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                                    Niti Editorials : 2009
January संगीत का जादू
February संस्कार अभी भी जीवन्त हैं
March वर्ष 2008-09 - एक नजर
April USHERING IN THE NEW YEAR
May भाविप शरणं गच्छामि
June REMEMBERING A STALWART
July ...Till the Goal is reached
August हमारी सांस्कृतिक विरासत
September On The Path of Progress - Each Member - Enroll One New Member /
विजयदशमी पर विशेष - मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम
October On The Path of Progress - Branch expansion / दीपावली - पंच महोत्सव पर्व
November हमारी प्रेरणास्रोत विभूतियाँ
December कर्त्तव्यनिष्ठा


January, 2009

संगीत का जादू
चार वेदों - ऋक्, यजु:, साम और अथर्व - में क्रमश: ज्ञान, कर्म, उपासना और विज्ञान सम्बन्धी विषयों का भरपूर ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। परन्तु सामवेद की विषय-वस्तु की एक और भी विशेषता है और वह है ``संगीत´´-गायन-कला। शास्त्रीय संगीत हो या वाद्य-यंत्रों का ज्ञान, सरगम की समरसता हो या स्वरों का आरोह-अवरोह- संगीत विद्या का कोष है सामवेद। 1875 मंत्रों (ऋचाओं) के इस वेद का यही महत्व है। श्रीमद्भगवद् गीता में श्री कृष्ण भी स्वयं कहते है `वेदानाम् सामवेदो •अस्मि´ वेदों में मैं सामवेद हूँ। अस्तु! मानव जीवन में संगीत का विशेष महत्व है।

इसी संगीत का परिचयांकन विभिन्न गीत प्रतियोगिताओं के माध्यम से होता है। इतना ही नहीं संगीत माध्यम है परमात्मा के पास पहुँचने का। संगीत ईश्वर की अमूल्य देन है। कहा जाता है कि जादू वह जो सर चढ़ कर बोले। संगीत ऐसा ही एक जादू है जो चंद बोलों के माध्यम से सर चढ़कर बोलने लगता है। संगीत के लिए रियाज भी आवश्यक होता है तभी प्रतियोगिता में दक्षता से प्रतिभागी बना जा सकता है।

संगीत विद्या की देवी सरस्वती का अनमोल वरदान है। यह संगीत ही तो है जो वीराने में बहार ला देता है। तानसेन का संगीत इस का सजीव उदाहरण है और इसी संगीत से जीवन की नीरसता समाप्त होती है।

संगीत सीमातीत है, Music has no boundaries। सूफियाना कलाम हो, या प्रभु के भजन, माँ की भेंटें हो या माँ भारती के लिए शीश चढ़ाने जाते समय मार्चिंग गीत, सूर के पद हों या मीरा के भजन, तुलसी और जायसी की चौपाईयाँ हों या गुरुग्रन्थ साहब के शबद, फिल्मी संगीत हो या आरती की गुंजार - संगीत की लहरियाँ अपनी तरंगों को सदा बनाए रखती हैं। श्रोता के शरीर का प्रत्येक अंग स्वयमेव तरंगायित होने लगता है। वह झूम उठता है और न जाने कहाँ खो जाता है। अद्यतन शोध ने तो संगीत को एक चिकित्सा-पद्धति भी स्वीकार कर लिया है - Music as a therapy.

भारत विकास परिषद् ने भी अपने पंचसूत्रीय कार्यक्रमों में `संस्कार´ के अन्तर्गत ऐसे ही एक प्रकल्प को अपनाया जिससे बच्चों और युवावर्ग में अपनी सभ्यता, संस्कृति और मातृ-भू के प्रति आस्था जागृत हो सके। और इस प्रकल्प को नाम दिया `राष्ट्रीय समूहगान प्रतियोगिता´ - हिन्दी, संस्कृत, लोकगीत और वन्दे मारतम् का सम्पूर्ण गायन।

इस प्रकल्प को इतनी प्रसिद्धि मिली है कि देखते ही बनता है। अभी पिछले दिनों ही भुवनेश्वर और रुड़की में क्रमश: हिन्दी और संस्कृत समूहगान एवं लोकगीत प्रतियोगिताओं का भव्य आयोजन हुआ। पत्रिका के मुखपृष्ठ पर उसी की थोड़ी सी झलक है। शेष फिर!


February, 2009

संस्कार अभी भी जीवन्त हैं
`नीति´ के दिसम्बर, 2008 अंक में मैंने लिखा था `चलो हस्तिनापुर´ - एक ऐसा शहर जिसका ऐतिहासिक एवं धार्मिक दोनों दृष्टियों से विशेष महत्व है और रहेगा। जैन धर्म गुरुओं के मंदिर, अट्टालिकाएँ और भव्य निवास स्थल। ऋषभ से महावीर तक चौबीसों तीर्थकरों की संगमरमर से निर्मित मूर्तियों को देखकर जो मन: शान्ति प्राप्त होती है उसके उपरान्त कोई नकारात्मक विचार कभी उत्पन्न हो ही नहीं सकते। मानसिक शान्ति प्रदायिनी पूजा स्थल।
ऐसे मनोहारी वातावरण में जब 27 दिसम्बर की संध्या को कार्यक्रम स्थल पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कतिपय शाखाओं के परिवारों द्वारा प्रस्तुत किया गया तो ऐसा आभास हुआ कि परिषद् का `संस्कार´ बिन्दु स्वत: चरितार्थ हो गया। एक ही परिवार की प्रथम प्रस्तुति; परिवार की सन्ततियों का एकल नृत्य, एकल गायन और यौगिक मुद्राओं का लचीला प्रदर्शन, `मेरा भारत´ में विभिन्न प्रदेशों की सांस्कृतिक झलकियां-नृत्य एवं संगीत और सबसे बढ़कर देश पर बलिदान होने वालों के प्रति अगाध श्रद्धा के प्रकटीकरण ने तो खचाखच भरे हॉल में बैठे सभी दर्शकों की आँखें मानो नम कर दी हों। इतना ही नहीं प्रदूषण की समस्या से मानव कैसे जूझ रहा है और उसका निदान क्या है इस प्रस्तुति ने भी अपनी अमिट छाप छोड़ दी। मजे की बात तो यह रही कि तीन घण्टे की समूची प्रस्तुतियाँ परिषद् परिवार की बाल-बालिका-नर-नारी द्वारा ही बड़े कौशल से संजोई गई थीं। शायद इसीलिए ऐसा आभास हुआ कि समाज के घटकों में संस्कारों को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए परिषद् आज भी कृत संकल्प है। इसलिए बाल संस्कार, युवा संस्कार, परिवार संस्कार, प्रौढ़ संस्कार आदि शिविरों का आयोजन निरन्तर होता रहता है।

