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Beti Bachao - Beti Padhao
बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ

 
     
 

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ
बिल्डिंग डाइवर्सिटी इन एशिया पैसिफिक बोर्ड रूप नाम की इस रिपोर्ट में पाया गया कि पिछले चार वर्षों में भारतीय कम्पनियों के बोर्ड में महिलाओं की संख्या में इजाफा दर्ज हुआ है। खासतौर पर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध शीर्ष 100 कम्पनियाँ इस मामले में अव्वल रही हैं।

बेटा-बेट दोनों का ही महत्व, कर्त्तव्य, आवश्यकता अधिकार समान हैं, दोनों ही समाज के आवश्यक अंग हैं, प्रतिनिधित्व में महिलाओं की बढ़ोत्तरी 2012 में 2.5% तथा 2015 में 12% हुई। महिलाओं की बोर्ड में 17.5% टेलीकॉम क्षेत्र में 11.6%, आई.. क्षेत्र में 9.6% वित्तीय क्षेत्र में भागीदारी है। फिर भी आज कन्या भ्रूण हत्या विकराल रूप धारण किये है। भारत विकास परिषद् संस्था जहाँ युवाओं को संस्कारित करने को कटिबद्ध है वहीं बेटियों को मरने से बचाने में भी पीछे नहीं! भारत पुरुष प्रधान समाज रहा है, पुत्र वंश को चलाता है, स्वर्ग दिखाता है, बुढ़ापे का सहारा आदि मान्यताओं से शिक्षित वर्ग भी अछूता नहीं है।

बेटी क्यों बचाओ :- कौन नहीं जानता कि सृष्टि के चक्र को अविरल चलाने को माँ, राखी बांधने को बहिन, कहानी सुनाने को दादी, जिद पूरी करने को मौसी, खीर खिलाने को भाभी, जीवन साथी हेतु पत्नी इन जरूरतों को पूरा करने हेतु बेटी को जिन्दा रहना जरूरी है। बेटी माँ बन गौरव पाती है, नौ माह तक गर्भस्थ शिशु को अपने रक्त की एक-एक बूँद से सींचकर जन्मती है त्यागी निस्वार्थी होने की वजह से शिशु को पति का नाम दे, आत्म संतुष्टि का अनुभव करती है। कन्या भ्रूण हत्या से समाज की गति रूक जायेगी। अतः इसे रोकना आवश्यक ही नहीं हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। कहीं ऐसा हो कि आपका लाडला बेटा दूल्हा बनने के सपने देखता रह जाए।

इस प्रक्रिया के तहत गर्भवती महिला अत्यधिक रक्तस्राव से, गर्भाशय क्षतिग्रस्त होने से संक्रमण हो जाने से या तो दुबारा माँ नहीं बन पाती या संसार से ही विदा हो जाती है। अतः बेटी को बचायें, माँ को जीवित समाज की व्यवस्था बरकरार रहने दें। सरकारी आकड़ोंनुसार 1981 में 1000 पुरुषों पर 935 महिलाएँ, 1991 में 1000 पर 927, 2011 में 919 ही रह गईं, यह हम सबके लिए चुनौती है।

बेटी को क्यों पढ़ाओ :- जन्म के बाद बेटी का पालन-पोषण-शिक्ष, माता-पित की जिम्मेदारी है। हिन्दुओं के 16 संस्कारों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण विवाह है। विवाह के बाद नये रिश्तों को तन-मन से स्वीकारती है बेटी। घर की देखभाल, बच्चों का पालन पोषण, पति का ख्याल, सास-ससुर की सेवा प्रातः से रात्रि तक घड़ी की सुई की तरह चलकर पूरा करती है। जीवन तो पशु भी जीते है। पर शिक्षित बेटी आधुनिक जीवन शैली, नये अविष्कार, देश-विदेश की तकनीक का उपयोग कर परिवार में खुशहाली ला सकती है। एक शिक्षित बेटी पूरे परिवार को नई दिशा, रोशनी नया परिवेश देती है। संतान का उचित मार्गदर्शन, अमृत-विष का अन्तर, सदाचार का पाठ जीवन सुयश-सफल उत्तम बना सकती है।

जग जाहिर है कि शिक्षा के बल पर हमारे देश की बेटियाँ राष्ट्रपति, गवर्नर, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सैनिक, विदेश मंत्री, पायलट, गीतकार, गायिका, स्पेस वूमन, ट्रेन चालक, चित्रकार, कवियित्री, लेखिका, डॉक्टर, प्रिंसीपल यहाँ तक कि फाइटर प्लेन चालिका बन घर-परिवार-समाज-शहर देश का गौरव बढ़ा रही है। शिक्षित बेटियाँ बेटों के बराबर बल्कि ज्यादा बेहतर घर व्यवसाय संभालकर अपने आपको सिद्ध कर रही है। साथ ही परिवार की आर्थिक मददगार भी साबित हो रही है। बेटी को शिक्षित करना अति आवश्यकक ही नहीं हर परिवार की नैतिक जिम्मेदारी है। हत्या करना घोर अपराध है, सजा का भी प्रावधान है पर आज तक किसी को भी सजा नहीं मिल सकी है। यहाँ तक कि डॉक्टर जीवन देते हैं पर पैसे की लालच में वे भी जीवन लेने से नहीं चूकते। भारत विकास परिषद् विभिन्न आयोजनों, सम्मेलनों, गोष्ठियों के माध्यम से इस सामाजिक कुरीति पर अंकुश लगाने को प्रयासरत है।

