सर्वदा यही उद्देश्य और प्रयास रहता है कि अपने संस्कार प्रेरक प्रकल्पों के माध्यम से युवा पीढ़ी को न केवल संस्कारवान बनाया जाए अपितुः अपने गौरवमय इतिहास, महापुरुषों, घटनाओं, अन्तर्कथाओं का परिचय कराते हुए अनुप्रेरित भी किया जाए।

समय-समय पर अपने महापुरुषों की जयन्तियाँ उनके जीवन और कृत्यों से कुछ सीख लेने के लिए हमें स्मरण कराती हैं। क्योंकि प्रत्येक महान् आत्मा किसी न किसी रूप से अनुकरणीय अवश्य होती है। किसी कवि ने ठीक ही कहा है-

तुम समय की रेत पर छोड़ते चलो निशाँ।
देखती तुम्हें ज़मीं, देखता है आसमाँ।।


March, 2011

कर्त्तव्य्य-पथ अग्रसर रहें
भारत विकास परिषद् के मुखपत्र ‘नीति’ के मार्च अक्ङ के साथ वित्त वर्ष 2010-11 का भी अन्त हो रहा है। प्रदेश और शाखा पदाधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे परिषद् के संविधान और नियमों के अनुरूप अपने प्रदेश और शाखा के लेखानुदानों को सही समय तक पूरा करने का प्रयास करेंगे और जहाँ आडिट की आवश्यकता होगी, वह भी करवा लिया जाएगा। ध्यान रहे यह एक पावन दायित्व है जिसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसका लाभ यह होगा कि वर्ष 2011-12 के पदाधिकारी अपने प्रकल्पों से सम्बन्धित बजट आसानी से बना सकेंगे।

प्रिय सदस्य-दम्पतियों और अन्य पाठकों को याद कराना चाहूँगा कि परिषद् के शीर्ष राष्ट्रीय अधिकारियों ने ‘‘विज़न 2013’’ की घोषणा काफी समय पहले से की हुई है। उसके अन्तर्गत शाखाओं, शाखा सदस्यों, विकास रत्नों, विकास मित्रों की संख्या में वृद्धि का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। उस लक्ष्य को पूरा करने का प्रयास तो हमें करना ही चाहिए। इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जहाँ परिषद् अपने अस्तित्व की अर्द्धशती पूरी कर रहा है वहाँ परिषद् के आराध्य स्वामी विवेकानन्द की 150वीं जयन्ती भी वर्ष 2013 में ही काफी बड़े पैमाने पर देश-विदेश में मनाए जाने की योजनाएँ बनाई जा रही हैं। परिषद् का शीर्ष नेतृत्व भी इस सम्बन्ध में विभिन्न कार्यक्रमों की एक सूची बना रहा है जिसकी विस्तृत जानकारी आगामी अंक्ङों में आप तक पहुँचाई जाएगी। उन सभी कार्यक्रमों को कुशलता पूर्वक संचालित कर भव्यता से आयोजित किया जाए, ऐसा आग्रह रहेगा। तब तक सभी प्रान्तीय एवं शाखा पदाधिकारियों से निवेदन है कि वह निम्नलिखित जानकारी केन्द्रीय कार्यालय को यथाशीघ्र भेजें:-

1. यदि आपने विवेकानन्द जी की प्रतिमा प्रतिष्ठापित की है तो:-

(क) स्थान का नाम, (ख) कब स्थापित की (दिनांक), (ग) उद्घाटनकर्ता का नाम, (घ) उसका फोटो

स्वामी विवेकानन्द के गुरु रामकृष्ण परमहंस की जयन्ती भी 6 मार्च को मनाई जा रही है। गुरु की अपने अन्तेवासी शिष्य के प्रति आत्मीयता की पराकाष्ठा इन शब्दों से व्यक्त होती है:

"Oh Naren (later Swami Vivekanand), today I have given you my all and have become a fakir, a penniless beggar. By the force to the power transmitted by me, great things will be done by you; only after that will you go to whence you came"

स्वामी विवेकानन्द ने देश-विदेश में अपने भाषणों/प्रवचनों में ऋग्वेद की ऋचा को हमेशा दुहरायाः ‘एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति’ -God is one, though wise men speak of Him in different ways

उसी सत्य की आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने भी वैदिक मंत्रों द्वारा बार-बार पुष्टि की थी। देश उस महापुरुष की 2 मार्च को महाशिवरात्रि के रूप में बोधरात्रि मना रहा है। ‘सच्चे शिव की खोज’ का उद्देश्य लेकर वह संन्यासी सांसारिक आकर्षणों का परित्याग कर एक सच्चे गुरु की खोज में निकल पड़ा था और उसे भी रामकृष्ण की तरह विरजानन्द (प्रज्ञाचक्षु) के रूप में गुरु मिला जिसकी प्रेरणा और सच्चे अध्यात्म चिन्तन से ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना हुई।

सन्तों, महात्माओं और संन्यासियों की परम्परा में भला ‘मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई’ गाने वाली कृष्ण के प्रेम रंग में सराबोर कवयित्री मीरा को कैसे विस्मृत कर सकते हैं। 23 मार्च को उनकी जयन्ती जो है।

रंगों कर बात चली तो बरसाने की होली की चर्चा तो होनी ही चाहिए। वैसे आनन्दपुर साहब का होला मेला भी अति प्रसिद्ध है। रंगों का यह त्योहार, परस्पर भाईचारे को और सुदृढ़ करने के लिए, देशवासी 19-20 मार्च को मनाएंगे। यह पर्व सबके लिए मंगलमय हो यही कामना है।

विदेशी आक्रान्ताओं से भारत-माँ को मुक्त कराने के लिए स्वयं फाँसी के फन्दे को चूमने वाले सुखदेव और राजगुरु को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब सब देशवासी 23 मार्च को देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने की शपथ लें।

समय आ गया है जब हम सबको उठना है, जागना है और अपने कर्त्तव्य्य  का भली प्रकार निर्वाह करना है।


April, 2011

नव संवत्सर मंगलमय भवतु

अप्रैल 2011 से आरम्भ होने वाले वित्तीय वर्ष में अगामी दो वर्षो के लिये परिषद् की नई अखिल भारतीय टीम का चयन हो चुका है, जो पाठकों को राष्ट्रीय शासी मंडल (एन॰जी॰बी॰) मार्च 2011 की ‘नीति’ द्वारा अवगत करा दिया गया है।

नव संवत्सर की पुण्य बेला पर, आप के अपने परिवार, समाज, राष्ट्र तथा मानव मात्र की परमेश्वर से मंगल कामना करते है। सभी स्वस्थ एवं सुखी हो, संवत्सर सभी के लिए कल्याणकारी हो। जल, वायु, पृथ्वी और आकाश वनस्पतियाँ एवं देवगण, दसों दिशाओं से शान्ति, समृद्धि एव सबुद्धि में वृद्धि हो। राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्ता ने भारत भारती में लिखा थाः-