फरवरी मास की `नीति´ आपके हाथ में है। इस महीने में शिवरात्रि का पर्व विशेष महत्वपूर्ण है। शैव मतावलम्बी दिन भर उपवास कर `भोले-बाबा´ को मनाते हैं, उनका आशीष प्राप्त करते हैं, उनके गीत गाते हैं और `पिण्डी´ पर दूध चढ़ाते हैं। `शिव´ का एक अर्थ है कल्याण - `शिवसंकल्पमस्तु´ वेद वाक्य है। उस रात्रि को आर्य समाजी `बोध-रात्रि´ की संज्ञा देते हैं क्योंकि उसी रात मूलशंकर नाम वाला बालक सच्चे शिव की खोज़ में निकल पड़ा था जो बाद में महर्षि दयानन्द के नाम से विश्व विख्यात हुआ और जिसने बम्बई में प्रथम `आर्य समाज´ की स्थापना की। उनके रचे ग्रन्थों में `सत्यार्थ प्रकाश´ एक मील का पत्थर बन कर उभरा है। उसके सम्बन्ध में संक्षिप्त जानकारी पाठक आगामी पृष्ठों में प्राप्त कर सकेंगे। अब तो इसका अंग्रेजी अनुवाद `'The Light of Truth´ भी उपलब्ध है।

भारत-भू पर जन्मे ऐसे ही ऋषियों, मुनियों, साधु-सन्तों और विचारकों के सारगर्भित विचार-समुच्चय के कारण ही शायद संस्कार अभी भी जीवित हैं।


March, 2009

वर्ष 2008-09 - एक नजर
भारत विकास परिषद् के मुखपत्र (Mouthpiece) `नीति´ का मार्च 2009 का अंक आप के हाथ में है और इसके साथ ही परिषद् का वित्तीय वर्ष भी समाप्त होता है। गत वर्ष की उपलब्धियों का संक्षिप्त विहंगावलोकन और तत्सम्बन्धी भावी चिन्तन किसी भी संस्था के लिए आवश्यक हो जाता है।

संगठनात्मक दृष्टि से केन्द्र के चारों निर्वाचित पदाधिकारियों का पारस्परिक सकारात्मक तालमेल अत्यन्त स्तुत्य है। `विजन 2013´ को ध्यान में रखते हुए शाखाओं और तदनुरूप परिवार-सदस्यों में उत्तरोत्तर वृद्धि `विकास मित्र´ और `विकास रत्न´ बनाने की होड़ में परिषद् सदस्यों की भूमिका सराहनीय है। इस वर्ष तो इस कड़ी में एक नया आयाम जोड़ दिया गया `विकास समर्पित´। परिषद् कार्य के लिए मनसा-वाचा-कर्मणा समर्पित कार्यकर्ता भी यथा समय सम्मानित होते रहें, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। इस हेतु पिछले महीने 14-15 फरवरी, 2009 को हैदराबाद में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारी मण्डल की बैठक में प्रथम बार परिषद् के 13 वरिष्ठ एवं कर्मठ सदस्यों को `विकास समर्पित´ सम्मान से सम्मानित किया गया। आशा है इस कदम से परिषद् के अन्य कर्मठ सदस्यों को भी सद्प्रेरणा और प्रोत्साहन मिलेगा। भारत विकास परिषद् के प्रथम राष्ट्रीय महामंत्री स्व. डॉ. सूरज प्रकाश जी की स्मृति में इस बार द्वितीय `उत्कृष्टता सम्मान´ भी उपरोक्त बैठक में
'Ekal Vidyalaya Foundation of India' को पूरी श्रद्धा और आदर के साथ दिया गया। प्रथम `उत्कृष्टता सम्मान´ दो विख्यात संन्यासियों को दिया जा चुका है।

संस्कार के क्षेत्र में पहली बार पतंजलि योगपीठ हरिद्वार के महामंत्री श्री बालकृष्ण जी के प्रयास से `आस्था´ चैनल पर, योगपीठ के भव्य भवन में आयोजित, `राष्ट्रीय संस्कृत समूहगान एवं लोक गीत´ प्रतियोगिता के समूचे कार्यक्रम की दिनांक 11.12.2008 को लगातार 4 घण्टे की प्रस्तुति की गई जो विश्व के कई देशों में भी देखी गई। भारत विकास परिषद् के नाम से अप्रवासी भारतीयों का भी परिचय हुआ, यह विशिष्ट उपलब्धि रही। राष्ट्रीय स्तर पर फाजिलका (पंजाब दक्षिण) में आयोजित `अखिल भारतीय भारत को जानो´ प्रतियोगिता में भाग लेने समस्त भारत से आए स्कूली
विद्यार्थियों ने जब पहली बार भारत-पाक सीमा को देखा, वहाँ के कमांडरों से हाथ मिलाया, उनके द्वारा मिठाई बांटी गई तो ऐसी स्थिति में वे नवयुवक भारत विकास परिषद् को कैसे भूल सकते हैं। सामूहिक सरल विवाह में गृहस्थ बनने वाले युगल परिषद् के सदा आभारी रहते हैं। पहली बार  कन्याकुमारी में आयोजित परिवार संस्कार शिविर में जम्मू-कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक 500 से अधिक परिवारों की शिरकत ने लघु भारत का दृश्य उपस्थित कर दिया।

सेवा के क्षेत्र में कनाडा के डॉ. शिव जिन्दल एवं श्रीमती सरिता जिन्दल ने प्रतिवर्ष 2 या उससे अधिक नामांकित भारतीय गाँवों को `आदर्श गाँव´ बनाने की जो स्वीकृति प्रदान की है वह भी परिषद् की पारदर्शिता की एक उपलब्धि है। लाखों विकलांग लोगों में नि:शुल्क अंग वितरण करने की दिशा में तो यह परिषद् कतिपय विशिष्ट सम्मान पहले से ही अर्जित कर अपनी साख बनाए हुए है। और अभी दिसम्बर, 2008 में पटना (बिहार) में `संजय आनन्द विकलांग अस्पताल एवं रिसर्च केन्द्र´ का लोकार्पण भारत को विकलांग मुक्त करने की दिशा में एक और मील का पत्थर बन गया।

परिषद् के प्रकाशनों की बात करें तो `ज्ञान प्रभा´ का वर्ष 2008 से त्रैमासिक प्रकाशन भी एक उपलब्धि रही। परिषद् की बेवसाईट अब हिन्दी में भी उपलब्ध कराई जा रही है। इस पर परिषद् सम्बन्धी समस्त जानकारी चित्रों सहित, प्राप्त होती रहती है।