राष्ट्र की आधी जनशक्ति नारी है जो अपनी ऊर्जा, संकल्प, वात्सल्य से आंगन से लेकर अंतरिक्ष तक भूमिका सफलता से निभा रही है। एक बालक को शिक्षित करना, केवल एक को करना जबकि एक बालिका को शिक्षित कराना पूरे परिवार को शिक्षित करना है क्योंकि बालिका बड़ी होकर पत्नी-माँ बन परिवार को संजोती है वो जन्मदात्री ही नहीं चरित्र निर्मात्री भी है।

धार्मिक महत्व में देवियों का पूजन रानी लक्ष्मीबाई, माताजीजाबाई आदि को भुलाया नहीं जा सकता। विश्व की प्रख्यात महिलाओं में सावित्री जिन्दल, इन्दूजैन, अनुभाग, किरण मजूमदार, शोभना आदि भारतीय रही हैं। इन्द्रा नूई, शिखा शर्मा, चंदा कोचर आदि ने नाम रोशन किया। संस्कारित, शिक्षित महिला ही स्वस्थ-समर्थ परिवार भारत की संरचना कर सकती है।

मनुस्मृति में माता का दर्जा पिता से हजार गुना अधिक माना है तथा शंकराचार्य महाराज भगवान श्रीकृष्ण को माँ पुकारते थे और उपनिषदों में मातृदेवो भव पितृदेवो भव कहा है एवं वन्देमातरम मे भी माँ की ही वंदना की गई है।

राम, कृष्ण, शिवाजी, हनुमान आदि के जीवन को सुसंस्कारों से माँ ने सजाया। महर्षि दयानन्द जी ने माँ को ममतामयी, जीवनदायनी, परोपकारिणी बताया है। माँ की गोद से बड़ी कोई पाठशाला नहीं, माँ से बड़ी कोई शिक्षिका नहीं, माँ की ममता, वात्सल्य, प्रेम निःस्वार्थ होता है। ईश बंदना में भी माँ को पहले नमन करते हैं। उदाहरण स्वरूप त्वमेव माता पिता त्वमेव। मंदिर, सत्संग, कथा में ज्यादा महिलाएँ होती हैं अर्थात् वे धर्म संस्कृति की रक्षा करती है।

इसके लिए सामूहिक प्रयास निम्न कार्यक्रमों के माध्यम से करने होंगे
1.
बेटी के जन्म पर सरकारी अस्पतालों में जाकर मनोबल बढ़ायें, मिठाई बांटे, बाजे बजायें। 2. धर्म गुरुओं द्वारा प्रवचन करा जनता को लाभाविन्त करें 3. निकट क्षेत्रों में कन्या भ्रूण हत्या करने के संकल्प पत्र भरवायें। 4. वाहन रैली, पदयात्रा, मशालयात्रा से लोगों में जागरूकता लायें 5. उक्त विषय पर कक्षा 10, 12 के छात्र-छात्राओं से निबन्ध वाद-विवाद प्रतियोगिता आयोजित करें। 6. पोस्टर-कुटेशन आदि प्रमुख चौराहों, शहरों में लगायें जो पर्यावरण, गौरक्षा, नारी सम्मान, दहेज प्रथा विषयों पर हो। 7. निर्धन परिवार की कन्या को गोद ले या शिक्षा लालन-पालन हेतु आर्थिक मदद करें। 8.. घर-परिवार में ऐसी नौबत आने दें, पुरुषों को शिक्षित करें। 9. महिलाओं को शिक्षित करने के प्रबंध करे ताकि पुत्र मोह के बंधन से मुक्त हो सकें। 10. ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के अभियान को अमूल्य सहयोग देकर सफल बनायें 11. दिव्यांग महिला को कैलिपर, व्हीलचेयर, हियरिंग ऐड दिलवाने का प्रबन्ध करें। 12. करवाचौथ, बसंत पंचमी, रक्षाबंधन, तीज मेला लगायें। 13. ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ पर गोष्ठी, सम्मेलन, जनजागृति, सभाएँ, ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर शिक्षित करने का प्रयास हो। 14. महिला सहभागिता हेतु शाखा, प्रान्त, रीजन, केन्द्र में अधिक दायित्व दिये जाएं शाखा, प्रान्त, रीजन स्तरीय महिला सम्मेलनों का आयोजन किया जाए।

विशेष - प्रान्त रीजन स्तर पर महिला सम्मेलन आयोजित करने पर महिला प्रभारी पुरस्कृत की जायेगी। सम्मेलन का पत्रक, कार्यक्रम रिपोर्ट, अखबार कटिंग, कार्यक्रम के बैनर सहित तस्वीर भेजना सुनिश्चित करें जो पारितोषिक का आधार होगा।

-सावित्री वार्ष्णेय, राष्ट्रीय चेयरमेन महिला एवं बाल विकास


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