किस भाँति जीना चाहिए, किस भाँति मरना चाहिए।
लो सब हमें निज पूर्वजों से सीख लेना चाहिए।।

हम भारतीय विश्व के प्राचीनतम इतिहास एवं श्रेष्ठतम संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं। भगवान बुद्ध इस युग के अवतार हैं और इस शुभ वर्ष के चैत्र नामक श्रेष्ठ मास के शुक्ल पक्ष का यह प्रथम दिवस है। यह स्थान जम्बू द्वीप के भारत खण्ड आर्यावृत का विशिष्ट स्थान है-ब्रह्मवर्त (कानपुर) है। चेत्र शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय के समय ब्रह्मा ने जगत की रचना की। इस प्रकार समय, सृष्टि और दिन के साथ-साथ आरम्भ होने का सिद्धांत स्थापित हुआ।

नवसम्वत्सर उस समय प्रारम्भ होता है जब सूर्य भूमध्य रेखा पार कर उत्तरायण होता है। उसकी रश्मियाँ दिन प्रति-दिन प्रखरतर होती जाती हैं और परिणामस्वरूप खेतों में खड़ी फसलें धीरे-धीरे परिपक्व होने लगती हैं। आम और कटहल नवसंवत्सर के स्वागत में अपनी सुगन्ध बिखेरने लगते हैं। कोयल की कूक भी कुछ यही भाव लिए रहती है। देश में किसान नए साल और नई फसल के स्वागत के लिए तैयार रहते है। भारत कृषि प्रधान देश होने के कारण यहाँ का राष्ट्रीय संवत्सर नव संस्येष्टि तो होना ही चाहिए।

अब यह आवश्यकता प्रतीत होती है कि सभी प्रबुद्ध भारतवासी अपने राष्ट्रीय स्वाभिंमान के प्रतीक इस विक्रम संवत्सर के प्रारम्भ के अवसर पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा सं॰ 2068 तद्नुसार 4 अप्रैल 2011 को नवसंवत्सर मनाए। महाकालेश्वर (टाईम इज गाड) की अर्चना करें। अपने इष्ट मित्रों, बन्धु-वान्धवों और संसार के समस्त राष्ट्रों की सुख-स्मृद्धि और शान्ति की कामना करें। अपने धार्मिक आस्था के अनुसार उपासनागृहों में जाएं अथवा घर पर ही यज्ञ और दान का अनुष्ठान करें जहाँ यह पर्व हम सब के लिए हर्षोल्लास और शुभकामनाओं के आदान-प्रदान का अवसर है, वहीं बालकों के लिए अपनी प्राचीन परम्परा के ज्ञान और राष्ट्रीय स्वाभिमान के संस्कार का भी है।

महात्मा बुद्ध के बाद कलियुग के सर्वाधिक विख्यात और लोकप्रिय चरित्र नायक सम्राट विक्रमादित्य हैं उनके साहस, न्याय और चरित्र तथा परोपकार की कथाऐं घर में बच्चे अपनी माताओं से सुनते हैं। उनका जीवन व्यक्तिगत त्याग, प्रशासनिक मर्यादा और राजनीतिक कुशलता की ऐसी त्रिवेणी है कि उसका संस्पर्श आज निराशा के इन क्षणों में हमारे राष्ट्र जीवन में आशा और उत्साह का संचार कर सकता है तथा पतन के गर्त से निकलने का मार्ग दिखा सकता है। अनेक सम्राटों ने उनके नाम को एक उपाधि के रूप में प्राप्त कर अपने को धन्य माना है।

हिन्दू समाज की अज्ञानता, आत्महीनता, और अपराध् बोध् का समूल उच्चाटन करके एक बार पुनः समाज में आत्म-विश्वास, आत्म विश्लेषण के लिए मिल-जुलकर काम करने की वृति उत्पन्न करने के लिए महर्षि दयानन्द सरस्वती ने इसी दिन अर्थात चैत्रा शुक्ल प्रतिपदा सं॰1932 वि॰ तद्नुसार 7 अप्रैल, 1875 को बम्बई में सर्व प्रथम आर्य समाज की स्थापना की।

सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय चेतना जगाने हेतु अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले दो महापुरुषों का नामोलेख करना आवश्यक है, जिनका इसी दिन जन्म हुआ था। एक है संत प्रवर श्री झूलेलाल और दूसरे है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डा॰ केशव बलिराम हेडगेवार। अपने व्यक्तिगत जीवन के लिए सुख सुविधायें जुटाने साधन और यश पाने की इच्छा इन महापुरुषों को छू भी नहीं गयी थी। जबकि आज अपने देश में शिक्षा और राजनीति में, सर्वत्र कुछ पाने, कुछ बन जाने की होड़ लेगी हुई हैं, अतएवं यह नवसंवत्सर हमें स्वार्थ-त्याग के उन आर्दशों का स्मरण दिला सकता है, जिनकी आज हमारे समाज एवं राष्ट्र को महती आवश्यकता है।

समाज के विभिन्न वर्ग में नवसम्वत्सर का प्रारम्भ नवरात्र के रूप में व्रत उपवास द्वारा मनाते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चन्द्र का जन्म भी इसी नवरात्र में मनाया जाता है। पारसी बन्धुओं का नवरोज भी इसी दिन से प्रारम्भ होता है। भारत को एकता और राजनीति को मर्यादा प्रदान करने के कारण ही हमारे संविधान में श्रीराम चन्द्र जी को अपने आर्दश पुरुष के रूप में अंकित किया है।

भारत विकास परिषद् ने सम्पूर्ण राष्ट्र में राष्ट्रीय परम्पराओं की स्थापना एवं प्रचार-प्रसार की दृष्टि से कई प्रकल्पों को अपने कार्यक्रम में सम्मिलित किया है। उसमें भारतीय नवसम्वत्सर को भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रकल्प के रूप में मना रही है। इस अवसर पर आप सभी मिलकर इस सम्वत्सर को हर्षोल्लास से सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करवाएं।


May, 2011

हमारे पुरोधा
ऋषि-मुनियों, साधु-सन्तों, बुद्धि-जीवियों, लेखकों, कवियों, साहित्यकारों, समाज-सेवियों और प्रभु-भक्तों के लिए आर्यावर्त की यह धरती सदा उर्वरा रही है और ऐसी महान् विभूतियाँ समाज के लिए वन्दनीय और अनुकरणीय रही हैं। अस्तु! जब भी ऐसे महापुरुषों की जयन्ती मनाई जाती है तो मन आह्लादित हो उठता है।