परिषद् अपने इसी पक्के इरादे से पूरी निष्ठा के साथ भविष्य की चुनौती का सामना करती रहे, यही कामना है। वैदिक ऋचा में कहा गया है : -
vks…e~ स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव।
पुनर्ददताघ्नता जानता संगमेमहि। (ऋक्
Œ
4-51-15)

अर्थात् हे ईश्वर! जीवन मार्ग में कल्याण की भावना से हम विचरें, जैसे सूर्य और चन्द्रमा सबके कल्याण के लिए विचरते हैं। पुन: प्राणिमात्र के प्रति सहायक और किसी को दु:ख न देते हुए तथा ज्ञान सम्पन्न मनुष्यों के साथ हम सब मिलकर चलें।

- ध.व.स


April, 2009

USHERING IN THE NEW YEAR
Nav-Samvatsar 2066, the new (Indian) year falls, this year, on 27
th March 2009 as per the solar movement. There is a difference of 57 years in Gragrian Calendar and Indian Calendar with former only 2009 years old. Govt. of India has also approved Saka Samvat to be printed on all the official documents and that is 1932. Hijari Samvat, as per Muslim Calendar, is 1429. A couple of more such Samvats, which are mentioned here and there, were started generally in memory of their spiritual leaders viz
: ckS¼ lEor~ 2552] egkohj lEor~ 2536] ukud lEor~ 542 ,oa n;kuUnkCn 186-

Of the four Yugas, we are passing through Kaliyug which is said to be 5111 years old. But let us not forget that there is a l`f"V lEor~ also which dates back to 1,96,08,53,109 years. The entire cosmos, as per Brahm Puran, came into existence then. That is the reason why it is generally admitted that Bhartiya Culture is the most ancient one. I am using the term Bhartiya because in Ancient Indian History our country was known as Akhand Bharat which now is dithering away.

Although this day i.e. Navsamvat is known for many reasons :  the start of Navratras (fasting by Indian woman for nine nights); birthday of Jhulelal (of Sindhi folk); founding of Arya Samaj by Swami Dayanand; birthday of Dr. B.R. Ambedkar (architect of Indian Constitution), enthroning of Lord Ram after 14 years of exile etc. etc.; it is also connected with Harvesting activities in various states.

For Bharat Vikas Parishad Navsamvat is one of the projects which is supposed to be undertaken/ celebrated by every branch with all the sobriety and enthusiasm propagating its relevance and importance. Parishad Calendar/ Financial year also starts with Navsamvat practically from 1st April. New members, new branches, new office-bearers, oath taking ceremonies, giving away charters to the new branches and the like are the activities undertaken right from April –May onwards.

And now when the Parishad is to celebrate its Golden Jubilee, Mission and Vision 2013 has already been in place and is being worked out successfully at various levels.

For  achieving our targets while we invoke blessings of the Almighty, we, at Branch / Prant / Centre level have also some responsibilities to shoulder.

In this connection I take this opportunity to reproduce below an ‘edit’ that appeared in Vivekanand  (Gwalior) branch's,monthly brochure ‘Utkarsh’ in Sept.2008 that is extremely relevant in the present context:

``एक अज्ञात कवि ने कहा है-
              खोल करके खिड़कियाँ देखो जरा, बंद कमरो में सफर होता नहीं।
            जिनके अन्दर शेष होती रोशनी, उनको अंधियारों का डर होता नहीं।

क्या आपको भारत विकास परिषद् की सदस्यता ग्रहण करते समय ली गई शपथ याद है? यदि नहीं, तो हम बता दें कि उस शपथ में आपने कहा था :
``मैं भारत विकास परिषद् की सदस्यता और उनकी अन्तर्भूत मर्यादाओं को सहर्ष अंगीकार करता हूँ..... मैं संकल्प करता हूँ कि यथाशक्ति भारत के सर्वांगीण विकास के लिए सदैव सचेष्ट रहूँगा और भारतीय जन-जीवन के उत्कर्ष में अपना विनम्र योगदान देने के लिए सदैव तत्पर रहूँगा।´´
आइए! आज हम स्वयं व्यक्तिगत रूप से आकलन करें कि क्या हम परिषद् के सदस्य के रूप में अपने दायित्व का निर्वहन उचित रूप से कर रहे हैं? मुझे विश्वास है कि ईमानदारी से किये गये आकलन का केवल और केवल एक ही निष्कर्ष होगा कि हममें से बहुसंख्यक सदस्य ऐसा नहीं कर रहे हैं।
अनुभव दर्शाता है कि सहभोज सहित मासिक परिवार-बैठक को छोड़कर परिषद् के किसी भी अन्य संस्कार और सेवा कार्यों में सदस्यों अथवा उनके परिजनों की उपस्थिति लगभग नगण्य रहती है। बहुधा ऐसा होता है कि किसी आयोजन की व्यवस्था के लिए सदस्यों की वांछित संख्या जुटा पाना भी कठिन हो जाता है। आखिर ऐसा क्यों है? क्यों हममें से अधिकांश सदस्य केवल मासिक बैठक में परिजनों सहित अपनी उपस्थिति को परिषद् के साथ अपने संबंधों की इतिश्री मान लेते हैं। क्या हम ऐसा सोचते हैं कि परिषद् की बाकी सभी गतिविधियों के संचालन का दायित्व केवल दायित्वधारियों के ऊपर है? यदि ऐसा है, तो हमें तुरंत अपनी सोच को बदलने की आवश्यकता है।
याद रखिये! यह संगठन हम सभी का है, उसे सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी भी हम सबकी है। अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की थोड़ी सी कीमत पर भी हमें संगठन के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने की आदत डालनी होगी, तभी हम परिषद् की सदस्यता के साथ न्याय कर पायेंगे। क्या आप ऐसा करेंगे? हमें विश्वास है कि आप ऐसा अवश्य करेंगे, क्योंकि एक विचारक के अनुसार-
"किसी भी व्यक्ति को जिम्मेदारी समृद्ध बनाती है और किसी भी समाज को जिम्मेदार लोग। जब आप जिम्मेदारी लेने लगते हैं, तो आप अपना विस्तार करते हैं।´´   

- ध.व.स.


May, 2009

भाविप शरणं गच्छामि
भारत विकास परिषद् के वर्ष 2009-10 के चुनाव परिणाम, शाखा एवं प्रान्त के स्तर पर, अप्रैल और मई माह में, Calendar of Events के अनुसार, केन्द्रीय कार्यालय में भी पहुँचने लगे हैं। उत्साहवर्द्धक बात यह है कि प्राय: ये सभी निर्वाचन सर्वसम्मति और सद्भावना के वातावरण में सम्पन्न हुए।

दूसरी ओर यह एक संयोग (Coincidence) ही है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के आम चुनाव भी मध्य अप्रैल से मध्य मई तक हो रहे हैं। परन्तु विभिन्न राजनैतिक दलों के नेता जैसी शब्दावली का प्रयोग करते हैं, जिस भाव भंगिमा का प्रदर्शन करते हैं और जिन बाहुबलियों की सहायता लेने हेतु उनकी शरण में जाते हैं, उससे एक बार तो मानवता थर्रा उठती है। मात्र कुर्सी के लिए जो राजनेता नीच से नीच हरकतें कर सकता है वह देश की अस्मिता, संस्कृति और मूल्यों की रक्षा क्या करेगा? जो देश को `धर्मनिरपेक्ष´ अर्थात् `धर्महीन´ बनाना चाहते हैं, देशवाशी उनसे क्या अपेक्षा कर सकते हैं?। इस लिए समय की माँग है कि इस बार इन चुनावों में शत्-प्रति-शत् मतदान करने का प्रयास किया जाए जिससे एक सक्षम सरकार बन सके।

सन् 1857 के समर का और महाराणा प्रताप के शौर्य का जब स्मरण करते हैं तो पता चलता है कि वे अखण्ड भारत की अस्मिता और रक्षा के लिए प्राणों की आहूति देने के लिए तत्पर दिखाई दिए। घास की रोटी खा कर जंगलों में छुपते-फिरते, उस प्रताप ने आततायियों से लोहा लेने की ठान ली थी। मंगल पाण्डे का नेतृत्व यदि अंग्रेजी-सत्ता के विरुद्ध विद्रोह-रत था तो महाराणा प्रताप मुगलों की नृशंसता को सहन न कर सके। आज सारा राष्ट्र उन्हें नमन करता है।

अभी पिछले महीने धर्म गुरुओं की उपस्थिति में बौद्ध-धर्म-गुरु दलाई लामा ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था कि सहिष्णुता और भाई-चारा एवं मानवीयता भारतीय मानस की विशेषता रही है। वे इससे बहुत प्रभावित भी हैं। इस धरती ने विश्व के अन्य धर्मावलिम्बयों को भी यहाँ पनाह दी।

यदि हम इसी सकारात्मक सोच और भाई-चारे को बनाए रखें तो वह समय दूर नहीं जब भारत विश्व-गुरु के पद पर आसीन होगा। बुद्ध जयन्ती पर महात्मा बुद्ध को भी हम नमन करते हैं।

भारत विकास परिषद् के प्राय: सभी प्रकल्प भारतीय संस्कृति के उन्नयन एवं मावनता के कल्याण और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा के लिए ही संजोये गए हैं। परिषद्-सदस्य शपथ लेते समय इन्हीं विचारों को दुहराते हैं तो क्यों न पूर्ण मनोयोग से हम भी `भाविप शरणं गच्छामि´ (मैं भारत विकास परिषद् की शरण में जाता हूँ) कहते हुए अपनी परिषद् को उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर ले चलने का प्रयास करें और इसके लिए आवश्यक है कि हम सब प्रभु से एक ही दिव्य वस्तु माँगें :  `धियो यो न: प्रचोदयात्´ अर्थात् हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ कर्मों की ओर प्रेरित करें। 

- ध.व.स.


June, 2009

REMEMBERING A STALWART
Come June, every member of the Parishad feels his bounden duty to fondly remember a Visionary and Chief Architect of Bharat Vikas Parishad, Late Dr. Suraj Prakash ji. 27th June will ever remain a memorable day for the Parishad when a boy named Suraj Prakash was born 89 years ago on 27th June 1920 at Chhamal Distt. Gurdaspur.

Inspite of being a Practicising Doctor he had two main aims of life: First to ameliorate the sufferings of down trodden and secondly to inculcate a sense of Patriotism and love for Motherland among the youth after China war.

The outcome was formulation of this Non Govt. Organisation having 5 leading maxims known as 5'सकार's. Down to earth Dr. Suraj Prakash had sown the seed way back in 1963 which has now grown to the height of a Banyan tree with the concrete and meaningful policies of office bearers occupying the hot seat of Secretary General of BVP & others.

Whatever the aims might have been of the (Registered) NGO, a rare letter (found recently) written by none other than that of the stature of Mahadevi Verma, one of the four pillars of छायावादी School of poetry प्रसाद, पन्त, निराला एवं महादेवी of Allahabad and a patron of BVP Prayag Branch, is being reproduced below which is well thought provoking:

``भारत विकास परिषद् का क्षितिज इतना व्यापक है कि उसके विकास को एक आयाम में बाँधना कठिन होगा। भारत एक भौगोलिक इकाई है, अत: उसके हिमाच्छादित शिखर, नदी, निर्झर, बन-सम्पत्ति आदि से सौन्दर्य को सुरक्षित रखना भी विकास का कार्य है। उसमें बसने वाले मानव समूह के बुद्धि-हृदय का ऐसा परिष्कार करना कि वह `वसुधैव कुटुम्बकम्´ की भावना को आत्म सात कर सके भी भारत विकास का आयाम है। उसमें सुविधा सम्पन्न ग्राम नगर आदि की स्थापना करना, साहित्य, कला, शिक्षा आदि का विकास करना भी भारत की सेवा है।

उसमें निवास करने वाले मानवों में राष्ट्र चेतना जागृत करना और सत्य, अहिंसा, समता, बन्धुता आदि जीवन मूल्यों की आस्था सम्पन्न करना भी भारत का विकास है। पर इन सबके लिए जो अनिवार्य गुण है, वह दृढ़ संकल्प है, जिसके अभाव में कोई कार्य सम्भव नहीं है। और यह संकल्प सम्पूर्ण जीवनी-शक्ति चाहता है। वह संकल्प इसके सदस्यों को प्राप्त हो, यह शुभ कामना है।
शुभास्ते पन्थान: सन्तु!
-महादेवी, प्रयाग, 3 अप्रैल 1985´´

There is also enough of hue and cry on all fronts about Environment and 5th May 09 happens to be world Environment Day. Actually the entire humanity is responsible for polluting the five elements of nature viz: earth, water, energy, air and sky. If we don’t take appropriate measures immediately to rectify all this negativity the future progeny will never forgive us.

It is heartening to note that the central office of BVP has announced that ‘Utkrishtata Samman’ for the year. 2008-09 will be awarded to person / organisation who has done commendable work in the field of Environment.

Let, us therefore, pray and act day and night for creating awareness for pollution free atmosphere by chanting 'शान्ति मन्त्र' - ओम् द्यौः शान्ति........etc. 