मई मास में तो लगभग ऐसी बारह महान् आत्माओं की जयन्तियाँ मनाई जानी हैं। गुरु अर्जुन देव (2.5), सिक्खों के पंचम गुरु एवं ग्रन्थ-साहब के संकलन कर्ता’; गुरु नानक का उत्तराधिकारी एवं लंगर-पद्धति का शुभारम्भ करने वाले गुरु अंगद देव (4.5) और गुरु ग्रन्थ साहब में जिनकी वाणी का संकलन है ऐसे गुरु अमरदास (23.5) सरीखे गुरु तो सिक्ख सम्प्रदाय के दस गुरुओं में अपनी विशेष पैठ बनाए हुए हैं। उनकी वाणी का पाठ निरन्तर गुरुद्वारों में सुनने को मिलता है। मुनि शुकदेव (3.5) से सम्बन्धित धार्मिक कथाएँ नारी-वर्ग के लिए विशेष रूप से मन्दिरों में सुनाई जाती हैं। विष्णु के अवतार और अपने ‘फरसे’ के कारण प्रसिद्ध भगवान परशुराम (5.5) और मुग़ल सम्राट के छक्के छुड़ाने वाले समर्थ गुरु रामदास के शिष्य छत्रपति शिवाजी (5.5) से कोई अभागा ही होगा जो परिचित न हो। महाकवि भूषण ने शिवाजी के त्रास का एक अनूठा आलंकारिक चित्रण प्रस्तुत किया हैः

                            ऊँचे घोर मन्दिर के अन्दर रहन वारी।
                            ऊँचे घोर मन्दिर के अन्दर रहाती हैं।।
                            कन्दमूल भोग करें कन्द मूल भोग करें।
                            तीन बेर खाती थीं वे तीन बेर खाती हैं।।
                            भूषण शिथिल अंग-भूषण शिथिल अंग।
                            नगन जड़ाती थीं वे नगन जड़ाती हैं।।

मराठा सरदार शिवाजी को भारतीय अस्मिता की रक्षा के लिए हम नमन करते हैं।

लगभग सभी धर्मावलम्बी अद्वैतवाद के प्रवर्तक एवं चार धामों की स्थापना करने वाले आद्य शंकराचार्य (8.5) को अपना धर्मगुरु मानते हैं। प्रज्ञाचक्षु महाकवि सूरदास (8.5) के तो कहने ही क्या।‘सूरसागर’ और ‘भ्रमर गीत’ की रचना कर यह कृष्ण भक्त कवि अमर हो गया। बाल कृष्ण के भोले पन की एक बानगी देखिएः

                    मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो।
                    भोर भयो गैयन संग भटक्यौ, साँझ परे घर आयो।
                    ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो।

आदि पंक्तियाँ पढ़ और सुनकर किसका मन पसीज नहीं उठेगा?

काँची में तत्वज्ञान प्राप्ति के उपरान्त विशिष्टाद्वैतवाद के सगुणोपासक रामानुजाचार्य (9.5) ने कहा था ‘जिसने कभी (भग्वद्) प्रेम नहीं किया, वह भगवान की कृपा कभी प्राप्त नहीं कर सकता।’ मानव के अच्छे-बुरे कर्मों का हिसाब-किताब रखने की बात आती है तो यमाचार्य के कार्यालय में नियुक्त चित्रगुप्त (10.5) का स्मरण हो आता है। ‘करम गति टारे नाहिं टरै’। क्यों न अभी से सचेत हो जाएँ और शुभ कर्म करने आरम्भ कर दें। ‘देहु शिवा वर मोहि अबै, शुभ कर्मन ते कबहूँ न टरुऊँ'। ‘नारायण’ ‘नारायण’ कहते और रटते हुए महर्षि नारद (19.5) बिना बुलाए सर्वत्र पहुँच जाते हैं और समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत करते हैं। हमारी धार्मिक कथाओं में महर्षि नारद और उनकी वीणा का विशेष स्थान है। शायद इसी कारण आज के दिन ‘वीणा’ वाद्य-यन्त्र का भी दान किया जाता है। राजा राम मोहन राय (22.5) का भी भारतीय विचार धारा के प्रसार में विशेष योगदान रहा है।

बौद्ध धर्म के प्रणेता महात्मा बुद्ध (17.5) का जन्म लुम्बिनी में हुआ था और बोध-गया में ज्ञान प्राप्ति। डाकू अंगुलिमाल को सन्त बनाने वाले महात्मा बुद्ध का न केवल अपने देश में अपितु अन्य देशों में भी वर्चस्व बना हुआ है। सारनाथ में प्रथम प्रवचन देते हुए उन्होंने ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ की स्थापना की। आज भी बौद्ध मन्दिरों और मठों में इन के अनुयायी चक्र घुमाते हुए दिखाई पड़ते हैं। अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले महात्मा बुद्ध के धर्मग्रन्थ त्रिपिटक के मूल मन्त्र हैं:

                    बुद्ध शरणं गछामि।
                    धम्मं शरणं गछामि।
                    संघं शरणं गछामि।

पाश्चात्य संस्कृति का अन्धानुकारण करते हुए भारतवासियों ने भी कुछ दिनों को विशिष्ट नाम दे दिए हैं। जैसे ‘मई डे,’ ‘प्रैस स्वतन्त्रता दिवस,’ ‘रेड क्रास डे’ ‘मदर्स डे,’, ‘विश्व नर्स दिवस,’ ‘धूम्रपान निषेध दिवस’ आदि आदि। क्या मई दिवस (1.5) को ही श्रम दिवस समझना चाहिए। क्या अन्य दिनों में श्रम करने की मनाही है। ऐसा नहीं, वस्तुतः ‘परिश्रमेण हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथै’:- परिश्रम तो हर समय करना ही होता है। प्रैस की स्वतन्त्रता (3.5) तो सदा रहनी चाहिए ताकि लेखनी कुन्द न हो जाए और जनता जागरूक बनी रहो। ‘रेड क्रास डे (8.5) और ‘नर्स दिवस’ (12.5) यद्यपि स्वास्थ्य से जुड़े हैं फिर भी इन सेवाओं की निरन्तर आवश्यकता रहती है। ‘मदर्स डे’ (8.5), ‘फादर्स डे’ कह कर तो मानों माता-पिता के लिए मात्र एक दिन ही सीमित कर दिया गया हो। भारतीय संस्कृति तो ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, अतिथि देवो भव’ की संस्कृति है। माता-पिता तो अहिर्निश पूजनीय हैं। केवल एक ही दिन उन्हें बधाई-कार्ड भेज कर सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए। धूम्रपान निषेध (31.5) के सम्बन्ध में तो प्रचार निरन्तर होता रहना चाहिए कि स्वास्थ्य के लिए यह कितना हानिकर है। आइए! हम कूप-मण्डूक न बनें परन्तु इन दिवसों की महत्ता को निरन्तर प्रचारित करते रहें।