- D.V.S


July, 2009

...Till the Goal is reached
In my editorial that appeared in the June issue of NITI we fondly remembered (Late) Dr. Suraj Prakash, the architect of Bharat Vikas Parishad on his birthday. And the entire fraternity of BVP celebrated with gusto his B’day on 27th June 2009.

It was the result of his farsightedness and acumen that the FIRST BRANCH of the Parishad was established at Delhi on 10 July 1963. All the branches will celebrate स्थापना दिवस in a befitting manner on that day. But who was the role model? Needless to say that the brains that collectively worked for the establishment of an organisation that had lofty aims of SANSKAR & SEWA chose none other than Swami Vivekanand as their mentor. It was Swamiji who had held high the banner of भारतीयता in the Parliament of Religions held at Chicago on 11th September 1893. There was no end to the thunderous applause that the great Swami received when he addressed the elite gatheringwith the words "Sisters and Brothers (of America)". A Spiritual leader, Philosopher and Positive Thinker, Swami Vivekanand, even today, is considered in high esteem by the youth of the country. And we in Bharat Vikas Parishad pay our respectful homage to the great Sanyasi who breathed his last on 4th July 1902. ‘Arise, Awake and Stop not till the goal is reached’, as propounded by Swami ji based on Upanishdic Philosophy, will ever remain our guiding principle.

The month of July is also important because Guru Purnima falls on 7th instant.

                                                                        गुरुर्ब्र्ह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः
                                                                   गुरुः साक्षात् परब्र्ह्म तस्मैः श्री गुरुवे नमः

A teacher is always considered the embodiment of ब्र्ह्मा, विष्णु और महेश i.e. Trinity or त्रिदेव A teacher, thus, is not supposed to betray the confidence reposed in him by the society. Linked with the same day is व्यास पूजा the birthday of  महर्षि वेद व्यास who penned the historical epic Mahabharat.

Let me add : on the seat where a teacher or preacher sits and delivers discourses is known as व्यास-पीठ the seat of wisdom. Hence the responsibility and duty of the ‘GURU’ increases when he occupies that pious place.

We, in this organisation, therefore, should put in our best and be the torch-bearers for the society. Keep in mind our Vision 2013 and work collectively to achieve the targets fixed by ourselves.

- D.V.S


August, 2009

हमारी सांस्कृतिक विरासत
`वसुधैव कुटुम्बकम्´ - पृथ्वी पर रहने वाले समस्त प्राणी मेरे लिए एक बृहद् परिवार के समान हैं; `सर्वे सन्तु निरामय:´ - सभी प्राणी स्वस्थ एवं नीरोग रहें; `मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव´ - माता, पिता, गुरु और अतिथि देवता तुल्य हैं; `मातृवत् पर दारेषु - पराई नारी को माँ के समान समझो; `इदं राष्ट्राय इदं न मम´ यह (आहुति) राष्ट्र के लिए है मेरे लिए नहीं और ऐसे ही अन्य कुछेक वाक्यांश है जो भारतीय संस्कृति की महत्ता की ओर संकेत करते हैं। जब `समदर्शी प्रभुनाथ कहावा´ सत्य है तो सहिष्णुता की डोरी से सभी धर्मावलिम्बयों को एक सूत्र में पिरोना मात्र भारत-भू की ही विशेषता है। अलग-अलग पूजा पद्धतियाँ इस देश में सदा स्वीकार्य रही हैं। राम और कृष्ण इस धरती की सन्तान होते हुए भी युगपुरुष के रूप में पूजे जाते हैं।

जरा सोचो, ऐसा क्यों होता रहा है। और इसका एक ही उत्तर मिलता है भारतीय पर्व और उनकी पद्धतियाँ सभी को परस्पर जोड़ती हैं तोड़ती नहीं। कृष्ण जन्माष्टमी पर भला कोई (मुसलमान) कवि रसखान की काव्य लहरी से अछूता रह सकता है:

                        मानुष हों तो वही रसखान, बसों निज गोकुल गाँव की ग्वारन,
                        जो खग हों तो बसेरों करों निज कालिंदी कूल कदम्ब की डारन।।

गीता में दिया गया उनका उपदेश `कर्मण्येवाधिकार: ते´ - कर्म करना ही तेरा अधिकार है - सभी वर्गों के लिए मान्य है। `विश्वासों फलदायक:´ हमारी संस्कृति का मूलमंत्र है। आप किसी की भी पूजा, आराधना क्यों न करते हों उस आराध्य देव और अपने ऊपर अगाध विश्वास का होना नितान्त आवश्यक है। और इसी आत्मविश्वास के कारण ही तो हमारे शीर्षस्थ नेताओं ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध ``भारत छोड़ो आन्दोलन´ 9 अगस्त को चलाया था। और उसी आत्मविश्वास का परिणाम निकला 15 अगस्त को प्राप्त भारत की स्वतंत्रता परन्तु ध्यान रखना चाहिए `है सरल आजाद होना, पर कठिन है आजाद रहना´ और इस आजादी को बचाये रखने के लिए हमें निरन्तर सतर्क रहना आवश्यक है। यदि पारसी धर्मावलम्बी 19 अगस्त को अपना नव वर्ष मनाना चाहते हैं तो हम उन्हें भी साधुवाद ही देंगे।

रक्षा बन्धन (5 अगस्त) के साथ तो ऐतिहासिक-सूत्र भी जुडे हैं और अब तो मात्र बहन-भाई की रक्षा का प्रश्न नहीं अपितु यह दिन राष्ट्र (सीमाओं) की रक्षा का भी स्मरण कराता है।
हमारे देश की समस्त सांस्कृतिक धरोहर प्राचीन भाषा संस्कृत में उपलब्ध है। इसलिए 5 अगस्त को सभी प्रदेशों में `संस्कृत दिवस´ भी मनाया जाएगा। परिषद् द्वारा आयोजित `राष्ट्रीय संस्कृत समूहगान प्रतियोगिता´ भी इस उद्देश्य की पूर्ति में सहयोगी बनती है। और सभी मंगल कार्य, ध्यान रहे, गणेश वन्दन (23.8.09) से ही आरम्भ होते हैं:
                                    गाइए गणपति जग वन्दन,
                                    शंकर सुवन भवानी नन्दन।

इन्ही सांस्कृतिक सम्पदाओं की महत्ता को ध्यान में रखते हुए शायद भारत विकास परिषद् द्वारा भी `संस्कृति सप्ताह´ को एक प्रकल्प के रूप में स्वीकारा गया है। इस सप्ताह/मास में भारत की संस्कृतियों से जुड़े विभिन्न आयोजन आयोजित किये जा सकते हैं। वैसे तो इन कार्यक्रमों की केन्द्रीय कार्यालय द्वारा एक लम्बी सूची तैयार की गई है परन्तु प्रत्येक शाखा अपनी सुविधानुसार इस सूची में से कुछ कार्यक्रम छांट सकती हैं। मुख्य उद्देश्य है परस्पर भाईचारा, मानव मूल्यों की स्थापना, भावी पीढ़ी को संस्कारवान बनाना और सामाजिक दायित्वों को निभाना।

अगस्त मास से ही जहाँ भारत के मुख्य पर्व आरम्भ होते हैं, वहाँ साथ ही परिवार के संस्कार और सेवा कार्यों को गति मिलती है।
आइये! अपने कर्त्तव्य्य  का निर्वाह करते हुए परिषद् के निर्धारित प्रकल्पों को जीवन्त रखने के लिए अपने आप को सक्षम बनाएँ।


September, 2009

On The Path of Progress - Each Member - Enroll One New Member
Our nation celebrated her 63
rd anniversary of Independence last month. Our organization, Bharat Vikas Parishad, has completed its 46th year two months ago. Both have made progress substantially, if not fully. Despite all the difficulties Bharat has made good progress and is ready to take her seat among 13 great nations of the world. BVP also, despite all ups and downs, has attained a place of pride among the organizations doing social work. Running more than 1000 branches with a membership of more than 41000 families is no small achievement.

But growth, progress, expansion all are relative terms. How much growth progress and expansion will we call satisfactory? Keeping in view the huge population of our country, its bulging middle classes of 25 crores, the vast multitude of urban elites, the number of branches and the membership seem to be minuscule. Moreover making no progress means stagnation, and decay.

Year 2008-2009 was the year of branch expansion and increase in membership. It yielded some results but not that satisfactory. The campaign will continue this year as well. Let us once again remind ourselves why should we enroll new members:

(1) New members join with a new zeal and ideas and spread our massage among new people.

(2) Our branches become strong financially and new resources are discovered.

(3) Additional man power becomes available to execute Sewa & Sanskar projects

(4) Usually some old members leave every year due to various reasons. The loss is compensated by the new comers.

It is also equally important to stop old members from leaving. Some members become inactive as they feel neglected and not being given due respect and attention. Also the programmes of the branches are not very attractive and interesting. The branch office bearers should contact such members personally and try to remove the causes due to which the members are leaving the branch.

The branch president and secretary should try to involve maximum number of members in Sanskar and Sewa projects. They should be given responsibilities in the projects of there liking. Also their names should appear prominently in the news sent to the local newspapers and NITI.

The above steps will stop the erosion of strength of the branch.

This article will continue in the next issue of NITI and we will talk about expansion of branches.

 

विजयदशमी पर विशेष
                                     मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम

भगवान श्री कृष्ण को लीला पुरुषोत्तम तथा भगवान श्रीराम को मर्यादापुरुषोत्तम कहा जाता है। दोनों ही धरती पर नर रूप में अवतरित हुए थे। दोनों ही भगवान विष्णु के अवतार थे। पृथ्वी पर नर रूप में अवतार लेने का उद्देश्य भी समान था-लोकहित के लिए तथा धर्म के रक्षा के लिए अधर्म का नाश तथा दुष्टों का संहार कर धर्म परायण लोगों को अभय प्रदान करना। श्री कृष्ण ने यह कार्य मानवोचित व्यवहार कर कर्म की सत्ता में लोगों का विश्वास जगा कर किया जबकि श्रीराम ने पूरे जीवन मर्यादा का निर्वाह कर समाज में एक अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया। श्रीराम का सम्पूर्ण जीवन संयम तथा मर्यादा का अदभुत उदाहरण रहा।

वास्तव में राम चरित्र एक ऐसी कसौटी है जिस पर कस कर आप किसी भी समस्या का समाधान आज भी खोज सकते हैं। एक आदर्श पुत्र, पिता, भाई, पति या राजा कैसा हो इसका उत्तर केवल एक ही है श्रीराम। एक राजा के कर्त्तव्य्य  क्या हों, राजा का धर्म क्या हो, प्रजा पालन कैसे किया जाय, जनमत को कितना महत्व दिया जाये आदि प्रश्नों का सहज उत्तर राम चन्द्र की जीवन गाथा से मिल जाता है। राम सभी को समदृष्टि से देखते हैं।

एक आदर्श पुत्र के रूप में जहाँ राम पिता के वचन की लाज रखने लिए सहर्ष चौदह वर्ष के वन गमन को स्वीकार करते हैं, वहीं पर गुरु विश्वामित्र के साथ विद्याध्ययन के साथ-साथ राक्षसों का संहार कर आदर्श आज्ञाकारी शिष्य के धर्म का भी निर्वाह करते हैं।
                                                                         लाज पिता के वचन की, निभा चले रघुवीर,
                                                                        वन में रह चौदह बरस, हर ली सब की पीर।

भगवान श्रीराम के वन गमन के पीछे जहाँ एक ओर पृथ्वी को रावण जैसे अनेकानेक राक्षसों के आतंक से मुक्त कराना एक उद्देश्य रहा वहीं पर समाज में ऊँच-नीच का भेद मिटाकर प्रेम भक्ति व समानता की स्थापना करना भी एक लक्ष्य रहा है, यही नहीं पशु पक्षियों तथा वनों के प्रति भी मानव के मन में प्रेम की अलख जगाना तथा उनकी उपयोगिता के प्रति जागरूक करना भी एक उद्देश्य रहा। श्रीराम जहाँ एक ओर गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का उद्धार करते हैं, वहीं वे भील जाति की महिला शबरी की भक्ति भावना के वशीभूत होकर उसके झूठे बेरों को बड़े उल्लास के साथ ग्रहण कर समाज में समानता का आदर्श स्थापित करते हैं तथा निषाद के प्रेम और भक्ति के कारण मानव को भव सागर से तारने वाला विधाता स्वयं उसकी नाव से गंगा पार कर उसे श्रेय प्रदान करता है।

                                                                          शबरी के बेरों बसी, ऐसी मधुर मिठास,
                                                                          झूठन भी खाते प्रभु, उमड़े मन उल्लास।
                                                                         चुन चुन शबरी दे रही, अपने झूठे बेर,
                                                                         प्रेम मगन प्रभु खा रहे, करत न थोड़ी देर।

श्रीराम के प्रत्येक कार्य के पीछे एक संदेश छुपा है। यदि आज के राजनेता उसे समझकर उसका अंशमात्र भी ग्रहण कर लें तो समाज का चित्र ही बदल जाएगा। राम राज्य में लोकाचार व जनमत को कितना अधिक महत्व दिया जाता था उसका उदाहरण यह है कि सर्वशक्तिमान राजा ने एक साधारण धोबी के कहने मात्र से अपनी पत्नी सीता का त्याग करने में जरा भी संकोच नहीं किया और जानकी के वियोग को चुपचाप सहा।