कतिपय राज्यों के लिए भी उनका जन्म दिन अर्थात् स्थापना दिवस महत्व रखता है। मराठी मानुस के लिए महाराष्ट्र (1.5), गुजराती भाई के लिए गुजरात राज्य (1.5) की स्थापना गौरव का विषय है। परन्तु उन्हें एक बात अवश्य ध्यान में रखनी होगी-भाषाई दृष्टि से राज भाषा का चाहे महत्व हो परन्तु राष्ट्र की संगठनात्मक दृष्टि से राष्ट्र भाषा हिन्दी को सर्वोपरि स्थान देना होगा। भारतेन्दु ने ठीक ही कहा थाः
                    निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति को मूल।
                    बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे ने हिय को शूल।।

यहाँ निज भाषा से तात्पर्य है राष्ट्र भाषा।

उपरोक्त विचारों को लिपिबद्ध करने का उद्देश्य यह है कि जब भारत विकास परिषद् की शाखाएँ संस्कृति सप्ताह (मास) के कार्यक्रम निश्चित् करें तो इन विषयों से भी कुछ बिन्दु चुने जा सकते हैं जैसे महापुरुषों की जीवनी, राष्ट्रभाषा का महत्व, धार्मिक स्थल, काव्य-पाठ, कथा वाचन आदि-आदि। सभी सचिवों से ऐसी अपेक्षा बनी रहेगी।

 आइए! भारतीय संस्कृति के ‘संस्कार’ पक्ष को सदा प्राथमिकता दें, यही परिषद् का लक्ष्य  है।है।                                                                                                                                                                                     


June, 2011

अति सर्वत्र वर्जयेत्
Excess of Everything is Bad
पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश से निर्मित इस पंच भौतिक देह को पा कर मनुष्य अपने को इतना बलशाली समझने लगता है कि उसे सृष्टि-रचयिता के नियमों का उल्लंघन करने में जरा भी संकोच नहीं होता। काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह - इन पंच विकारों के माया-जाल में ऐसे फंस जाता है कि उसे निज पर नियन्त्रण ही नहीं रहता। प्रायः इन पाँचों को विकार की संज्ञा दी जाती है पर ऐसा नहीं है। प्रगति-पथ पर चलने के लिए किसी सीमा तक यह सहायक होते हैं। सन्तति की उत्पत्ति के लिए कामेच्छा को नकारा नहीं जा सकता; अनुशासन बनाए रखने के लिए कभी-कभी क्रोधित भी होना पड़ता है; धन का लालच न सही अपने Target तक पहुँचने का लोभ संवरण नहीं किया जा सकता और ममत्व की प्रतिमूर्ति माता-पिता अपनी सन्तानों के प्रति मोह का त्याग कैसे कर सकते हैं। अभिप्राय यह है कि ये सब किसी सीमा तक तो वान्छित भी हैं और श्रेयस्कर भी परन्तु जब उस सीमा का अतिक्रमण किया जाता है तो यह वरदान नहीं अभिशाप बन जाते हैं।

सन्त कवि महात्मा कबीर (15.6) की वाणी का एक-एक शब्द मोती है:

                                            सांई इतना दीजिए जामें कुटुम्ब समाए।
                                            मैं भी भूखा न रहूँ साधु न भूखा जाए।।

परन्तु मदान्ध मानव की प्रकृति भ्रष्टाचार के माध्यम से असीम धन का संग्रह करने की बन चुकी है। उन्हें इस सच्चाई से कोई सरोकार नहीं कि

                                                मुठ्ठी बाँध के आए थे, हाथ पसारे जाएंगे।

महर्षि व्यास ने कहा था ‘‘धैर्य धारण करना, क्रोध न करना, इन्द्रियों को वश में करना, पवित्रता, दया, सरल वचन, मित्रों से द्वेष न करना -ये सात लक्ष्मी (धन प्राप्ति) के साधन हैं।’’ परन्तु जब देश में यह स्थिति हो जाए कि ‘सैंया भए कोतवाल अब डर काहे का’ तो देश का रब ही राखवाला है।

मुगल सम्राट अकबर से लोहा लेने के लिए महाराणा प्रताप (4.6) ने बीड़ा उठाया था। हल्दी घाटी का युद्ध और चेतक घोड़े के पैरों की टाप आज भी सुनाई देगी यदि हम भारतवासी भारत-माँ के सपूतों को सश्रद्ध नमन् करते हुए उनके बताए मार्ग का अनुसरण करेंगे। 18 जून को झांसी की रानी लक्ष्मी बाई शहीद हुई थीं। मुंह से घोड़े की लगाम पकड़े और पीठ पर अपने पुत्र को बांधे अपनी अस्मिता को बचाने हेतु ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।’

5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाएगा परन्तु हम पर्यावरण की शुद्धि के प्रति कितने जागरूक हैं, ईमानदारी से इस पर विचार किया जाना चाहिए। जल, थल और वायु सभी प्रकार से वातावरण को दूषित किया जा रहा है और इसके जिम्मेदार हम स्वयं हैं। बार-बार झकझोरने पर भी और दूषित वातावरण के कारण बढ़ती बीमारियों को जानते हुए भी हम इस की शुद्धि के लिए कारगर कदम उठाना नहीं चाहते। निश्चित् है कि प्रकृति को प्रदूषित करने और उसके विरुद्ध आचरण करने पर हम सुखपूर्वक जीवन यापन नहीं कर सकते।

परिषद् अपने संस्कार और सेवा के कार्यक्रमों से हमें सन्मार्ग पर लाने की सतत् प्रेरणा देती रहती है। आइए, सत्पात्र बनकर अपने ऋषि-मुनियों का आशीर्वाद ग्रहण करें।


 

July, 2011

जागो फिर एक बार
बच्चे का जन्मदिन और किसी परिषद् का स्थापना दिवस दोनों ही आह्लादकारी होते हैं। सन्तति का जन्म परिवार के लिए और उदात्त उद्देश्यों की पूर्ति हेतु गठित परिषद् की स्थापना राष्ट्र और समाज के लिए गौरव का विषय होता है। अपनी पहचान बनाने के लिए कुछ अलग ही करना पड़ता है। यवन-आक्रान्ताओं का मुकाबला करने के लिए सिक्ख धर्म के अनुयायियों को पाँच ककार-कच्छ (Underwear), कड़ा (Bangle), करपान (Small sword), कंघा (Comb) और केश (Long hair) को अपना चिन्ह बना कर जुझारू होना पड़ा। इसी प्रकार भारत विकास परिषद् को भी अपने स्थापना दिवस (10.7) पर पंच-सकार-सम्पर्क (Contact), सहयोग (Cooperation), संस्कार (Values), सेवा (Service) और समर्पण (Dedication) अपने प्रेरक-सूत्र बनाने पड़े। और इन सूत्रों के अन्तर्गत चलाए जा रहे प्रकल्पों (Projects) ने परिषद् को राष्ट्रीय फलक पर ला खड़ा किया है।