                                                                       धोबी के दो बोल से, किया सिया का त्याग
                                                                       आदर जनमत का किया, सह वियोग की आग।

श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करते समय वानर और भालुओं की फौज तैयार की तथा उसी से रावण का विनाश किया। हनुमान, सुग्रीव, जामवंत, नल, नील आदि सैकड़ों, हजारों बलशाली वानर और भालुओं को राम का स्नेह प्राप्त हुआ। राम ने शत्रुओं पर भी दया दिखलाई तथा प्रत्येक पल मानवता को सर्वाधिक महत्व दिया। वे जहाँ विभीषण से मित्रवत व्यवहार कर उसे लंका का राजा बनाते हैं वहीं पर अपनी पत्नी के अपहरणकर्त्ता रावण की पत्नी मंदोदरी को भी रावण की मृत्यु के पश्चात् यथोचित सम्मान देकर नारी जाति के प्रति अपना सम्मान प्रकट कर समाज में नारी को श्रद्धा व सम्मान प्रदान करने का संदेश भी देते हैं।


October, 2009

On The Path of Progress - Branch expansion
In the September issue of NITI we discussed the importance of enrollment of new members and also how to increase their numbers. But mere increase in the number of members will not lead us on the real path of progress. The number of branches should also be increased. India is a country of myriad languages, festivals, traditions and even regional cultures. An all India organization like BVP will become truly national when its branches cover all the regions of the country. So far, we have been able to cover almost 50% of the districts. Hence the importance of branch expansion cannot be over emphasized.

There is one more fact. If we open 5 new branches 3 old branches become inactive. So, the office bearers entrusted with the task of branch expansion carry the dual responsibility: opening new branches and stopping old branches from becoming inactive. Both the tasks require hard work and ingenuity.

To prevent the branches from becoming inactive the general secretary of the Prant should be very vigilant. If the branch fails to remit the prant or central share or does not send the monthly statement, a personal contact on phone or a personal visit is imperative. Alternatively some other prantiya executive committee office bearer may be deputed to find out the factual position.

The branches become inactive due to mutual differences or wastage of money. Sometimes the executive committee members act in an autocratic way, undertake programmes unrelated to BVP or use their position for ulterior motives. These things should be analyzed and settled amicably.

For opening a new branch, the town or locality should be identified and a convener appointed. The convener should be a person of some social standing and active in social circle. He should be provided with a receipt book, some BVP literature, a copy of constitution and membership forms. He should enroll 25 members after filling up the forms and collecting the membership fee.

There after the office bearer entrusted with the task of opening the branch should convene a meeting of the members and one president, one secretary and one treasurer should be elected. A date for installation ceremony should be fixed in consultation with the Prant General Secretary.

For the financial year 2009-10 a target of 50000 members and 1200 branches has been fixed. We must all strive hard to achieve the target.

दीपावली - पंच महोत्सव पर्व
दीपावली भारत के प्रमुख त्यौहारों में ऐसा पर्व है जो राष्ट्रीय एकता और सद्भाव को दर्शाता है। व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक पांच पर्व मनाये जाते हैं। सर्वप्रथम धनतेरस, धनवन्तरी जयंती के रूप में मनाया जाता है। उन्हें आयुर्वेद का जनक कहा जाता है तथा घर से बाहर अकाल मृत्यु से बचने के लिए यमराज को दीपदान किया जाता है। घर में नए बर्तन व वस्त्र आदि खरीदे जाते हैं। दूसरे दिन नरक चतुर्दशी का त्यौहार आता है इस दिन वामन अवतार ने राजा बलि से दान में तीन पग भूमि मांगी थी तथा प्रसन्न होकर वरदान दिया था कि आज के दिन जो दान करेगा लक्ष्मी सदा उसके घर में वास करेंगी।

कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली के दिन लक्ष्मी गणेश का पूजन कर सुख-समृद्धि तथा ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रार्थना की जाती है। इस दिन दीप जलाकर सारे वातावरण को प्रकाशित किया जाता है। भगवान राम लंका से विजय प्राप्त करने के बाद इसी दिन अयोध्या लौटे थे। भगवान श्री कृष्ण ने अपना शरीर भी इसी दिन छोड़ा था। जैन धर्म के अंतिम तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी ने भी इसी दिन निर्वाण प्राप्त किया तथा आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भी दीपावली के दिन ही निर्वाण प्राप्त किया था। स्वामी रामतीर्थ तो दीपावली के दिन ही जन्मे तथा इसी दिन जल समाधि ली।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा की जाती है तथा अन्नकूट का भोग लगाया जाता है। द्वितीया को भैया दूज मनाई जाती है, इसे यम द्वितीया या भ्रात द्वितीया भी कहा जाता है। इस दिन बहनें भाईयों को मंगल टीका कर उनकी कुशलता की तथा समृद्धि की कामना करती हैं।

इस प्रकार दीपावली को `पंच महोत्सव´ पर्व कहा जाता है। परिषद् परिवार की ओर से आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ।


November, 2009

हमारी प्रेरणास्रोत विभूतियाँ
महापुरुषों की एक लम्बी जमात सदा अपने अनुयायियों को ही नहीं बल्कि मनुष्य-जाति को सद्-प्रेरणा और सत्य की सीख देती चली आई है परन्तु क्या हम उसमें से कुछ भी संजो सके हैं? यह प्रश्न चिन्तन का है।

सिक्ख धर्म के प्रणेता गुरु नानक ने कितनी सहज भाषा में कहा था -

`नानक दुखिया सब संसार, सोई सुखी जो नाम आधार´।

क्या कभी सत्य निष्ठा से हमने अपने प्रभु का स्मरण किया है। ``नानक नाम जहाज है, चढ़े सो उतर पार´´ कितना सत्य उपाय है। परन्तु हम हैं कि अर्थ लोलुपता की चका चौंध में सब कुछ भुला बैठे हैं। गुरु नानक जयन्ती पर अपने मन को अवश्य टटोलना चाहिए।

नेहरु का जन्म दिवस वैसे ही `बाल दिवस´ बन गया जैसे डॉ. राधकृष्णन् का `शिक्षक दिवस´। क्या हम कभी अपने बचपन को लौटा पाएँगे। राजनीति का क्षेत्र हो या साहित्य का पं. नेहरु का चिन्तन आज भी प्रेरणादायक है - ' We have miles to go ,and miles to go'.