व्यक्ति अकेला चलता है कुछ करने को और कारवाँ बनता जाता है। डा॰ सूरज प्रकाश जी ने सोचा था कि एक ऐसा संगठन बने जो मनीषी और सक्षम व्यक्तियों का हो ताकि वे समाज के उपेक्षित वर्ग की सेवा कर सकें और बालक/बालिकाओं को संस्कारित। समान विचार वाले बुद्धि जीवियों के परामर्श के बाद संगठन का नामकरण हुआ-भारत विकास परिषद् जिसकी विधिवत् स्थापना हुई 10 जुलाई 1963 को। आज यह एक वट-वृक्ष बन चुका है और सन् 2013 में इसकी स्वर्ण-जयन्ती मनाई जानी है। कितना आह्लादकारी और गौरवशाली मंजर होगा।

जन्मदिवस की बात चली है तो क्यों न अकाल तख्त के निर्माता एवं सिक्खों को सैन्य प्रक्षिण देने वाले गुरु हर गोविन्द सिंह (5.7) और गुरु हर किशन (24.7) का स्मरण कर लिया जाए। ‘गीता रहस्य’ के रचयिता और ‘स्वतन्त्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार हैं’ का नारा देने वाले बाल गंगाधर तिलक और जलियाँ वाला बाग (अमृतसर) में अंग्रेजों के जनरल डायर को गोली मारने वाले शहीद उधम सिंह को भी उनकी जयन्ती पर हम विस्मृत नहीं कर सकते।

वीरत्व की प्रतिमूर्ति चन्द्रशेखर आज़ाद की जयन्ती (23.7) पर उन्हें इस सन्दर्भ में तो याद कर ही सकते हैं कि अंग्रेजी प्रशासन से लोहा लेते हुए उन्होंने आज़ाद  पार्क, इलाहाबाद में स्वयं की आहुति दे दी।

आधुनिक राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में जब किसान भाई आन्दोलन अथवा आत्मदाह करते हैं तो उपन्यास सम्राट मुंशीप्रेम चन्द (31.7) का स्मरण हो आता है। उन्होंने अपनी तीखी लेखनी से गोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि आदि उपन्यासों तथा शतरंज के खिलाड़ी, पूस की रात एवं अन्य कहानियों के माध्यम से इस वर्ग की शोचनीय दशा को उजागर किया था। उन्होंने एक जगह लिखा था ‘भय की भान्ति साहस भी संक्रामक होता है’। आज इसी साहस की आवश्यकता और मांग भी है।

मानवाधिकार हनन के इसी परिप्रेक्ष्य में जब कुछ विचारकों, चिन्तकों और गुरुओं को सरकारी तन्त्र को सत्याग्रह, आमरण अनशन के माध्यम से जगाना पड़ता है तो भारत विकास परिषद् के पथ प्रदर्शक स्वामी विवेकानन्द, जिन्होंने भारतीय संस्कृति, धर्म, भारतीय गौरव की ध्वजा को विश्व-पटल पर लहराया था, तो उनकी पुण्यतिथि (4.7) पर उनका एक प्रेरक उद्बोधन अवश्य स्मरण हो आता है-‘मुझे अगर 100 निष्ठावान कार्यकर्ता मिल जाएँ तो मैं भारत का कायापलट कर सकता हूँ’। 100 हों या 1100 या 11,000, न जाने सरकार क्यों बौखला उठती है। यदि सरकार सोती है तो राष्ट्र के ऐसे शुभ-चिन्तकों को आगे आना ही पड़ता है।

इन्ही दिनों उच्च शिक्षा में राष्ट्र भाषा की महती आवश्यकता को लेकर भी सरकार से प्रार्थना की गई। जरा स्वामी विवेकानन्द जी के शब्द सुनिए, हम अपने घर का प्रयोग करते हैं, दूसरे का नहीं। ‘‘हम अपने वस्त्रों का प्रयोग करते हैं, दूसरों का नहीं। इसी प्रकार से हम भाषा के सम्बन्ध में भी विचार करें कि हम भारतीय हैं, तो कौन सी भाषा का प्रयोग करें? तो उत्तर होगा कि भारतीय भाषा का। हमारी भारतीय राष्ट्र भाषा हिन्दी है। तो हमें हिन्दी का प्रयोग करना चाहिए या फिर हम गुजराती, मराठी, पंजाबी हैं तो गुजराती, मराठी, पंजाबी आदि भाषाओं का प्रयोग भी कर सकते हैं। कम से कम ये अपने देश की भाषाएँ हैं।

हम विदेशी भाषा (अंग्रेजी) का प्रयोग क्यों करें? क्या हमारा जन्म इंग्लैण्ड में हुआ है, नहीं। जिस व्यक्ति से हम बात कर रहे हैं उसका जन्म इंग्लैण्ड में हुआ है-नहीं। तब न तो हम अंग्रेज़ हैं और न ही वह अंग्रेज है जिससे हम बात कर रहे हैं, तो हम अंगेजी भाषा का प्रयोग क्यों करें?

हाँ यदि कोई अंग्रेज हमारे सामने आ जाए और वह हमारी हिन्दी भाषा न समझता हो तो अंग्रेजी भाषा प्रयोग कर सकते हैं। या हम विदेश में जाएँ जहाँ पर लोग हिन्दी नहीं समझते, अंग्रेजी में ही काम चलता हो, तो भी अंग्रेजी का प्रयोग कर सकते हैं। परन्तु अपने ही देश में अपने ही लोगों के साथ हम विदेशी भाषा (अंग्रेजी) क्यों बोलें, जब कि वे अपने देश के लोग हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं को समझते हैं। अपने ही देश में अपने ही लोगों के साथ अंग्रेजी बोलना गुलामी का लक्षण है। कृपया अपनी भाषाएँ बोलें और स्वतन्त्र बनें।

अंग्रेजी बोलने वाला व्यक्ति ही पढ़ा-लिखा है, हिन्दी आदि बोलने वाला व्यक्ति अनपढ़ है, ऐसा सोचना भी गुलामी का लक्षण है। हमें अपने देश, अपनी भाषा, अपनी वेश-भूषा आदि का स्वाभिमान रखना चाहिए, तभी हम सच्चे अर्थों में स्वतन्त्र कहलाएँगे।’’ देश के कर्णधार! अब तो जागो।

अद्वैतवाद के प्रवर्तक आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित जगन्नाथ पुरी (उड़ीसा) की जगन्नाथ रथ यात्रा (3.7) का विशेष महत्व है और असंख्य लोगों की उसके प्रति श्रद्धा भी। यह एक अनूठी यात्रा है।