प्रस्तुत मास में लाला लाजपत राय और गुरु तेग बहादुर की पुण्य तिथि भी मनाई जाती है। दिल्ली के चाँदनी चौक में सरेआम अंग्रेजी तानाशाही का पुरजोर मुकाबला करते हुए जिस व्यक्ति ने `सीने पे खाई गोलियाँ´  उस अमर शहीद लाला जी की शहादत एक दिन रंग ले लाई। और गुरु तेग बहादुर का बलिदान भी धर्म की रक्षा हेतु ही हुआ था। वह गुरु भी थे और तेग (तलवार) के धनी भी। धर्म की रक्षा हेतु एक संत ने अपनी कुर्बानी दे दी। शायद वे गीता के मर्म को जानते थे:

स्वधर्मे निधनं श्रेय: पर धर्मों भयावह: (3/35)

`अपने धर्म में (उसकी रक्षा के लिए) मर जाना भी श्रेयस्कर है किन्तु दूसरे का धर्म भयावह (डरावना) है´।

ऐसे शूर वीरों का, धर्म प्रेमियों का बलिदान ही भारत को दासता की जंजीरों से मुक्त करा सका है। किन्तु खेद इस बात का है कि देश तो मुक्त हुआ परन्तु मानव की वास्तविक मुक्ति नहीं हुई।
जिस देश के बारे में किसी कवि ने कहा था :

है अपना हिन्दुस्तान कहाँ,
वह बसा हमारे गाँवों में।

उसी देश का किसान आत्म-हत्या के लिए मजबूर हो जाता है। कैसी शर्मनाक स्थिति है। इसे हम राजनीति का जामा नहीं पहनाना चाहते। भारत विकास परिषद् ने तो जिन्दल फाउण्डेशन, कनाडा के साथ मिलकर ग्रामोद्धार की एक ऐसी योजना बनाई है जिससे ग्रामीण भाईयों का जीवन-स्तर सुधर सके। स्वास्थ्य, साक्षरता, पेय-जल और अन्य मूलभूत सुविधाओं को प्रदान करने की दृष्टि से आज भारत के लगभग 15 गाँवों को `आदर्श गाँव´ बनाने के लिए बड़ी तेजी से कार्य चल रहा है। इस योजना के प्रणेता युगल-दम्पति डॉ. शिव जिन्दल एवं श्रीमती सरिता जिन्दल जी का भारत आने पर परिषद् परिवार की ओर से हार्दिक स्वागत है। वे स्वयं इस कार्य की प्रगति का जायजा लेने हर साल भारत आते हैं।

भारत विकास परिषद् अपने सभी कार्यक्रमों और प्रकल्पों के माध्यम से संस्कार और सेवा के कार्यों में लगी हुई है, यह स्वाभिमान का विषय है।

इस संस्था को अधिक बल देने और सुदृढ़ बनाने के लिए नई शाखाओं को खोलने और चली आ रही शाखाओं को सींचते रहने की महती आवश्यकता है।

इस महान् कार्य में आप भी जुड़े और दूसरों को भी सहभागी बनने की प्रेरणा दें।

 ध.व.स.


December, 2009

कर्त्तव्यनिष्ठा
ऋग्वेद के संगठन सूक्त का दूसरा मंत्र है :

        संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
       देवा भागं यथा पूर्वे सं जनानां उपासते।।

अर्थात्
        प्रेम से मिलकर चलें बोलें सभी ज्ञानी बनें।
       पूर्वजों की भाँति हम कर्त्तव्य के मानी बनें।।

एक साथ चलने, एक साथ बोलने और एक जैसा सोचने एवं सभी को अपने कर्त्तव्य-पथ पर अग्रसर होने की सीख प्रभु स्वयं देते हैं। इसका एक वैज्ञानिक कारण है ``संघे शक्ति कलियुगे´´ अर्थात् किसी भी संस्था की शक्ति उसके पारस्परिक संगठन में होती है।

परिषद् के कर्णधारों ने सन् 2013 तक की उपलब्धियों की अपनी एक योजना बनाई है और परिषद्-परिवार के सभी सदस्यों से उनका आग्रह है कि एक साथ जुड़ कर, एक ही विचारानुसार उस लक्ष्य तक पहुँचने का प्रयास किया जाए और इस कार्य हेतु आवश्यक है पारस्परिक पहचान (सम्पर्क) और तदनन्तर सहभागिता (सहयोग) की प्रार्थना। इसके लिए आवश्यक है कि अभी से परिषद् का प्रत्येक सदस्य घर से बाहर निकले और इस चुनौती को स्वीकार करता हुआ अपने कर्त्तव्य की इतिश्री न होने दे। `तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों का निमंत्रण´- इस निमंत्रण अर्थात् चुनौती को स्वीकारते हुए प्रत्येक सदस्य को अपने पास परिषद् का अंग्रेजी और हिन्दी में प्रकाशित चार पृष्ठों का `परिचय´ अवश्य रखना चाहिए जिससे समान और सकारात्मक सोच रखने वाले व्यक्ति को वह `ट्रेक्ट´ पढ़ने के लिए दिया जाए और उसे परिषद् परिवार में प्रवेश हेतु प्रेरित किया जाए। कार्य कठिन नहीं परन्तु उसके लिए इच्छा शक्ति का प्रबल होना अनिवार्य है।

प्रस्तुत मास में दो विशिष्ट दिन हैं : मानव अधिकार दिवस और श्रद्धानन्द बलिदान दिवस। प्रत्येक मनुष्य को सुख पूर्वक जीने का पूरा अधिकार है जो उसे संविधान द्वारा भी प्राप्त है। सुख पूर्वक जीने का अभिप्राय है `पहला सुख नीरोगी काया´। परिषद् की स्वास्थ्य सम्बन्धी जितनी भी योजनाएँ क्रियान्वित की जाती हैं सभी मानव के सुखी जीवन के लिए ही हैं। परिषद् ने इसे अपना एक प्रमुख दायित्व समझ लिया है।

भारत-भू की अस्मिता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भारत के सपूतों ने जितने भी बलिदान दिए उस पर भारत-माँ को गर्व है। स्वामी श्रद्धानन्द ने तो शिक्षा के क्षेत्र में गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति का आरम्भ कर एक मिसाल तब कायम कर दी जब उन्होंने अपने ही दोनों पुत्रों को सर्वप्रथम गुरुकुल (काँगड़ी) में प्रवेश दिलाया। गुरु वन्दन छात्र अभिनन्दन प्रकल्प उसी कड़ी में देखा जाना चाहिए।

मुहर्रम और क्रिस्मस यद्यपि दो अलग-अलग धर्मावलम्बियों के पर्व हैं फिर भी इन्हें भाईचारे के रूप में ही मनाना चाहिए। यही इस देश की सहिष्णुता का प्रतीक है।

 ध.व.स.


 
 

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