भारत विकास परिषद् का एक प्रकल्प है गुरुवन्दन छात्र अभिनन्दन। भागवत के लेखक वेद व्यास जी को उनकी जयन्ती (15.7) गुरु पूर्णिमा पर इस दृष्टि से स्मरण करते हैं कि उन्होंने गुरु के महत्व को समझाया। इसलिए ‘व्यास पीठ’ को बड़ा पवित्र माना जाता है। उन्होंने बोध कराया था ‘धर्म दक्षता में, यश दान में, स्वर्ग सत्य में और सुख शान्ति में रहता है’।

आज व्यास पीठ के स्थान पर सरकार पीठ को महत्व दिया जाने लगा है जो राष्ट्र के लिए दुर्भाग्य पूर्ण है। आज महात्मा गाँधी की दुहाई देते हुए समाज के जो नेता अहिंसा के माध्यम से सरकार से कुछ लेना चाहते हैं उन्हें गाँधी जी के इस वाक्य ‘मेरी अहिंसा कायरता नहीं सिखाती’ के मर्म को समझना होगा।

देश में जो भी आन्दोलन चल रहे हैं, स्वामी विवेकानन्द का कथन याद रखेंः
Arise, Awake and Stop not till the goal in reached.


August, 2011

SALUTE THY MOTHERLAND
August 15th, Independence Day, is celebrated with pomp and show every year in the country and Indian Missions abroad. Main function is held in Delhi, capital city, when National Tricolour is hoisted by the Prime Minister with an address to the Nation wherein a couple of promises are made which are never fulfilled or partially attended to by the Govt. School children sing a chorus
' सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तान हमारा।' etc written by the famous poet lqbal. Had he been alive today, he would have seen for himself the 'अच्छाई' of 'हिन्दोस्तान' surrounded by beeline of scams and corruption prevalent on the soil.

No doubt Goswami Tulsidas (5.8), the poet laureate of his times, also wrote in रामचरितमानस 'पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं' but he had a positive vision about भारत not India. Bal Gangadhar Tilak rightly said ‘Independence is our birth right’ 'स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है,' but alas! a very wrong interpretation of the word 'स्वतन्त्रता' is derived which concerns only 'I, my and me and not the Nation. We on this Ist day of August, pay our respectful homage to a sincere and visionary leader of his stature. Mahatma Gandhi also raised his voice by organising quit India movement (भारत छोड़ो आन्दोलन) which is also known as अगस्त क्रान्ति दिवस (9.8) but the readers in general must know that Independent was not given to our country on a platter. Very many great personalities had to sacrifice their precious lives on the altar of Independence. Hence to say 'ले दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तु ने कर दिया कमाल' is just a befooling ourselves.

A very important and famous festival-the birthday of Lord Krishna (कृष्ण जन्माष्टमी) is being celebrated on 22.08.2011 specially in Mathura & Vrindavan and in very many other cities by erecting pandals with झूला etc. Bhajan, Kritan continues till midnight. Blind poet Surdas wrote at lengith about his 'लीला' but I must quote a stanza of poet 'रसखान' is his praise:

मानुष हों तो वही रसखान
बसों निज गोकुल गाँव के ग्वारन
जो पशु हों तो कहा बस मेरो
चरों निज नन्द की धेनु मझारन
जो खग हों तो बसेरो करों
मिलि कालिन्दी कूल कदम्ब की डारन
पाहुन हों तो वही गिरि को
जो कियो ब्रज छत्र पुरन्दर धारण

While giving a discourse to Arjun on the battlefield of कुरुक्षेत्र he had said 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' Let us do some introspection. Are we sincerely doing our job whereever we are. Let us follow his teachings in the true spirit. 'कर्म ही पूजा है' is the gist of the teachings of Lord Krishna. With the same aim Mother Teresa (B’day 27.8) worked for the upliftment of the down trodden.
            On this very day Kailash Mansarover Yatra starts for the devotees through hilly terrains. This long 'यात्रा' is completed by Hindu devotees with extraordinary faith and perseverance.
            To keep oneself fit and healthy participation in various types of sport is also needed. National Sports Day (29.8) reminds us about that.
            BVP branches always give due recognition to persons in various fields-Academics, Cultural, Co-curricular and sports. Very many such events are organised during 'संस्कृति सप्ताह'.

    Let us  stand united to save our country’s Independence so dearly achieved.

                                              वन्दे मातरम् 


September, 2011

श्री गुरुचरण सरोज-रज, निज मन-मुकुर सुधार
Wipe out the dirt of your Mind-Mirror with the dust of the Lotus-Feet of your Teacher.

Come September and the 5th day of the month has its own significance. A towering personality with white turban, wearing white achkan and white dhoti was born on this auspicious day. He was none other than Dr. Sarva Palli Radhakrishnan-a philosopher, a torch bearer, a visionary and a great teacher. In the realm of politics he had a long stint of Vice Presidentship of India (practically for Ten years) followed by the highest office of President of the Indian
Republic. By virtue of his office he became the first citizen of India. Dr. S.R. was the first Vice President and also the first recipient of the highest award of the Indian soil (भारतभूमि)-the Bharat Ratna. In his book titled ‘An idealistic view of life’ Dr. S.R. has dwelt at length as to how to make the entire gamut of life memorable by adopting positive altitude. His words “Earliest we are able to understand the feelings of others, better it would be for the entire world” speak volume. This is the sum and substance of a saying in Sanskrit:
आत्मनः प्रतिकूलानिपरेषां न समाचेरत् and परस्परं भावयन्तः श्रेयम् (॰ गीता) In his other book titled ‘Indian philosophy’  the philosopher, writer, teacher very ably dealt with the various schools of thought as propounded by different Philosophers. But no philosophy of any other country or culture can match the भारतीय दर्शन which has it's main motto and deep rooted belief in सर्वे भवन्तु सुखिनाः, सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग भवेत्।। meaning thereby 'let every body live in peace, let every one be without any disease, let noble thoughts  come to every person, let no one suffer (on any account).

On this pious day every Indian fondly remembers this noble soul , a torch-bearer and a path finder. Truly, as a mark of respect this day is dedicated to the great luminary as Teacher’s Day (शिक्षक दिवस). A teacher is always considered on a very high pedestal in the Indian culture:

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुदेंवो महेश्वरः
गुरुः साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।।

And a True Teacher like Veda-Vyas helps us in finding our True self without making us dependent on him.

Let us bow our heads in reverence to our teachers who taught and guided our destiny at various levels.

On this day branches of BVP also honour/felicitate teachers for their excellence in various disciplines.

Ganesh Chaturthi falls on 1st Sept. Every मंगल कार्य is started with a prayer to Lord Ganesh. Remember, He considered his parents-Shiv & Parvati -as epitome of ब्रह्माण्ड and thus came first while competing with his brother कार्तिकेय!

Let us not forget that our National Language is Hindi written in Devnagari script. राष्ट्र भाषा हिन्दी दिवस (14th Sept) reminds us about our duty to propagate the use of this language in all the fields of think-thank.

I just talked about he role of Guru and here is another pious soul Nanak (22.9). Nanak Chand who later on became Guru Nanak-the first of the 10 Guru’s of Sikhism. Every single word of गुरुग्रन्थ साहिब conveys a deep meaning. An example: नानक नाम जहाज़ है, चढ़े सो उतरे पार  What a simile!

Er. Visveswariya was born on Sept. 15. A civil engineer by profession, he was the mastermind to build Krishna Sagar Dam in Mysore. He adorned the seat of Deewan (Prime Minister) of the State and gifted Mysore University in addition to other institutions to the state. Kaiser-i-Hind of the British Govt., he was awarded Bharat Ratna by the Govt. of India. As per the saying of our scriptures जीवेम् शरदः शतम्  (Let us live for 100 years), this teacher cum engineer had said “it is better to work out than rust out”. With this spirit he lived for 101 years.

We should try to follow into the footsteps of such like personalities who are always held in high esteem. 


October, 2011

हमारी विरासत
भारत-भू ऋषियों, मुनियों, सन्तों, महात्माओं व वीरों की धरा रही है। अक्टूबर माह आरम्भ होते ही राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की याद आती है। 2 अक्टूबर सन् 1869 को गुजरात के पोरबन्दर नामक स्थान पर जन्म हुआ। उनका पूरा नाम था मोहनदास करमचन्द गाँधी। अंग्रेजों के विरुद्ध स्वदेशी आन्दोलन चलाकर अपने सहयोगियों पं॰ जवाहर लाल नेहरू, लाला लाजपतराय, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को साथ लेकर 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वाधीन कराने में सफल हुए। देश विभाजन का सर्वाधिक कष्ट गाँधी जी को ही हुआ था।

लालों के लाल, लाल बहादुर शास्त्री का जन्म भी 2 अक्टूबर 1904 को वाराणसी के मुगलसराय कस्बे में हुआ। 1965 में भारत पाक युद्ध के समय शास्त्री जी की सूझ-बूझ के कारण पाकिस्तान को पराजय का मुँह देखना पड़ा। शास्त्री जी ने ही हम भारतवासियों को ‘‘जय जवान जय किसान’’ का नारा दिया था। इस महान सपूत को ‘भारत रत्न’ की उपाधि से श्रद्धाजंलि अर्पित की गई थी।

भला लौह पुरुष सदार वल्लभभाई पटेल (31.10) को कैसे भूल सकते हैं। जिस राष्ट्रीय अखण्डता (4.10) की दुहाई दी जाती है उसी के लिए तो सरदार पटेल ने भारत की बिखरी हुई स्थिति को समेटने का कार्य किया था। वस्तुतः आज की परिस्थितिओं में सरदार पटेल की कमी सभी देशवासियों को खलती है। देश में फैला भ्रष्टाचार और छोटे-छोटे राज्यों में पुनः विभाजन उन्हें ऐसे राष्ट्र भक्त नेता को कभी भी रास न आता।

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा ‘आजाद हिन्द फौज’ (21.10) बनाने की घोषणा की गई थी। उन्होंने नारा दिया था ‘‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’’। 23 अक्टूबर 1945 को टोकियो रेडियो ने यह शोक समाचार दिया कि सुभाष बाबू एक विमान दुर्घटना में मारे गये। परन्तु खेद है उनसे सम्बंधित विमान दुर्घटना की गुत्थी आज तक नहीं सुलझ सकी।

इसी पावन भूमि पर अक्टूबर माह में अनेकों उत्सवों को हर्षोल्लास से मनाया जाता है। दीपावली पर्व (26.10) कार्तिक मास की अमावस्या को संपूर्ण राष्ट्र श्रद्धा व लगन से मनाता है। आत्मा का प्रियतम परमात्मा ही है, जिसे खोजने/जानने के लिये ज्ञान रूपी दीपक की आवश्यकता होती है। दीपावली तो ऐसा प्रकाश पर्व है जिसका सन्देश है ‘‘तमसो माँ ज्योतिर्गमय’’।

‘‘शीश कटता है कट जाने दो, संस्कृति-स्वाभिमान-मानवता पर आंच न आने दो’’

उपरोक्त शब्द राष्ट्र की अस्मिता बचाने और हिन्दू धर्म की रक्षा हेतु गुरु गोविन्द सिंह जी (31.10) ने अपने चारों पुत्रों के बलिदान पर कहे थे। एक कौम के अस्तित्व व आन के लिये बलिदान (शहादत) का कितना बड़ा महत्व है, इसका एहसास राष्ट्र का प्रत्येक प्राणी करता है। ऐसे ‘सवा लाख से एक लड़ाऊँ’ कहने वाले गुरु जी के लिये भारतवासी गर्व से यही कहेंगे कि देश की रक्षार्थ वह हमारे गुरु भी रहे और आराध्य गोविन्द बने। ऐसा ऐतिहासिक एवं अद्वितीय बलिदान सदैव याद दिलाता है कि जो कौमें अपने वतन, विरासत, आबरू और माटी की लाज के लिये जीवन बलिदान देना भूल जाती हैं, वह बदनामी, गुलामी व गुमनामी की बलि चढ़ जाती हैं।

आज सभी भारतवासियों को भ्रष्टाचार के ख़िलाफ भी इसी शिदत्त व जुनून से जूझना व लड़ना पड़ेगा जैसा गुरुजी ने समस्त भारतवासियों को आंतक से मुक्त कराया था।

आज के युवा के लिये आवश्यक है कि वह विश्वस्तरीय व्यक्तित्व के रूप में विकसित हो। युवा वर्ग को हर एक से कुछ न कुछ सीखना होगा। टीम भावना जापान से, कार्य करने का तरीका व क्षमता जर्मनी से तथा बिट्रेन से शिष्टाचार और मार्केटिंग अमेरिका से सीखनी होगी और इन सबसे ऊपर मानवीय मूल्य उन्हें भारत से सीखने होंगे।

महर्षि वाल्मीकि (11.10) ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र के माध्यम से युवा वर्ग को राष्ट्र के उत्थान हेतु उनका अनुकरण करने की प्रेरणा दी है। भाविप भी युवा वर्ग के उत्थान हेतु दृढ़ संकल्पित है।

विजयदशमी (6.10) का भी यही सन्देश है। सत्य की असत्य पर और न्याय की अन्याय पर विजय। देश आज ऐसे ही दौर से गुजर रहा है। जब देश के सभी कर्णधार श्रीराम की तरह राष्ट्रधर्म को निभाएंगे तो यह देश भ्रष्टाचार मुक्त एवं शक्तिशाली देश अन्य समस्त विकसित देशों के सम्मुख अग्रिण पंक्ति में होगा। बस आवश्यकता है एक दृढ़ संकल्प की। 


November, 2011

Village : Replica of real Bharat
 
A poet has rightly said, "है अपना हिन्दुस्तान कहाँ, वह बसा हमारे गाँव में"

'Gramin Basti Vikas Yojana' is one of the important projects under the maxim 'Sewa' of Bharat Vikas Parishad. To ameliorate the sufferings of village folk,  in various aspects of life, the Parishad, in collaboration with Jindal Foundation of Canada has undertaken this project with all sincerity and vigour in a number of villages across the country. By now-----villages have been provided with the basic amenities and the work is in hand in--villages. -- villages are under the process of being taken up for development.

Dr. Shiv Jindal of Canada, a Nephrologist of eminence who is also Chairman of this project, along with his wife Smt. Sarita Jindal Vice Chairperson, visit India in the month of November every year to see for themselves, at the ground level, as to how much progress in this direction has been made. This project is being funded, to a large extent, by Jindal Foundation, Canada. The BVP fraternity extends a hearty and warm welcome to the Jindal's on their arrival in Bharat- their own beloved country.

A  brief of this Yojana appears on pages--in this issue. Suggestions from the members and other well wishers are gracefully invited.

Cow is considered a very sacred animal in our country and is fully protected and looked after by our village brotheren. Its milk, cow dung and urine are of immense medicinal value. Even lord Krishna is known as गोपालक, Protector of cows. At the time of the death of a person a cow is supposed to be given in oblation (दान).  Munshi Prem Chand a great novelist, wrote an eye opening novel  गोदान in which the plight of our villagers is exhibited. That is why the living conditions of villagers are to be improved. And Jindal Foundation is doing a commendable job in this direction. Gopashtami  falls on 3rd Nov.

It is said children are the future of this country. Towards this notion, 14th Nov. is celebrated as Children’s Day (Bal Divas). But the number of our Rag Pickers is on the increase day by day. Is our Govt. sincere in its efforts to check the growth in the no. of infanticide. Our children need much care which is lacking both in the educational institutions and medical centers. BVP is, however, committed to hold 'Bal & Yuva 'Sanskar Shivirs' which are of great help to them in their future lives.

We also remember a renowned dramatist & poet of Sanskrit literature : Kalidas (7.11) who wrote अभिज्ञान शाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम् and मेघदूत etc. Cloud messenger (मेघदूत ) is an extraordinary piece of poetry ever written. A tribute is paid to this poet laureate when it is said 'उपमा कालिदासस्य' i.e. there is no parallel to the similes of Kalidas. Guru Nanak (Chand) jayanti is also celebrated on 10th Nov. He was also a poet who wrote in Punjabi Language and his poetic excellence is penned in 'गुरु ग्रन्थ साहिब'. On one side he says 'नानक दुखिया सब संसार' and on the other he gives a remedy to such sufferings by saying नानक (प्रभु) नाम जहाज है चढ़े सो उतरे पार.. We should have full faith in the name of 'God', the Almighty. Let us not forget the sacrifices of another martyr Guru Teg Bahadur (24.11), the 9th Guru of Sikhs who sacrificed not only himself but his sons for राष्ट्र रक्षा and धर्म रक्षा.. He probably knew the deep meaning of स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः (॰गीता 3/35). To sacrifice oneself for the protection of ones religion is better than follow the religion of others (as desired by Aurangzeb). That is why Guru Ji is known as 'हिन्द की चादर'. During संस्कृति सप्ताह our branches do remember these spiritual leaders, writers and historians so that our children remain acquainted with our ancestors. Celebration of such days is one of the projects of BVP.

Let us now join hands to celebrate the Golden Jubilee (50th anniversary) of BVP and 150th B'day of our mentor Swami Vivekanand. Various functions are to be held during 2012-13. A detailed programme will follow.    


December, 2011

vision 2013
While discussing about spirituality Kathopanishad reveals:

                                                                                    उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत
                                                                                    क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया
                                                                                    दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।। Kath. 03.14।।

meaning thereby 'Oh ye man of the world, arise, awake and learn from the wise men. The spiritual path is beset with great obstacles. It is like walking on the sharp edge of a sharpened razor---so say the wisemen of old'.

Swami Vivekanand got the right clue from such like scriptures, as he was a well read Spiritual Soul, and made his motto: Arise, Awake and stop not till the goal is reached. Swami Ji is the icon of Bharat Vikas Parishad.

What a nice coincidence! Swamiji's 150th B'day and Bharat Vikas Parishad's Golden Jubilee both are to be celebrated in the year 2013. A year long celebrations are to be flagged off on 12th January 2012 when the BVP National Office Bearers have decided that Every Branch of BVP shall organize a human chain (मानव श्रृंखला) in their areas to spread the message of Swami Ji and bring home the Five Maxims  (सूत्र) of BVP. On the same day a Life Size statue of Swamiji will be installed and unveiled in the premises of the Central Office of BVP in Delhi.

Various programmes, seminars, festivities are to be organised at places connected with Swami ji's yatra which are going to be very encouraging and informative for our members and elite of the towns. Centre/Prant/Zone/ Branch Office Bearers are reguested to remain in touch with the BVP’s HQS and read every issue of NITI for further information. All the relevant publicity material will be provided by the centre. Whenever, wherever they hold or attend any meeting, kindly apprise the audience about the year long Festivities of the Parishad. Let people join in large nos. to make every occasion a grand success. For this I will add "To accomplish great things we must first Dream, then Visualize, then Plan..... Believe..... Act".

Swami Vivekanand is considered to be a spiritual leader but Swami Shraddhanand (23.12) laid the Foundation stone of Gurukul Kangri at Haridwar for the cause and spread of ancient Gurukul system of Education. Today it is one of the leading educational institutions. But alas! This Saraswati- Putra was snatched from us on 23.12.1929 when Abdul Rashid fired point blank at the Swamiji and made him immortal.His book 'कल्याण मार्ग का पथिक' is worth reading.

'सवालाख से एक लड़ाऊँ तब गोविन्द सिंह नाम कहाऊँ' is a very famous phrase attributed to the 10th Guru of Sikh’s Guru Govind Singh, a warrior. His picture with a बाज (Hawk) sitting on one of his fingers is attractive but reveals many tales.

We bow our heads in reverance to all these noble souls who remained committed to see the unruffled flag of Akhand Bharat fluttering high for all the times to come.

It is rightly said "Commitment turns a promise into reality". Let us join hands for its fulfillment


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